विदेह वैदेहीक नगरी मिथिला वैदिक कालहि सँ अपन संस्कृति, सभ्यता, धर्म ओ व्यवहारकेँ लए विश्वक मानचित्र पर ख्यातिक छाप अंकित कएने रहल अछि। एहिठाम वाणीक वरद्-पुत्र ओ विदुषी कन्यारत्न सभक श्रृखलाबद्ध आदर्शोन्मुखी परम्परा वैदिक-पौराणिक ग्रन्थादो ओ इतिहास- सक्ष्यक अनुसारेँ दृष्टिपथ केँ प्रकाशित-आलोकित करैत अछि, हृदय- कमलकेँ प्रस्फुटित- प्रफुल्लित करैत रहल अछि प्रेरणा-प्रंजक पावन मनभावन पुण्य लुटैत - बटैत रहल अछि, दीन- हीन दिशावुहीन पथिलक पथ प्रश्स्त करैत रहल अछि। काल- प्रवाह अविच्छिन्न रहैछ। एकर गतागत मे परिवर्त्तन आनब केहनो सँ केहनो वैज्ञानिक ओ कलाकारक वश सँ बाहरक विषय थीक, साधक- तपस्वीक कर्म- क्षेत्रसँ इतर वासनापरक थीक आ मनुष्यक हेतु तँ सर्वथा असाध्ये। यद्यपि मनुष्य मात्रहि मनोरम कल्पनाक नाना रंगमे रंगल अपन बौद्धिक- प्रखरता-परिपक्वता द्वारा सृष्टिक रहस्यमय गें सोझख्बाक दिशामे निरन्तर प्रयासरत दृष्टिगोचर होइत रहल छाथि। आवेष्टित सृष्टि विचित्रता सँ परिचेष्टित अछि, रहस्यमयता सँ प्रच्छादित-आच्छादित अछि, कुतूहलता सँ निमज्जित अछि। जीवन तँ एक प्रहेलिका मात्र थीक। संसार थीक मायाक, महामायाक, परब्रहम परमेश्वर द्वारा पंचतत्त्व सँ निर्मित, जाहिमे उहलौकिक ओ पारलौकिक अनुभूतिक क्रमश: भोगल यथार्थ ओ काल्पनिक सत्यक लोक अर्चा- चर्चा करैत, सुख-दुखक नाना राग-विराग तथा दशा-दिशाक पारस्परिक विचार- विनिमय आदिकेँ समय कटबाक विषय बनबैत दृष्टिगत होइछ। जीव जागतक सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य मात्रहि विभिन्न काल- खंडमे अपन वैचारिक परिधिक विस्तार ज्ञान- बुद्धिक अनुसारेँ करैत अछि, चिंतन-मनन द्रारा जीवनक विविध पक्षक खंडन-मंडन ओअप्रनर्सृजन करैत अछि, अभिनव दृष्टिकोणक भव्य भवन बननैत अछि, संघर्षपूर्ण जीवनक परिष्कार हेतु प्रयत्नशिल रहैत अछि, मुदा से रुचि-प्रवृत्तिक अनुकूल, वातावरण- परिस्थतिक समतूल । युग प्रवर्त्त्क, अवतारी, महापुरुष, साध-महात्मा, ज्ञानी-विज्ञानी, विद्यानुरागी अछि तँ सदा- सदैव अपन हदय-मंदिर मे संचित भव्य भावनाक सुवास वास द्वारा मानव समाजक हित हेतु चिंतनशील रहैत, बसुधैव कुटुम्बकम् ओ सर्वजन हिलयक आग्रही बनल रहैत, सत्यम् शिवम् ओ सुदरम् केर त्रिवेणी-संगममे स्नान्करैत सत्त, आनन्द केँ प्राप्त करैछ दैछ्परिचय ब्रहमानन्द सहोदर क ,जे निस्सन्देह प्रणोदितहित प्रबल प्रण्यपरक प्रभारिता होइछ, सबष्टिक मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन एवं उद्वोध्न उद्भेदनमे सबल सहायक होइछ। कहल कतेक जाय? जनक-तनयाक जन्मस्थली मिथिला अति प्ररातन कालहि सँ अपन आर्य- संस्कति सभ्यता तथा ज्ञान-विज्ञानक केन्द्र रहल अछि। एहिठामक कण-कण्मे धर्म-कर्म्क पावन आ अर्चा-चर्चा विश्वभरिमे होइत रहल अछि। एतय न्यायशास्त्रक रचयिता गौतम मुनि, याज्ञवल्क्य स्मृति’ क प्रणेता महर्षि याज्ञवल्क्य, सांरव्यशास्त्रक निर्माता कपिल मुनि, मीमांसाक अधिष्ठाता मंडन मिश्र, दर्शनशास्त्रहिक विशवविख्यात महापंडित उदयनाचार्य, तार्किक प्रवर पक्षधर मिश्र, उदयनाचार्यक गुरु महादार्शनिक कविवर गोवर्द्धनाचार्य महाराज विक्रमादित्यक सभाक नवरत्न पांडितगाराक कविरत्न वररुचि मिश्र, महादार्शनिक भवनाथ मिश्र (अयाची मिश्र), अयाचीक सुयोग्य सुपुत्र म. म. शंकर्र मिश्र, म. म. अभिनव म. म. जयदेव (विद्यापति) गोविन्ददास विपंडितमुख्य उमापति, धर्मशास्त्र मर्मज्ञ्रुद्र्धर उपाध्याय, व्याकरण ओ नाट्यशास्त्रक उद्भट विद्वान म. म. महेश ठाकुर, ज्योतिषशास्त्रक आधिकारी पंडित मधुसूदन शर्मा, संगीत शास्त्रक सूक्ष्म ज्ञाता एवं रागतरंगिणी क सृजनकर्त्ता लोच्न, व्याकरण, न्याय तथा सभ्हित्यक अद्वितीय विद्वान गोकुलनाथ उपाध्याय धर्मशास्त्र विशेषज्ञ म. म. सचल मिश्र, पंडितमण्ड्ली मे सुप्रतिष्ठित सिद्ध त्पंत्रिक मदन उपाध्याय, निबंधशास्त्र’ क विशिष्ट पंडित म. म. गोकुलनाथ झा, व्याकरण, न्याय एवं सभहित्यक सुविख्यात विद्वान म. म. हर्षनाथ झा ओ एहिना अनेकानेक शास्त्रमे परंगत पंडित गारा मे म. म. प्रमेश्वर झा म. म. जयदेव मिश्र, म. म. शशिनाथ झा म. म. दुखमोअचन झा म. म. चुम्बे झा म. म. मुरलीधर झा, पं. जीवन झा, विद्यानिधि खुद्दी झा, सर्वतंत्रस्वतंत्र बच्चा झा, म. म. वाचस्पति मिश्र, कवीश्वर चन्दा झा, म. म. धीरेन्द्र उपाध्यायक संगोहिँ महर्षि याज्ञवल्क्यक अर्द्धंगिनी विदुषी मैत्रेयी, वेदान्तक परम पंडिता भारती (म. म. मंडन मिश्रक धर्मपत्नी) प्रभृति विद्वान विदुषीक श्रृंखलाबद्ध रुपरेखा दृष्टि पथ पर अबैछ, जे विभिन्न कालखंडमे अवतीर्ण आ अपन अपन प्रखर वैदुष्यकेँ उजगर कए मिथिलेकेँ नहि, अपितु सम्पूर्ण विश्वके~ अवदान दए क्तक्त्य करैत गौरवान्वित कएल। मुदा, समयक अपन गति होइत छैक। एकर काज छैक बीतब से बितैत रहलैन। अपन सांकृतिक सामाजिक ओ व्यावहारिक परम्पराकेँ अक्ष्ण्ण रख्ने मिथिला अपन नामकेँ सर्थक करैत रहल। तेँ जे मिथिलाक स्तुप कहियो उत्कर्ष पर छल से अपर्कषमे परिणत होमए लगलैक। शान्तिक स्थान केँ अशान्ति छेक लेललैक। सत्य पर असत्य आ धर्म पर अधर्मक राज विराजमान भऽ गेलैक। कोनो ने हो? घोर कलियुग आबि गेल अछि। हमरा लोकनि एहि युगमे जीवनक गाड़ीकेँ कोनहुना खींचि रहल छी। ककरो केओ मोजर देनिहार नहि। अस्तित्व - अस्मिता पर प्रश्नचिहन ठाढ़। इच्छा रहितो मोन बौक भेल। बाजब तँ अर्थक अर्नथ ने भऽ जाए। मनोभावकेँ घोंटला उत्तर कुंठा आ त्रांस अपन चरम दिशि प्रवृत्त होइत। पिता-पुत्र, पति-पत्नीक भाइ-बन्धु, इष्ट- मित्र धीयापूता सभक चिन्तनधारा अनेक ध्रुव पर अवस्थित। ककरो सँ ककरो तालमेल नहि। कोनो सामंजस्य नहि। एहि पर विचारो देब पश्चात्तोपक कारण सिद्ध होयत देखि काल सेहो अट्टहास करैत, प्रदुषित कतावरण सँ धरती कम्पित होइछ। धरतीमाताक संतानक कुक्त्यक नग्नन्त्य पर अट्टहास कोना ने हो-दोसराक रक्तक प्यासल, परजीवी सदृश चूषण, तंतए परिसिथतिक परिकल्पना स्वत: अनुमान्य साक्ष्य थीक। आश्चर्यचकित हिमए पड़ैछ। परिस्थितिक विवशता-विकटता पर। लेकक मोल आइ फूटल कौरीक नहि रहि गेल अछि। चिरसंचित मर्यादा. ओ संस्कृतिमे विक्तिक प्रचुर समाचेश भऽ चुकल अछि। आतंकवादी द्वारा पसारल जालमे निरीह जनता- जनार्दन फँसल अपनाकेँ सर्वथा असुरक्षित अनुभव कऽ रहल अछि। एकर कानब कलपब सर्वत्र अरण्यरोदन सएल सिद्ध होइत। ककर सामर्थ्य जे आतंकवादीक जालकेँ कोनो अस्त्रसँ कटबाक दुस्साहस करए? की एकरा अपन जानक भय नहि ? आवस्से। सबकेँ अपन प्राण प्रिय होइत छैक। अस्तु समाजक लोक देखितो, सुनितो मूक- बधिर भेल विष्य परुस्थितिक दास बनल रहि जाइछ। आक्षिक सभक्ष विकल्पक कोनो बाट नहि। धर्म-कर्म आब इतिहासक वस्तु बनल जा रहल अछि। धर्म-कर्मक नाम पर ठाम-ठाम ढ़ोगी आ पाखंडी सभक विद्रूपित चित्र भेटैछ, जकर निदान निकालब ककरो वश सँ बाहरक विषय थीक। हमरा सभ जखन इतिहास पुराण दिशि मुड़ैत छी, आख्यान- उपाख्यानक पन्ना उनटबैत छी, विभिन्न धर्मावलम्बीक धर्मगर्न्थ दिशि प्रवृत्त होइत छी त आश्चर्यक कोनो सीमा नहि रहि जाइछ। धर्मक मार्ग पर चलब आजुक अधिकांश लोककेँ विषवत् प्रतीत होइत छन्हि। की छल आ की भेल, तकर कोनो ठेकान नहि। धर्म की थीक? धर्मक अर्थ मात्र घंटी बजा पड़ोसीक फुलवारी सँ फूल तोड़ि देवता केँ चढ़ाए आडम्बर देखएब बहि होइछ, आपित परोपकार करबं समाजक हितमे काज करब, कर्ममे अहर्निश निरत रहब सएह धर्म थीक, मानवक सर्वश्रेष्ठ धर्म। भगवान श्रीकृष्णक गीताक सूक्तिकेँ एमरण्करैत जाइ- कर्मण्ये वर्त्तधकारस्ये.....।, जीवनमे अहंकारक परित्याग करब, स्थितप्रज्ञ बनब, धैर्य-धारण करब, चरित्र-निर्माराक पाठ पढ़ब, सभ वर्गक लोकक प्रति सभभाव राखब, ईर्ष्या-द्वेष-राग-विराग आदि सँ कोसों दूर रहब, श्रेष्ठक प्रति श्रद्ध- भाव, मित्रक प्रति आदर-प्रेम भाव ओ छोटक प्र्ति स्नेह-भाव राखब, उचित- अनुवितक प्रति सतत सचेष्ट रहब, शालीनता, कर्मठता, लगनशीलता, सहिष्णता आदिक प्रति कर्त्तव्यक निर्वहन करब एहिसँ श्रेष्ठ अन्य धर्मे कोन? मनुष्य समस्त प्राणीमे सर्वश्रेष्ठ होइछ। विवेकशील होइछ, आ तेँ एकर पुनीत उत्तरदायित्त्व बनैछ वसुधैव कुटुम्बकम केर भाव रखैत सब जीव पर दया-भाव राखब, ककरो अनिष्ट नहि करब, निर्धन-अकिंचन केँ हेय दृष्टि सँ नहि देखब, हाथमे किछु नहि अछि, सभ परब्रहम परमेश्वरे -रदत्त थीक तकरा नहि बिसरब, आदि सख्ह भानवकेँ मानवक श्रेणीमे परिगीमत करबाक उत्प्रेरक कारक सभ थीक। मानवक सकल कल्याणो तखनहि संभव । चरित्र- निर्माराक पाठ पढ़ि केओ सुसंस्कृत भए सकैत। कौलिक संस्कार केँ आत्क -परीक्षाराके अकरण्ण राखल जा सकैछ। एहि हेतु ज्ञान चक्षकेँखोलड पड़तैक, अन्तर्चक्षकेँ क्रियाशील करड पड़तैक, तखने अन्त: केँ पवित्र करैत वाइय दिशि उन्मुख होएब संभब, अन्यथा मानवक जीवन पेचछविहीन पशुक समान मानल जायत । युगमे आगिक ज्वाला प्रज्ज्वलित भेला पर सर्वत्र अराजकता, असंतिष आ विरक्त- भाव परिलक्षित होएब कोनो असंगत नहि मनल जाएत। यथार्थत: युगक दशा दिशा देखि ककर हृदय नहि कलहन्त गेतैक जकरामे यत्किंचितो मानवीय संवेदना छैक, स्पन्दन छैक, चिंतन शक्ति छैक। गर्त्तमे जाइत समाजकेँ देखि, ध्वस्त होइत शान्ति स्तुपकेँ देखि ककर हृदय नहि विदीर्ण हेतैक जकरामे थोड़बो बुद्धि- विवेक हेतैक। आइ प्रतिष्ठाकेँ लोक ताख पर राखि देने अछि। अपन पूर्वज द्वारा रइलैक। किंतु निक्रष्ट लोककेँ ताहि हेतु फिकिर नहि फिकिर नहि। प्रतिष्ठा-मर्यादा एकरा लेल्तुच्छ वस्तु\जेहने रहने तेहने अलोपित भेने धन्न सन\किंवा शिक्षा कोनो प्रकारक देला पर खतराक घंटी बजबाक केँ देखितो मैने रहब क्षेयस्कर बुझैत, परंच मोने-मोने धरि अतिशय चिंतित आ चिन्ताक रेख कपार पर सेहो स्पष्ट दृष्टिगत होइत। चालि प्रकृति, रहन-सहन ओ दिनचर्या सँ ककरो संस्कारक पहिचान होइछ। अमुक व्यक्ति संस्कारि अछि, अमक संस्कारहीन अछि, तकर निराकरण समाजक सुप्रतिष्ठित वर्ग द्वारा होइछ। इएह वर्ग निर्णय करैछ नीक- बेजायक। संस्कार्हीन व्यक्ति पृथ्वी प्र भारस्वरुप रहैछ, मुदा संस्कारीक चिरायक लोक कामना करैछ आ ओकर परोक्ष भेलो पर ओकराप्र्ति नमन-निवेदन करैत छैक, श्रद्धा-सुमन अर्पित करैत छैक। उमैहन व्यक्ति ‘यस्य कीर्ति: स जीवति केँ सार्थक करैत अमस्त्त्वकेँ प्राप्त करैछ। रामायण, महाभारत, वेद, प्रराण, उपनिषद, कुरान, बाइबिल, गीता, गुरु ग्रन्थ साहेब आदि धर्म - ग्रन्थ सभमे अनेक चरित्रक उदाहरण भेटैछ। अलौकिक सँ अलौकिक दिव्यातिदिव्य सँ लऽ आसुरी-वृत्ति पर्यन्तक। जेहेन ताकब तेहने भेटत। टिपिकल सँ टिपिकल पात्र। प्रेरणामूलक एहेन जे मोक्ष- प्राप्तिक मार्ग बतौनिहार, विध्वंसकारी एहेन जे जीवन केँ सत्यानाश कैनिहार दुनू परस्पर विरोधी। प्रथमक ग्राफ जँ आकाश पर तँ दोसरक पाताल धरि। दुनू परस्पर विरोधी। प्रथक शान्तिक प्रबल पक्षधर- पृष्ठपोषक तँ दोसर अशान्तिक आड़ि कुल-मूल नाशक विनाशक। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ जतए मानरक लेल अहितकर अछि, चारित्रिक ह्रासक हेतु प्रबल कारक अछि ततहि दोसर दिशि धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष जीवनक लेल धरि गोट पुरुषार्थ अछि। मुदा, आजुक समय ऎहन बीति रहल अछि जे अज्ञानतावश लेक पुअरुषार्थक तत्त्व केँ सर्वथा विस्मृत कऽ विध्वंसक तत्त्वहिकेँ आत्मसात कऽ सर्वत्र तबाही मचबैत अछि, अकाण्ड-तांडव प्रस्तुत करैत अछि\धर्मकेँ अधर्मक दिशामे मिड़ड चाहौत अछि, संस्कृति-संस्कारक चिहनकेँ मेटाबए चाहैत अछि। पंरच ‘कौआक श्रोप नहि मरैत छैक’। विरोधी तत्त्व, विनाशकरी तत्त्वकेँ कतबो कूदफान कएने की हेतैक, धैर्य , संतोष, आत्मबल ओ संयम रखैत बुद्धि विलासिताक परिचय दैत परिस्थिअतिक समना करए तऽ सफलता हस्तगत हेबे भतैक आ असत्य अत्याचार आ पापक अस्तित्व सर्वदाक हेतु विलीन भऽकऽ रहतै।चोर इजोत नहि सहैत छैक। दुष्ट, मन्दबुद्धि आ दुराचरी नीक सभा- गोष्ठीमे किन्नहु नहि बैसि सकैत अछि। एहि गोष्ठीमे पंडित-गुणी ओ कर्म-पथ पर आरुट रहनिहार संस्कारी सएह सहभागी भऽ सकइयै जकर प्रतिभा प्रभासुं जकर दिव्य प्रकाश सँ समाज आ राष्ट्र प्रकाशित प्रतिभासित भऽ सकइयै। चौर वृति सफलतो तँ से क्षीरीके, मुदा विद्वान ओ उत्त्म जनक सफलतामे बिलम्ब होइतो स्थायी रुपेँ महत्त्व जे प्रेरणा पुंज प्रदान करैत गर्धव केँ सेहो घोटक (घोड़ा) बनएबाक सामर्थ्य रखैत अछि। |