भारतीय सनातन संस्कृतिमे व्रतोपवासक विशिष्ट स्थान अछि । उपवासमे सभ प्रकारक तामसी ओ राजसी इन्द्रिय भोगसँ विरत तथा सद्कर्मपूर्वक भगवत भजन, ध्यान आदि काज करबा चाही । उपवास सँ सभ तापक शमन होयत अछि । सत्कर्म सँ सद्गुणक संचय होयत अछि । आयुर्वेद चिकित्सा पद्धतिमे ज्वर ओ अन्य रोगक शमनक लेल प्रायः भोजन आदिक निषेध तथा पथ्य सेवनक विधान बताओल गेल अछि । एहिलेल शरीर कें स्वस्थ राखय आ रोगक शमन करवा लेल व्रत उपवासक महत्वपूर्ण भूमिका अछि । आयुर्वेद आ प्राकृतिक चिकित्सा में उपवास पर विशेष बल देल गेल अछि । उपवास पाचनतंत्र केँ शक्ति प्रदान करैत अछि । पाचन संस्थानक स्वस्थताए आरोग्यक पहिल शर्त्त अछि । शरीर एकटा यंत्रक तरहे अनवरत काज करैत अछि । भोजनकेँ पचाकऽ मल भाग बाहर फेकनाय आ सार भागसँ प्रत्येक अंग-प्रत्यंगक पोषण केनाइए एकर प्रमुख काज अछि । उपवास कयलासँ पाचन क्रिया मे भाग लेवय वला अवयव-अमाशय, आहार नली, पित्ताशय, यकृत ओ आँत के विश्राम भेटैत अछि । अतिभोजन सँ शरीरक उर्जाक बेसी भाग ओकरा पचयबाएमे व्यय भऽ जायत अछि । एहिलेल विषाक्त द्रव्यक पूरा तरहे निराकरण नहि भऽ पायत । इ अवस्था रोगकें उत्पन्न करैत अछि । बीमार भेला पर हमर सभ शक्ति रोगकारक विष-द्रव्य केँ निष्कासन मे लगैत रहैत अछि, फलतः भूख नहि लगैत अछि । एहिलेल रोगनिवारक सभ उपायमे उपवास प्राकृतिक सरल ओ श्रेष्ठ चिकित्सा अछि । पशु-पक्षी सेहो रोगग्रस्त भेला पर उपवास करैत देखल जायत अछि । सभ प्राणीक प्राथमिक चिकित्सा उपवासे अछि । उपवासक तीनटा उद्देश्य अछि- शारीरिक, मानसिक ओ आध्यात्मिक लाभ । उपवास सँ दमा, मोटापा, कब्ज, बवासीर, अपेंडिसाइटिस, संग्रहणी, गठिया आ यकृतक रोगमे बेसी लाभ होयत अछि । प्रसिद्ध आयुर्वेदज्ञ महर्षि चरक केँ अनुसार उल्टी, अतिसार, अजीर्ण, बुखार, शरीरक भारीपन, जी मिचलेनाइ, अफारा, अरूचि आदि रोगमे उपवास परम औषध अछि। एहि सँ शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति तथा मस्तिष्क केर अवयव तरोताजा भऽ जायत अछि। पेट अन्नसँ भरल भेला पर रक्तप्रवाह उदरक दिस बेसी होयत अछि जाहिसँ मस्तिष्ककेँ ऊर्जा कम भेटैत अछि । व्रतसँ शरीरक अनावश्यक भारक क्षय आ भूखक वृद्धि होयत अछि । मानसिक दुर्बलता, अवसाद, चिंता, आदि व्याधि सभक उपवास सँ निराकरण होयत अछि । एहि सँ नवीनता, स्फूर्ति ओ आत्मोन्नति होयत अछि । डॉ० प्यूरिंगटन आरोग्य, जीवनक आनन्द, सौन्दर्य, स्वतंत्रता, शांति आ शक्ति चाहयवलाकेँ उपवास करबाक सलाह दैत छथि । व्यक्ति केर शारीरिक आ रोगक अनुसार एक दिनसँ एकैसभ दिन धरि उपवास करबाक विधान अछि । सिर दर्द, उदर विकार, जुकाम, गलाक सूजन आदि रोगमे तीन चारि दिनक छोट उपवाससँ लाभ भऽ जायत अछि । गठिया, लीवरक रोग ओ कैंसर आदिमे लंबा उपवास कयल जायत अछि । मांसाहारी के लंबा आ शाकाहारी के छोट उपवास अपेक्षित अछि । स्वस्थ व्यक्ति के जीवन शक्ति बढ़ेबा ओ स्वास्थ्यक रक्षा लेल सप्ताहमे निकलिकऽ रक्तमे मिल जाइत अछि, एहिलेल बिषक प्रभाव नष्ट करय ओ एकरा शरीरसँ बाहर निकालबाक लेल प्राकृतिक लवणक आवश्यकता होयत अछि जे फलाहार सँ प्राप्त होयत अछि । बेसी दिन धरि उपवास करयवलाकेँ केला, सेव, टमाटर, खीरा, गाजर, मूली, पालक, पत्तागोभी, शहद ओ छाछक प्रयोग करबाक चाही । साप्ताहिक उपवासमें मात्र पाइनवा नेमोक पाइन पिनाय पर्याप्त अछि । उपवासक प्रारंभिक दिनमे पेटमे वायु, अनिद्रा, मुँहक बेस्वाद भेनाय, दुर्गन्धपूर्ण पसीना एनाय आदि लक्षण प्रकट होयत अछि । धैर्यपूर्वक उपवास जारी रखला पर हिनक स्वतः शमन भऽ जायत अछि। उपवास कालमे बिछौना पर नहि लेटिकऽ चिंतामुक्त रहैत भेल, हल्लुक काज करबा चाही । धूपस्नान, मिट्टीस्नान, प्राणायाम, मौनधारण, दूब पर भ्रमण ओ स्नान उपवासक लाभकेँ दोगुना कऽ दैत अछि । बेर-बेर कनैक-कनैक पाइन पीनाइयो लाभकारी अछि। बेसी ठंढा पेय, चाय, कॉफी आ धूम्रपानक सेवन उपवासक लाभकें नष्ट कऽ दैत अछि । भुखायल पेट रहिकऽ चाँदनीक सेवन स्नायुतंत्रकें मजबूत बनबैत अछि । लंबा उपवासके फलक रस वा शहद लऽकऽ खोलबाक चाही । किघु दिन धरि भारी भोजन कयलाक बजाय फलाहार पर रहनाय उत्तम अछि । भारतीय धार्मिक परम्परामे समय-समय पर विभिन्न व्रतक समावेश उत्तम स्वास्थ्यकेँ लक्ष्यमे राखिए कऽ कयल गेल अछि । एकादशीक दिन मोटापा बढ़यवला चावल आदि स्टार्चयुक्त पदार्थक निषेध आ प्राणशक्ति बढ़यवला फलाहारक निर्देश अवस्से प्रशंसनीय अछि । भोजनक समान उपवासक इच्छा भेलाए पर एकरा करबा चाही । उत्साह आ प्रसन्नतापूर्वक कयल गेल उपवास बेसी लाभकारी अछि । भूख-प्यास सहन नहि करयवला, मुखशीष, चक्कर, न्यून रक्तचापसँ ग्रस्त लोकनि, नेना, गर्भिणी स्त्री, आ अतिबृद्ध के यथाशक्तिए उपवास करबाक चाही । -मिथिला विहार, साभार, योग संदेश मासिक पत्रिका |