‘धारणात् धर्म:’ अर्थात् धर्म ओ तत्व थिक जे जगतकेँ धारण करैत अछि । एकर पालन आ सेवनसँ प्राणीमात्र परम उत्कर्षकेँ प्राप्त करैत अछि । जाहि कर्म सँ मनुष्य एहि लोकमे अभ्युदय आ अन्त मे नि:श्रेयस (परम कल्याण) केँ प्राप्त कऽ लैत अछि, तकरे धर्म कहल गेलैक अछि । धर्म केँ मानवक पुरुषार्थचतुष्टय मे प्रधान मानल गेलैक अछि । ई मोक्षक प्रधान साधन तँ थिके, संगहि संग अर्थ ओ कामक वास्तविक सिद्धि सेहो धर्मेक पालन सँ होइत छैक । वस्तुत: धर्म विधि-निषेध पर आधारित अछि । कर्त्तव्याकर्त्तव्यक विवेचन पूर्वक कर्त्तव्यक पालन ओ अकर्त्तव्यक निवृत्ति द्वारा लौकिक जीवनकेँ आनन्दप्रद ओ उत्कर्षपरक बनयबाक संगहि पारलौकिक पुरुषार्थ दिस अग्रसर होयबाक चेष्टा धर्म कहल जा सकैत अछि । भारतीय वाडमय मे अत्यन्त प्राचीनेकालसँ धर्मक व्याख्याक प्रयास होइत रहल अछि । अनेकानेक धर्मशास्त्र, आचारशास्त्र, इतिहास, पुराण, साहित्य आदि मे धर्म ओ अधर्मक विवेचन विश्लेषण होइत रहल अछि । भरतीय धर्मशास्त्रक आचार्य मनु अपन स्मृति ग्रन्थ मे धर्मक दस गोट लक्षण जनौलनि अछि -धृति : क्षमा दमोऽ स्तेयं शौच मिन्द्रिय निग्रह : । धीविद्यासत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ विपरीत परिस्थिति मे धैर्य धारण करब, दोसराक द्वारा अपराध कयला उत्तर ओकरा क्षमा कऽ देब, उद्दण्डताक निवृत्ति ओ सहिष्णुता, दोसराक वस्तुक प्रति निर्लोभ रहब, बाह्माभ्यन्तरक पवित्रता, इन्द्रियकेँ विषय सँ निवृत करब, नीक जकाँ बूझब, आत्माविषयक विचार करब, सत्य संभाषण करब ओ अपकारीक प्रति सेहो निर्विकार बनल रहब, एहि दसो केँ मनु महाराज धर्मक लक्षणक रुप मे प्रस्तुत कऽ वस्तुत; एक गोट आचार संहिता प्रस्तुत कयने छथि, जकर अनुपालनसँ लौकिक अभ्युदय आ पारलौकिक मोक्षक प्राप्तिक परिकल्पना हुनक इष्ट बूझि पड़ैत अछि। श्रीमद्भागवत मे (७.११.८-१२) धर्मक तीस गोट सार्वभौम लक्षण प्रस्तुत कयल गेल अछि, जाहि मे सत्य, दया, तपस्या, पवित्रता, कष्ट सहिष्णुता, उचित-अनुचितक विचार, मनक संयम, इन्द्रियनिग्रह, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरलता, संतोष, समदर्शिता, सेवा, भोगवृत्तिक क्रमिक त्याग, लौकिक सुख प्राप्तिक प्रयत्न उल्टे फलदायी होइछ से विचार, मौम, आत्मचिन्तन, अन्नादिक युक्तिपूर्वक विभाजन आ समस्त प्राणीमे मे ईश्वरक दर्शन, भगवानक माहात्म्यक श्रवण, हुनक नाम ओ लीलाक स्मरण, भगवत् सेवा ओ पूजा दास्य भक्ति, सख्य भक्ति, भगवानक प्रति आत्म समर्पण आदि परिगणित भेल अछि । कहल गेल अछि जे एकर सभक पालनसँ भगवान संतुष्ट होइत छथि । एहिना गीताक
सोलहम अध्यायक आरम्भमे दैवी सम्पदाक नाम सँ मानव चरित्रक निर्माणक
हेतु उत्तम
गुण आ आचरणकेँ लक्ष्यमे राखि कहल गेल अछि -अभयं सत्व संशुद्धिर्ज्ञानयोग
व्यवस्थिति:। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ एहि तरहेँ मानवक सद्गुण आ सदाचारक लक्षण सभ विभिन्न भारतीय वाडमय मे धर्मक लक्षणक रुपमे प्रस्तुत होइत रहल अछि आ एकरा सभक दिस लोकजगतक प्रवृत्ति बनयबाक प्रयास भेल अछि । दोसर दिस आसुरी ओ अधलाह प्रवृत्ति सभक भर्त्सनापूर्वक ओहि सँ निवृत्त करयबाक प्रयास सेहो भारतीय वाडमयक लक्ष्य रहल अछि । वस्तुत: निद्रा, आलस्य, प्रमाद, नास्तिकता, दुर्गुण, दुराचार, मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा, शरीरक आराम इच्छा, विषयासक्ति आदि मनुष्यताकेँ नष्ट करऽ वला होइत अछि । आलसी मनुष्य करणीय कर्म नहि कऽ पबैत अछि, प्रमादी मनुष्य अकरणीय कर्म करऽ लगैत अछि, नास्तिक ईश्वर, धर्म आदिक अवहेलनाकऽ निर्भीकतापूर्वक अधलाह कर्म मे प्रवृत्त होइत अछि, लोकैषणा मे लागल मनुष्य दम्भी आ पाखण्डी बनि जाइत अछि, विषयासक्त पाप कर्म मे प्रवृत्त भऽ जाइत अछि । एकरा सभक दुष्परिणाम नहि केवल कर्त्ता व्यक्ति केँ अपितु सम्पूर्ण समाज, राष्ट्र ओ मानवता केँ भोगबाक हेतु बाध्य होमऽ पड़ैत छैक । तेँ भारतीय धर्मशास्त्र मानवताक रक्षाक हेतु एहि प्रकारक अकरणीय विकार सभ सँ लोककेँ बचबाक उपदेश दैत अछि आ प्राणीमात्रक कल्याणक कामनासँ धर्म आ अधर्मक व्याख्या कएने अछि। दोसर दिस धर्मक तत्त्व सभकेँ देखला उत्तर ई स्पष्ट होइत अछि जे एहि सभ सँ व्यक्ति सँ लऽ कऽ मानवमात्रक कल्याण संभव अछि । उदाहरणक हेतु शौच केँ लेल जाय । ई पूर्णत: व्याक्तिगत अभ्युदयक वस्तु थिक । अपवित्र लोक समाज मे घृणाक पात्र बनैत छथि आ क्रमश: हुनक निजी जीवन सेहो शीघ्रे रोगग्रस्त भऽ जा सकैत छनि । दोसर उदाहरण दानक लेल जाय । जँ दानक समुचित व्यवस्था पर समाज चलय लागय तँ कतहु गरीबी छैक बेरोजगारी, भुखमरी आ आतंक नहि देखि पड़ि सकैत छैक आ समाज कल्याण पूर्वक रहि सकैत अछि । मुदा साम्प्रतिक भारत मे जेना धर्म आ मोक्ष केँ पुरुषार्थ सँ हटा देल गेल अछि । लोक अर्थ आ कामक पाछू बेहाला भेल अछि आ तकर परिणामो विभिन्न प्रकारक सामाजिक आर्थिक अनाचार-व्यभिचारक रुप मे पसरल पसरल जा रहल अछि । धर्मक अनुपालनक अभाव मे सर्वत्र अशान्ति ओ अराजकताक साम्राज्य पसरल जा रहल अछि । काम क्रोध, मद, लोभ, मोह मत्सर सँ ग्रस्त लोक जीवन निरन्तर अमंगलक दिस अग्रसर अछि । मानवमात्र शान्ति चाहैत अछि मुदा शान्ति ओ लौकिक सुख - साधनक अभिवृद्धि मे ताकि रहल अछि । लोक ई बिसरि रहल अछि जे ओकरा द्वारा कृत कर्मक फल अवश्ये ओकरा भोगय पड़तैक जेना कि हमरा लोकनिक धर्मशास्त्र कहैत अछि । लोक ई बूझय लागल अछि जे मुइलाक बाद किछु नहि हैत तेँ चार्वाक दर्शन पर चलैत चली । एकर परिणाम इ भेलैक अछि जे अधलाह कर्म दिस प्रवृत्त होयबा मे तथा नीक आचरण सँ निवृत्त होयबा मे लोक कनेको चिन्ता नहि करैत अछि। एकर परिणामस्वरुप सम्पूर्ण मानव समाज विश्रृंखलित भेल जा रहल अछि आ मानव जीवन पशुओ सँ बदतर भेल जा रहल अछि। आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभि : नराणाम् । धर्मो हि तेषार्माधको विशेषो धर्मेण हीना पशुभि : समाना
:"॥
तथापि ई विचारणीय अछि जे प्रत्येक व्यक्तिक धर्म ओकर वर्ण, आश्रम,
लिंग, शारीरिक अवस्था, सम्बन्ध, पद ओ परिवेशक अनुसार बदलैत रहैत
छैक। ‘परहित सरिस
धरम नहि भाई। परपीड़ा सम नहि अधमाई ॥’ केँ ध्यान मे राखि जँ
कोनो सेनानायक शत्रु सैनिक केँ आघातॠ नहि करय, न्यायाधीश कोनो
हत्यारा केँ मृत्युदंड
सँ बचयबाक प्रयास करय तँ के एकरा उचित कहत ? तेँ एके व्यक्ति
द्वारा कृत कर्म कोनो परिवेशमे जँ धर्मक अन्तर्गत अबैत छैक तँ
दोसर परिवेश मे ओ अधर्मो
भऽ जा सकैत छैक। एहि दृष्टिञे धर्म अत्यन्त सूक्ष्म विषय थिक
आ एकर व्याख्या अत्यन्त सहज नहि । एहि तथ्य केँ ध्यान मे राखि
‘धर्मस्य गहना गति:’ आ ‘धर्मस्य
तत्त्वं निहितं गुहायां, महाजनो येन गत : स पन्था:’ कहि सत्पुरुष
ओ शास्त्र द्वारा अनुमोदित कर्महि केँ धर्म कहल जा सकैत छैक ।
एहि धर्मक हेतु ‘यतो
धर्म: ततो जय:’ आ धर्मो रक्षति रक्षित:’ कहल गेल अछि । |