(दिनांक १५ एवं १६ दिसम्बर’ २००७ कऽ कवीश्वर चन्दा झा पुण्यतिथि समारोह समिति, दरभंगा एवं साहित्य अकादेमी, न‌ई दिल्लीक तत्वावधानमे स्थानीय नागेन्द्र झा महिला महाविद्यालय ल० संकाय दरभंगाक परिसरमे द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठीक आयोजन प्रो० डॉ० रामदेवझाक अध्यक्षता मे सम्पन्न भेल । एहि अवसर पर पं० श्री चन्द्रनाथ मिश्र ’अमर’ द्वारा देल गेल भाषणकें एतय प्रस्तुत कयल जा‌इत अछि - संपादक)

जाहि पुण्यश्लोक व्यक्तित्वक परम-पावन स्मरण करबाक हेतु हमरा लोकनि समवेत भेल छी ओ आधुनिक मैथिली भाषा ओ साहित्यक आधार-स्तम्भ थिकाह । अपन जीवनकेँ आद्य शताब्दी अर्थात्‌ ५०म वर्षक अवस्था धरि सुस्थिर नहि कऽ सफल छलाह । कठोर संघर्षमय जीवन, समाजक उछन्नर, लक्ष्मीवानक संग तारतम्य बनाकऽ रखबामे स्वाभिमानीकेँ कठिनता हो‌इबे छैक । फलतः गन्धवारि ड्यौढ़ी अथवा नरहन घुमैत रहऽ पड़लनि ।

एम्हर दैवक डाड़ पड़ैत रहलनि; पुत्र शोक पर पुत्र शोक सहय पड़लनि, परन्तु तेहन ऊर्जावान ओ प्रतिभा सम्पन्न रहथि जे ओतेक वज्राघात सहितो साधनासँ विमुख नहि भेलाह । जीवनक कटु-मधुकेँ भोगैत अनुभवकेँ संयोगने, उपहासमे देल’कवेस्सर’ उपाधिकेँ कलमक साधनासँ सार्थक ’कवीश्वर’क रूपमे इतिहासक पृष्ठपर लिखा गेलाह ।
भाषा साहित्यक विकासक हेतु जे नवीन मार्ग उद्घाटित कऽ गेलाह ओही मार्ग पर चलैत अपन मैथिली भारतीय संविधानक अष्टम अनुसूची धरि पहुँचबाक विकास-यात्रा पूरा कऽ सकल अछि ।

महाकवि विद्यापतिक अनुगमन करैत कृष्ण भक्तिक धार जे पाँच सय वर्ष प्रवाहित हो‌इत आबि रहल छल तकरा अपन रामायण रूपी तटबन्ध सँ बान्हि, आगम्यमान आधुनिक युगक आभास दऽ गेलाह । अतीतक गर्त्तमे पड़ल धरोहर सबकेँ अनुसन्धान द्वारा इतिहासक नवल पृष्ठपर उतारबाक संकेत दऽ गेलाह । सब पोथी लिखैतो पोथा लिखि गेलाह । जाहि पोथाक प्रसादेँ कतोक सय अनुसन्धित्सु आ‌इ धरि कृतविद्य भऽ विद्वन्मण्डली मे माथ उठाकऽ चलैत छथि, समाजमे समादृत छथि । हमरा जनैत चन्दा झा अनुसन्धानक जे कपाटोद्घाटन कयलनि तहियासँ अर्थात विगत एक सय वर्षमे विभिन्न विश्वविद्यालयमे कतेक अनुसन्धान भेल अछि, अनुसन्धाता के थिकाह, हुनक अनुसन्धानक विषय की थिकनि, ई समग्र सूची संकलित हो‌इत तँ इतिहासोक हेतु परम उपादेश हो‌इत । एमहर किछु वर्षसँ अपन-अपन शोध-प्रबन्ध प्रकाशित करबाक उत्साह बहुतो गोटे करबो कयलनि अछि । एकरा एक शुभ-संकेत मानबाक चाही । मिथिला-मैथिलीक इतिहास लिखल जयबाक कतेक आ केहन उत्साह ओ उत्कण्ठा छलनि से मैथिल हित साधनक संयोजक पं० चन्द्रदत्त झाकेँ जे पत्रोत्तर देने छलथिन ताहीसँ आभासित हो‌इत अछि । कवीश्वर छन्देमे चन्द्रदत्त झाकेँ उत्तर देने रहथिन-

‘लिखल जाय मिथिला इतिहास
नहि हो तहिमे शिथिल प्रयास
विषय विशेष हमहु लिखि देब
सपनहु एक टका नहि लेब’

एहूसँ पहिने मुजफ्फरपुरसँ जखन अयोध्या प्रसाद खत्री तिरहुतिया अर्थात्‌ मैथिलीमे पत्रिका बहार करबाक अपन योजनाक प्रसंग कवीश्वरसँ परामर्श मङलथिन तखन हुनको छन्देमे उत्तर दैत अपन सम्पूर्ण अभिमत ओ भाषाक परिवर्त्तनशील स्वभाव आदिक प्रसंग एक दीर्घ पत्र लिखलथिन-

आन देश बहु पत्र-प्रकाश ।
अपनहु होयत फलित प्रयास ॥
लहल अयोध्याधाम प्रसाद ।
श्रुतिपुट सुधा सदृश संवाद ॥

पत्र निकालब ’तिरहुति’ नाम । हमरहु बुझी स‌एह मन काम ॥
मिथिला भाषा काँ उत्कर्ष । एहिसँ बाढ़ि होयत की हर्ष ॥
जानकि मुख भाषाक प्रचार । एहिमे नहि पड़यिछ अतिचार ॥
जनक सुता काँ जे जन भृत्य । यथाशक्य सेवारत नित्य ॥
परिवर्त्तन नित जगत स्वभाव । भाषा विषयहु स‌एह प्रभाव ॥
लभ्य काव्य बहुतहु प्राचीन । कत जन रचि रहलाह नवीन ॥
चिन्ता नहि किछु गढ़ित स्वरूप । जेहन बनायब तेहने रूप ॥
मुण्डे-मुण्डे मति हो भिन्न । तैं जनु करि‌अ अपन मन खिन्न ॥
तदपि विमर्श उचित व्यवहार । देयु प्रबुध जन अपन विचार ॥
दश जन सम्मत पथ हो सोझ । दशकाँ लाठी एकक बोझ ॥

एहि प्रकारें अपन हृदयक आतुर उत्कण्ठाक संग प्रोत्साहन दैत अपन शारीरिक स्थितिपर सेहो प्रकाश दैत लिखलथिन-

आब भेलहुँ हम अतिशय वृद्ध ।
कहि नहि काज होयत कत सिद्ध ॥
विकल सफल तन गठिया रोग ।
ई सब थीक कुकर्मक भोग ॥
लीखि पठायब जत जे साध्य ।
भल जन शुभ कर काज न बाध्य ॥
एतबा कहल विनत कविचन्द ।
कयलेँ यत्न न फल हो मन्द ॥

एहिसँ भाषा साहित्यक विकासक हेतु कतेक आतुरता छलनि से स्पष्ट परिलक्षित हो‌इत अछि । वस्तुतः कवीश्वर एक द्रष्टा युग पुरुष छलाह । साधनाक पथपर अबैत भयंकरसँ भयंकर संकटसँ संघर्ष करैत ओहि पर विजय प्राप्त कयनिहार योद्धा पुरूष छलाह ।

प्रत्यक्षदर्शीक मुहें सुनल तथा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक जन्मवृत्तमे पढ़लो अछि जे मिथिला राज्यक राज-काज अढ़ौसँ मैथिली‌एक माध्यमसँ चलैत छलैक । महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह सिंहासनारूढ़ हो‌इते एक फरमान जारी कऽ अपना कर्मचारी लोकनिकेँ तीन मासक अभ्यंतर समस्त राज-काज हिन्दीक माध्यमसँ करबाक आदेश प्रसारित कऽ देलथिन । संगहि ईहो घोषित कऽ देलथिन जे जे एहिमे अक्षम सिद्ध होयताह से राजक सेवाक अयोग्य मानक जयताह ।

अशिक्षाक कारणें जन सामान्यमे मैथिलीक प्रति चेतना जाग्रत छलैक नहि, परन्तु बुद्धिजीवी वर्गमे यत्र-तत्र एकर कटु प्रतिक्रिया भेलैक ताहिमे कवीश्वर मुखर छलाह । सामन्तशाहीक युग छलैक तें प्रत्यक्ष रूपें प्रतिक्रियो व्यक्त करबाक साहस असाधारणे व्यक्तिक मुहें व्यक्त भेलैक जे काने-कान नारद गोत्रीय कोनो पार्षद द्वारा महाराजोक कान धरि पहुँचलनि । महाराजकेँ कवीश्वर चन्दा झाक गहन अध्ययन ओ प्रखर प्रतिभाक परिज्ञान नहि छलनि । ओ एहि प्रतिक्रियाक परिमार्जन हेतु चन्दा झाकेँ रामायणक रचना अपने आश्रयमे रहि करबाक आदेश देलथिन ।

ध्यातव्य जे महाराजक पार्षदमे किछु अहम्मन्य पण्डित सेहो छलथिन जनिक धारणा छलनि जे एहन दुरूह काज हिनका बुतें नहि भऽ सकतनि । ओ लोकनि व्यंग्य रूपमे हिनका ’कवेस्सर’ कहि हिनक मनोबल तोड़बाक चेष्टा करैत रहथिन । चन्दा झा सेहो एहि आदेशकेँ अभिग्रह (चुनौती)क रूपमे स्वीकार कयलनि । १८८६ ई० मे जखन चन्द्र रामायणक प्रकाशन (हमरा जनैत मात्र सुन्दरकाण्डक) भेलैक आ जन-जिह्‌वापर तुरन्त चढ़ऽ लगलैक तखन प्रतिस्पर्धी सभक धौना खसि पड़लनि । ’कवेस्सर’ यथार्थतः अपनाकेँ ’कवीश्वर’ सिद्ध करैत युग प्रवर्त्तकक रूपमे इतिहासक पृष्ठपर समादृत भेलाह ।

महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक देहावसान भेलाक बाद जेना एखनो एहि जनतन्त्रोक शासनमे दोसर दलक हाथमे शासन-सूत्र गेलापर प्रशासनमे घोर फेर बदल भऽ जा‌इत छैक तहिना महाराजाधिराज श्मेश्वर सिंह शासनारूढ़ भेलापर एतहु भेलैक जकर आभास हमरा लोकनिकेँ म० म० डॉ० सर गंगानाथ झाक आत्मकथासँ हो‌इत अछि । मुदा कवीश्वरक प्रतिष्ठा बढ़ि गेलनि । महाराजाधिराज रमेश्वर सिंहकेँ हिनक साधनाक अन्दाज लागि गेल छलनि । फलतः राज दरबारमे हिनक आदर कत गुन बाढ़ि गेलनि । न‌ओ वर्ष करीब ई हुनक दरबारमे रहलाह ।

एक दिन हृदयाघातसँ पीड़ित भेलाक बाद शरीर त्याग करबाक हेतु काशी जयबाक इच्छा व्यक्त कयलनि तँ राज दरभंगाक दिस सँ व्यवस्था भेलनि । स्मर्त्तव्य जे महाराजाधिराज कामेश्वर सिंहक जन्म नहि भेल छलनि । कवीश्वर केँ काशी बिदा करबाक हेतु रमेश्वर सिंह दरभंगा रेलवे स्टेशन पर जा कऽ भेट कयलथिन आ भाव विह्वल हो‌इत पुछलथिन-अपने तँ जा‌इत छी, एहि राजगद्दीक उत्तराधिकारी अद्यापि नहि, की भविष्य छैक ?

कवीश्वर आश्वस्त करैत कहलथिन- उत्तराधिकारी आबि रहल छथि । हम हुनक जन्मक शुभ संवाद पाबि‌ए कऽ शरीरक त्याग करब। सैह भेलनि, कामेश्वर सिंहक अगहन वदि अष्टमी दिन जन्म भेलनि आ अगहन वदि नवमीकेँ कवीश्वरक निधन । अतः एहन संयोग भेल अछि जे कवीश्वरक पुण्यशती तथा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंहक जन्मशती मिथिला भरिमे मण‌ओल जा रहल अछि ।

कवीश्वर रचित रामायणक चतुर्थ संस्करण सबसँ विशुद्ध मानल जा‌इत छनि जकर सम्पादन राजपण्डित बलदेव मिश्र ओ आचार्य रमानाथ झा संयुक्त रूपें कयने छथि । आचार्य रमानाथ झा क्षमा प्रार्थना शीर्षक दऽ भूमिकामे लिखने छथि-

‘अग्रिम योजना छल जे एहि संग कवीश्वरक जीवन चरित, मैथिली जगतमे हुनक कृति, कविताक विषयमे हुनक प्रतिभाक विश्लेषण ओ रामायणक विषयमे यावतोरूपेण समालोचना प्रभृति आवश्यक अंशसँ एकर भूमिका उपवृंहित हो.... ।’
उल्लेखनीय जे एकर बाद डॉ० श्री ललितेश्वर झा द्वारा चन्दा झा पर शोध प्रबन्ध लिखल गेलनि । प्रो जयदेव मिश्र सँ अंगरेजीमे मोनोग्राफ (विनिबन्ध) लिखवाय साहित्य अकादेमी प्रकाशित कयलकनि । ओकर अनुवादो मैथिली मे छपलै ।

ओमहर जोधपुर विश्वविद्यालयसँ डॉ० ’विमल’ नामक एक हमरालोकनिसँ अनचिन्हार एक व्यक्ति हिन्दीमे शोधकार्य कयलनि जे ’चन्द्र रामायण परम्परा ग्रन्थो की पृष्ठभूमि में’ नामें प्रकाशित छनि । डॉ० श्री विभूति आनन्दक सौजन्यसँ उक्त ग्रन्थ उनट्यबाक सुयोग हमरो लागल । बेस विस्तृत आ फड़िच्छ विश्लेषण ओहिमे कयल गेलैक अछि । हमरा तँ एकर मैथिली अनुवाद देखबाक सेहन्ता हो‌इत अछि । परन्तु हुनक डाकक कोनो पता-ठेकाना नहि अछि, तथापि एहि अवसरपर शून्येमे सही, हम डॉ० विमलक प्रति एहन कृतिक हेतु आभार व्यक्त करैत छियनि ।

आशा करैत छी जे एहि संगोष्ठीमे उपस्थित विचार सबसँ आचार्य रमानाथ झाक आकांक्षाक आंशिक पूर्त्ति सेहो होयतनि ।

एकटा विचारणीय प्रश्न सब दिन सँ हो‌इत रहल अछि जे संसार भरिक अन्यान्यो देशमे रामकथा सन अत्युत्तम, अत्युत्कृष्ट विषयपर विभिन्न भाषामे रचना हो‌इत रहल । सम्पूर्ण कथावस्तुक केन्द्रमे सीता छथि जनिका प्रसंग आचार्य सुमन लिखने छथि-

‘जनक जनिक अन्वर्थ सदर्थक जन्मभूमि ई,
जानकीक जन्मेँ जनमे अभिधाक जीत ई।’

अभिधार्थमे जन्मभूमि रहितो मिथिलाक लोकभाषामे रामायणक रचना, रामभक्ति शाखाक ओहन विस्तार कि‌एक नहि भेल ?

हम कतहु अन्यत्रहु ई तर्क उपस्थित कयने छी जे कृष्ण भक्ति शाखामे लौकिक भवें हो अथवा रहस्य भावें जाहि रूपक उद्दाम श्रृंगारक वर्णन राधा अथवा गोपी सबकेँ आलम्बन बनाय कयल गेल अछि से सीताकेँ आलम्बन बनाय नहि कयल जा सकैत छल । सीता, एकपत्नी व्रतधारी मर्यादा पुरुषोत्तम रामक अर्द्धांगिनी थिकथिन तेँ जगदम्बा थिकीह, जगज्जननी थिकीह, ताहिपरसँ मिथिलाक बेटी थिकीह । किन्तु राधा, भनेँ गौरीशंकर, सीताराम जकाँ कृष्णक नामक संग जुड़ल रहि कीर्त्तनीय रहथु तथापि रास विलासी, लीला पुरुष, नटवर-नागर श्रीकृष्णक अर्द्धांगिनी नहि, प्रत्युत परकीया प्रेयषी थिकथिन । दुनूक व्यक्तित्वमे आकाश-पातालक अन्तर छनि ।

दोसर बात जे अग्निपरीक्षामे उत्तीर्ण रहितो अन्तमे सीताक प्रति कयल गेल व्यवहारसँ मिथिलावासीक मनक कोनहु कोनमे रामक प्रति किछु ने किछु आक्रोश अवश्य रहल होयतनि । एहू कारणें रामभक्ति शाखाक अमुचित प्रसार मिथिलामे नहि भेल हो‌इक से सम्भव ।

अस्तु, व्यक्तिगत रूपेँ हम तँ कवीश्वर चन्दा झाक आजीवन ऋणी रहबनि, कारण हिनक नाम साम्य चन्द्रनाथे हमरा साहित्य सेवा दिस अग्रसर होयबाक प्रेरणा देलक । एहन महाप्राण व्यक्तिक प्रति हार्दिक श्रद्धा निवेदित करैत विराम लैत छी ।

लिपिः अमलेन्दु शेखर पाठक