मिथिला पूरब भारतमे स्थापित क‌एल गेल पहिल राज्य छल । एक समयमे ई गंगाक दहिन किनार सँ लयकऽ हिमालयक तरा‌ई क्षेत्र तक पसरल छल ।

लगभग ३००० वर्ष सँ मिथिलाक केवल स्त्रीगणे हिन्दू देवी-देवातक भक्तिक छाहरिमे कलाकृति सब बनाबैत रहलीह । ई कहनाय अतिशयोक्ति नहि हो‌एत जे ई कला-कौशल भारतीय सभ्यताक मूलभूत सिद्धांतक अभिव्यक्ति और प्रेरणा अछि । स्त्रीगणक ई कलाकृतिक प्रेरणा-स्रोत मूलरुपसँ धर्म अछि । हुनक कला-कृतिमे हिन्दू धर्म सँ लयकें लोकप्रिय ग्राम्य (गामक) कथाक छाप या प्रभाव अछि ।

मुधबनीक चित्रकलाक नाम आँखिक समक्ष अबिते शहरक चकाचौंथ सँ गामक दीवार पर सहज व सरल रुपमे सुन्दर आ‌ओर चन्द्रमाक सदृश उज्जर चित्रक आकृति आगूमे नाचय लगैत अछि । न्युयार्क (अमेरिका) रॉयल अण्टारियो म्युजियमक प्रतिनिधि श्रीमती कांसंस मैथ्यूज दिल्लीक पत्रकार सम्मेलन मे कहलैथि "लोक चित्रकलाक वर्त्तमान शैली मे मधुबनीक पेंटिंगक स्थान सर्वोपरि मानल जा सकैत अछि ।" विगत किछु वर्षसँ मधुबनी चित्रकलाक प्रदर्शनी कतेको देश यथा- जापान, सोवियत संघ, अमेरिका, जर्मनी और फ्रास आदि देशमे लगा‌एल जा चुकल अछि । ओहिठामक लोककें मनोहारी मधुबनी पेंटिंग बहुत पसन्द आयल छन्हि । परिणामस्वरुप विदेशमे निर्यात क‌एल गेल कलाकृतियोमे एकर भारी माँग छैक ।

महिलाक द्वारा अभिव्यक्त ‘मधुबनी पेंटिंग्स’ सरस और सुन्दर अछि । लोक चित्रकलामे दक्ष मैथिल महिला आर ललना समाजमे सम्मानक दृष्टि सँ देखल जा‌इछ । इ‌एह कारण अछि जे मिथिलांचलमे आजुक कन्याकेँ कलाक शिक्षा अनिवार्य रुप सँ देल जा‌इछ । वास्तविक अर्थोमे हस्तशिल्पक साधकक जन्मभूमि अछि मिथिलांचल । ई ओहि साधकक कर्मभूमि छी, जे ई मानिकें चलैत अछि जे कला पूजा और अराधना थीक और साधना शिल्प ।

पूर्णतया एक महिलाक कला

यथार्थमे मधुबनी पेंटिंग पूर्णरुप सँ एक महिला कला अछि । एहि जीवंत कलापर ग्रामीण महिलाक प्राय: एकाधिकार अछि । महिला एहि कलाकें अपने पीढ़ीकें विरासतक रुपमे छोड़ैत गेलीह आ‌ओर एहि तरहें माटिक दीवार तथा घर-आँगनक फर्श सँ कपड़ा तथा कागज पर एकर स्थानांतरण हो‌इत गेल । एखन एकर किछु प्रमुख केन्द्र अछि- मधुबनी, भवानीपुर, रांटी, रैयाम, सिमरी, लहेरियागंज आदि । एहि स्थानमे मधुबनी पेंटिंगक औपचारिक-अनौपचारिक कला-केन्द्र सक्रिय अछि । ई सब क्षेत्र मिथिलांचलक अन्तर्गत अबैत अछि । उपर्युक्त स्थान (गामक) किछु महिला पेंटिंगक क्षेत्रमे विश्व-प्रसिद्ध भऽ चुकल छथि । एहि चित्रकलाकें आगू बढ़ेबामे मिथिलांचलक किछु महिला जे ख्याति प्राप्त केने छथि, निम्नलिखित छथि-

मधुबनी सँ लगभग सात किलोमिटर उत्तर जितवारपुरक पचहत्तर वर्षीय सीतादेवीक अनेक चित्रक प्रदर्शनी दिल्ली, मुम्ब‌ई, कोलकाता, ओसाका (जापान) आदि स्थानमे भऽ चुकल अछि । सन्‌ १९७६ मे हिनका राष्ट्रीय पुरस्कार सँ सम्मानित कयल गेल । जितवारपुरक दोसर प्रसिद्ध महिला कलाकार जगदम्बा देवी एखन तक ५,००० सँ अधिक चित्र बना चुकल छथि । एहि चित्रक यूरोपीय देशोमे अत्यधिक माँग अछि । जगदम्बा देवीकें ‘पद्मश्री’क उपाधि तथा दोसरो राष्ट्रीय पुरस्कार सँ सम्मानित कयल गेल अछि । एहि गामक भगवती देवी और हुनक बेटी कुमारी दुर्गाकेँ बिहार सरकार द्वारा पुरस्कृत कयल गेल छैन्ह । एहि पाँतीमे उरबा देवी आर एक महिला यमुना देवी मिथिलांचलक पहिल प्रसिद्ध हरिजन महिला कलाकार छथि । लोक- कथा पर आधारित हिनक चित्र देश-विदेशमे बेसी ख्यातिक नंगारा पिटने अछि । एकटा आर महिला श्रीमती आशा देवियो बिहार सरकार द्वारा पुरस्कृत पाँतिमे आयल छथि ।

राँटी गामक श्रीमती शान्ति देवी, महासुन्दरी देवी, शशिकला देवी, कर्पुरी देवी, गोदावरी दत्ता आदि प्रमुख कलाकार थिकीह । श्रीमती शान्ति देवी और हुनक पति शिवन पासवानकें अक्टूबर १९८६ मे राष्ट्रीय पुरस्कार सँ सम्मानित क‌एल गेलैन्ह । ६२ वर्षीय महासुन्दरी देवी मानपत्र, ताम्रपत्र और राष्ट्रीय पुरस्कारसँ विभूषित कलाकार छथि। जीतावारपुर और राँटीक अन्य सुप्रसिद्ध कलाकार छथि । जीतवारपुर और राँटीक अन्य सुप्रसिद्ध कलाकार छथि- बाछो देवी, बौ‌आ देवी, भूमा देवी, हीरा देवी आदि । बौ‌आ देवी सन्‌ १९८७ क ‘प्रथम’ राष्ट्रीय पुरस्कार जितनेहारि कलाकार छथि । एहि गामक पड़ोस लहेरियागंजमे मूलत: अनुसूचित जातिक कलाकारक निवास अछि ।

यदि कहल जाय जे मिथिलांचलमे विशेषकऽ जितवारपुर गामक लगभग प्रत्येक घर- आँगनमे स्त्रीगण चित्रकारी करैत छथि तऽ ई अतिशयोक्ति नहि । एहि गामक लगभग ७५ प्रतिशत महिला पेंटिंग करैत छथि । एहिमे लगभग २५ प्रतिशत स्त्रीगण नियमित रुप सँ चित्रकारी करैत छथि । एकरा देखिकें तँ लगैत अछि पेंटिंग केनाय हिनका सभक दिनचर्यामे अनिवार्य रुपमे शामिल छैक ।

सिमरी गामक ४६ वर्षीय ललिता देवी मधुबनी पेंटिंगक एक अतिविशिष्ट ख्याति प्राप्ति कलाकार छथि । हिनक सेवा ‘मिथिला’ नामक संस्था सँ जुड़ल अछि । मधुबनी कलाकें महीन (बारीक) काजक लेल हिनक चित्रकारी दूर-दूर तक चर्चित अछि । ललिता देवीक प्रमुख कृति अछि-रामायण कथाचरित । हिनक जिनगी सँ लयकें ५९ किश्तक पेंटिंग और ‘चाणक्य कथाक’ पेंटिंग दिल्ली, बंगलौर, अहमदाबाद और मुम्ब‌ई सहित देशक कतेको शहरमे प्रदर्शित भेल अ‌इ आ हिनक कलाकृतिकें बहुत सराहल गेल अछि । हिनक बेसी पेंटिंग विदेशी किनैत छथि । हिनक एक पेंटिंग ५००/- सँ लयकें १२००/- तकमे बिकैत अछि । राँटी गाँव ‘अरिपन’ और ‘रेखाचित्रा’ कें लेल प्रसिद्ध अछि। अरिपनकें बंगाल और असम मे ‘अल्पना’, राजस्थानमे ‘मंडन’, महाराष्ट्र और गुजरातमे ‘रंगोली’, दक्षिणमे ‘कोलम’, उतरांचलक कुमा‌उँमे ‘ऎपण’ और उत्तरप्रदेशमे ‘पूरणा’ कहल जा‌इत अछि । एकर अपन अलग छटा और सुन्दरता अछि जे ककरो अपना दिस बेसी आकर्षित करबाक क्षमता रखैत अछि । अरिपन किछु नव अयबाक खुशी, त्योहार और उत्सव पर प्रसन्नता तथा प्रेम दिखेबाक सुन्दर मॉडल थीक । इ अत्यंत प्राचीन कला थीक । एकरा मुख्यत: पूजा-घरक प्रवेश-द्वार, तुलसी चौरा और घरक मुख्य द्वार पर बना‌एल जा‌इछ । मिथिलामे ‘अरिपन’ विशेष रुपसँ देवोत्थान, नाग और मैना पंचमी, चौठचन्द्र, दीयाबाती, नवान्न आदि पर बना‌एल जा‌इछ ।

आन लोक-कलाक भांति मधुबनी पेंटिंग विभिन्न पावनि-तिहार और परिवारिक अनुष्ठानक संग जुड़ल अछि । मिथिलांचलक स्त्रीगण आ‌ओर ललना पावनि-तिहार, विवाह, यज्ञोपवित आदि सामाजिक आर धार्मिक अवसर पर अनेको प्रकारक चित्रसँ घरक दीवार तथा घर-आँगनक सब केँ सजा‌एल करैत छथि ।

पारिवारिक चित्रोमे कोहबर-घरक बाहर और भीतर क‌एल जायवाला चित्रांकन बहुत प्रसिद्ध अछि । कोहबर-घरक मुख्य दरबाजा पर कामदेव, रति आदिक चित्र बना‌एल जा‌एत अछि। कोहबर-घरक बीचमे शिव और शक्ति प्रतीकक रुपमे क्रमश: पुरुष और नारीक जनेन्द्रियोक आकृति बना‌एल जा‌इछ । एहि चित्रकारीमे विविध पशु-पक्षिक तथा वनक चित्र अधिकतर पृष्ठभूमि भरबाक लेल बना‌एल जा‌इछ । पशु-पक्षिमे विशेषरुप सँ मांछ, कछु‌आ, सुग्गा, सिंह आदिक चित्र बना‌एल जा‌इछ । एहि चित्रक प्रतीकात्मक मूल्य हो‌इछ । मांसलताक प्रतीक केरा आ‌ओर माँछ कोमोत्तेजनक एवम्‌ सम्मोहनक अद्भूत दृश्य प्रस्तुत करैत अछि । सुग्गा कामक वाहन और बाँस वंशवृद्धिक सूचक छी । सिंह अज शक्तिक, हाथी-घोड़ा ऎश्वर्यक, हंस -मयूर शान्तिक और सूर्य-चन्द्रमाक दीर्घ जीवनक प्रतीक छी । यक्षिणी चारु दिशाक रक्षिका थीक, तँ माँछ-कछु‌आ सृष्टिक उत्प्रेरक । कोहबर-घरक देवार पर देवी-देवता‌ओक चित्र बना‌एल जा‌इछ, जाहिमे मुख्य दुर्गा, काली, हनुमान, सीता और राम संगहि अनेको देवताक चित्र आदि प्रमुख अछि । कोहबरक चित्रकारीमे यथास्थान उल्टा त्रिभुज, शक्ति-मुख, साँप, कमल, कुण्डलिनी, सौभाग्यक कामना करय वाला कल्याणकारी स्वास्तिक आदि अंकित हो‌एत अछि । एहि सबहक तांत्रिक महत्त्व अछि। हम मिथिलावासी मानैत छी जे तंत्र-साधनाक प्रारंभ हमरे पुरुषा (पुरुखा) कयलैथ। एहि प्रकारें हम पबैत छी जे कोहबर-घरक एहि चित्रोक पाछू दार्शनिक तथ्यक संग-संग जीवन चक्रक भावना प्रस्फुटित हो‌इछ । धार्मिक भित्ति चित्रोमे माँ दुर्गा, राधा-कृष्ण, सीता -राम, शिव-पार्वती, काली, स्थानीय लोक देवी-देवाता‌ओक चित्र मनोहारी रुपसँ चित्रित क‌एल जा‌इत अछि । परन्तु माँ दुर्गा, राधा-कृष्णक लीला, राम-सीताक कथा और विशेषकर स्वयंवरमे जयमाला डालैत सीताक चित्रकें प्रमुखता देल जा‌इत अछि ।

-भरत लाल ठाकुर, शिक्षा विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली ।

साभार आँकुर