सीतमही महापुण्या, सर्वतीर्थ गरीयसी । तस्मातेव सदासेव्या, प्रसिद्धा जगती तले ॥ (वृहत्‌ विष्णुपुराण/ अ. २४/ श्लोक २०)

अर्थ - संपूर्ण जगत्‌ में ई तथ्य प्रसिद्ध अछि जे सीतामही (अपभ्रंश सीतामढ़ी) महापुण्यवती तथा सब तीर्थ मे महान्‌ अछि, अत: सीतामही मे प्रवास करबाक चाही । अर्थात्‌- सीतामही मे प्रवास कैला सँ कुपात्रो कें सद्गति भेटैत छैक । कियेक त’ एतौका निवासी पर श्री जानकी जी सदैव प्रसन्न रहैत छथिन ।
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सीतामही, जगत-जननी जानकीक प्राकट्य-स्थली होयबाक संगे संग कपिल, कणाद, गौतम, वाजश्रवा, मैत्रेय, बोधायन, पुष्यमित्र इत्यादि महर्षि-मनीषी लोकनिक जन्मभूमि सेहो रहल अछि । सीतामढ़ीक अही पावन धरती पर भगवान बोधायन वा आचार्य बोधायनक जन्म भेल छलनि ।

परिचय -

वैष्णव सम्प्रदाय प्रमुखत: श्री रामानन्द सम्प्रदायक नाम सँ प्रसिद्ध अछि । आचार्य रामानन्द सँ चौदह पीढ़ी पूर्व भगवान बोधायन भेलाह जे विशिष्टाद्वैत (समन्वय) सिद्धान्तक प्रथम संस्थापक वा प्रथम प्रवर्त्तक छलाह ।

जन्म -

सीतामढ़ी मुख्यालय सँ तीन कोस (दस किलोमीटर) पूरब दिशा मे तथा दरभंगा-सीतामढ़ी रेलखण्ड पर अवस्थित ‘बाजपट्टी’ रेलवे स्टेशनक समीप मे ‘वनग्राम’ नामक ग्राम मे भगवान बोधायनक जन्म लगभग दू हजार चारि सय वर्ष पूर्व मे पौष मासक कृष्णपक्ष द्वितीया तिथि कें भेल छलनि । ‘वनग्राम’ में प्रतिवर्ष अही तिथि कें बोधायन-जयन्ती मना‌ओल जा‌इत अछि । वनग्राम मे ‘बोधायन-सर’ तथा ‘बोधायन-वट-वन’ एखनो विद्यमान अछि ।

परिवार -

महामहोपाध्याय शिवदत्त शास्त्री’ नवान्तिक महाभाष्य’ केर भूमिका पृष्ठ मे पाणिनि आदि मुनि सभक बारे मे विस्तार सँ वर्णन कैने छथिन। एहि पोथी मे कथासरित्‌-सागर’, ‘वृहत्‌-कथा-मंजरी’ तथा ‘हरि-चरित चिन्तामणि’ पुस्तकक उद्धरण देल गेल अछि । ओहि उद्धरण मे आचार्य बोधायनक वर्णन सेहो भेल अछि । महाकविसोमदत्त द्वारा पैशाची (प्राकृत) भाषा मे लिखित ‘कथा-सरित-सागर’ तथा काश्मीरक महाकवि श्रमेन्द्र केर कृति ‘वृहत्‌-कथा-मञ्जरी’ केर निम्नांकित श्लोक सँ स्पष्ट अछि जे द्विजवर शंकर स्वामी के दूटा पुत्र छलनि-वर्ष तथा उपवर्ष । बैयाकरण पाणिनि केरगुरु ‘वर्ष’ छलाह । आचार्य वर्ष केर अनुज होयबाक कारणें बोधायन कें उपवर्ष कहल गेलनि -

" शंकरस्वामि नामाभूद्रब्राह्मणो वेदपारग : ।
वर्षोपवर्षो तस्यैमौ तनयावतनुत्विष : ॥
सम्प्राप्य विद्या मतुलां विश्रु तो लोक पूजित : ।
कनीयानुपर्षोऽस्य ममभर्तु : महाधन : ॥
पाणिनिर्नाम वर्षस्य शिष्य : पूर्वजडाश्रय : ।
तपसा शंकरं प्राप्य नवं व्याकरणं वशी ॥,
काल - निर्धारण -


निम्नांकित प्रमाण सँ बोधायनक कालाबधि निर्धारित कयल गेल अछि -

१. ‘हरिचरित चिन्तामणि’ नामक प्रबन्ध काव्य मे वर्णित प्रसंग सँ स्पष्ट अछि जे बोधानयक परिवार मगध-सम्राट्‌ राजा नन्द केर आश्रयी छलाह । अतः नन्द-काले बोधायनक समय निर्धारित हो‌इत छनि । ओ अवधि विक्रम सम्वत्‌ सँ तीन-चारि सय वर्ष पूर्व मानल गेल । ‘हरिचरित चिन्तामणि मे ‘गृह’ नामक शिवगण ‘वररुचि’ केर प्रति कहैत छथिन -

नन्दस्य नृपतेरसित पुरं पाटलिपुत्रकम्‌ ।
वर्षाख्यस्तव विप्रोस्ति तस्माद्विद्यामवाप्स्यथ: ॥३८॥

अर्थात्‌ बोधायनक ज्येष्ठा भ्राता ‘वर्ष’ पाटलिपुत्र नगरक राजा नन्दक ओतय विद्याक कार्य करैत (अध्यापक) छलाह ॥ ३८ ॥

अही पोथीक अन्य श्लोक देखू -

बभूव शंकरस्वामी नगरेस्मिन्दूनोत्तम: ।
मत्पतिस्तस्य पुत्रोयमुपवर्षस्तथा पुरा ॥ ४४ ॥

ई श्लोक बोधायनक मायक वचन छनि । अर्थात्‌ ज्येष्ठ भ्राता त राजा नन्दक ओतय शिक्षक रहथिन किन्तु पिता शंकर स्वामी अपन

पत्नी तथा छोटका बेटा ‘उपवर्ष’ केर संग ओही नगर में रहैत छलथिन ॥४४ ॥

२. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलकक मत छनि जे ‘गीता’ बोधायन सँ पूर्व केर अछि तथा बोधायनक अवधि कम सँ कम शकारंभ सँ चारि सय वर्ष पूर्व केर अछि । (सन्दर्भ - गीता रहस्य अथवा क्रर्मयोग परिशिष्ट भाग - पॉच/ वर्त्तमान गीता का काल/ हिन्दी अनुवाद/ तृतीय संस्करण/ पृ. ५६१/ पृ. ५६६/ पृ. ५६७)

३. गुरुकुल सँ प्रकाशित मासिक पुस्तक ‘वैदिक मेगजीन’ मार्ग पौष सम्वत्‌ १९७० अंक ६/७ पृष्ट ५२८ से ५३२ मे प्रकाशित श्री त्र्यम्बक गुरुनाथ काले महोदयक लेख सँ बोधायनक समयक निर्धारण भ’ सकैत अछि ।

४. श्री वूलर साहेबत Sacred Book of East Series भाग २/ इन्ट्रोडक्शन पेज xiii तथा भाग - चौदह/ इन्ट्रोडक्शन पेज xiiii में प्रकाशित लेख मे गीता तथा बोघायनक समय निर्धारणक जानकारी हो‌इत अछि ।

सारांश मे बोधायनक समय शकारंभ सँ चारि-पॉच सय वर्ष पूर्व केर हो‌इत अछि ॥

नामाकरण (नोमिनक्लेचर)-

दार्शनिक लोकनि अपन-अपन आदर-भाव सँ बोधायन केँ अनेक नाम सँ सम्बोधित कैने छथिन । जेना कि - वेद व्यास केर प्रशिष्य, शुकाचार्यक शिष्य, पुरुषोत्त्माचार्य, उपवर्ष, विशिष्टाद्वैत (समन्वय) सिद्धांत्तक प्रवर्तक, बोधायनाचार्य, आचार्य बोधायन इत्यादि ।

१. श्री रामानुजाचार्य अपन कृति ‘पाराशर-विजय’ मे स्पष्ट रुप सँ भगवान बोधायन के श्री वादरायण कृष्ण द्वैपायन वेदव्यासक प्रशिष्य से कहने छथिन । श्री रामानुज अपन एहि पोथी मे "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"- एहि वेदान्त- सूत्रक अर्थ मे लिखने छथिन -

उपदेशायोक्तादि स्वारस्याद्धर्मयोगत: ।
पूर्वोपदेशतश्चैक्यं पूर्वभागोपजीवनात्‌ ॥

एहि श्लोक ‘उपदेशात्‌’ एहि अंशक व्याख्या करैत रामानुज लिखने छथिन जे "उपदेश्स्तावद्भगवतो वेदव्यासस्यैकव्यवहित प्रशिष्यो भगवान बोधायन: परमर्षि: सम्प्रदाय विच्छेद शंकागंध रहित स्वाचार्य परमाचार्ययोरभिपेतमुपदेश सिद्वञ्च शास्त्रैक्यमुगृहाति ।"
यैह भगवान बोधायन पुरुषोतमाचार्य छथिन-

आचार्य: पुरुषोत्तम: सदपरं यस्वाभिधानं परम्‌ ।
श्रीबोधायन वृत्तिकृद्विजयंता बोधायन: शास्वतम्‌ ॥

३. स्वामी श्री रामानुजाचार्य अपन "श्रीभाष्य" केर सूक्ति मे भगवान बोधायने के विशिष्टाद्वैत (समन्वय) सिद्धान्तक प्रवर्त्तक आचार्य कहने छथिन । श्री भाष्य केर प्रथम प्रतिज्ञा वाक्य मे रामानुज लिखने छथिन -

" भगवद्‌ बोधायन कृतां विस्तीर्णां ब्राह्मा सूत्रवृन्तिं पूर्वाचाय्‌र्या: संचिक्षिपुस्तन्‌ मतानुसारेण सूत्राक्षरणि व्याख्या स्यन्ते ।"

एहि वाक्य मे पूर्वाचार्य:, संचिक्षिपु:" एवं "तन्‌मतानुसारेण" ई दूटा शब्द बड़ महत्तव अछि -

प्रथम शब्द "पूर्वाचायं:, संचिक्षिपु:" केर अर्थ भेल जे श्री रामानुज सँ पूर्वक आचार्य लोकन बोधायनक ‘वृत्ति-ग्रन्थ’ केर पूर्णतया परिशीलन करैत छलाह जाहि सँ ओ (रामानुज) ओहि वृत्तिग्रन्थ के संक्षेप कैलखिन । दोसर शब्द ‘तन्‌ मतानुसारेण" केर अर्थ भेल जे श्री भाष्यकार बोधायनक वृत्तिग्रन्थक सिद्धान्तक अनुसार "श्रीभाष्य" केर निर्माण करय मे अपना के गौरवान्वित मानैत छथिन ।

एहि सँ इहो घ्वनित हो‌इत अछि जे ताहि काल मे बोधायनक समन्यक सिद्धान्त बहुत गौरवक दृष्टि सँ देखल जा‌इत छल तथा बोधायनक ‘वृत्ति-ग्रन्थ’ दक्षिण भारतो मे प्रचलित छल । दुर्भाग्यवश आचार्य बोधायनक ओ ‘वृत्तिग्रन्थ’ एखन उपलब्ध नहि अछि ।

बोधायनक प्रति आदर -

त्रिकांड मीमांसा दर्शनक प्राय: सभटा भाष्यकार लोकनि वृत्तिकारक नाम लिखबा सँ पहिने ‘आचार्य बोधायन उपनाम उपवर्ष’ के आदर स्वरुप ‘भगवान’ शब्द सँ सम्बोधित कैने छथिन -

१. भाष्यकार शवर, : औत्पत्तिक सूत्र १.१.५ केर भाष्य मे लिखैत छथिन - गौरीत्यत्रक: शब्द:? गकारौकार विसर्जनीया इति भगवानुपवर्ष: इति वृत्तिकारस्य बोधायनस्यैव हि उपवर्ष: इति ख्यान्नाम तदिहपातज्जलादि प्रोक्तं प्रामाणिक मिति न भ्रमितव्यं ।" अर्थात ‘वत्तिकारयैव’ इत्यादि शब्द प्रमाणित करैत अछि जे भगवान बोधायने ‘उपवर्ष’ छथिन ।

२. आद्य शंकराचार्य : अद्वैत सिद्धान्तक भाष्यकार आद्य शंकराचार्य "एक आत्मन: शरीरे भावात्‌" (ब्रहमसूत्र (३/ ३/ ५३) केर भाष्य मे लिखने छथिन - ‘अत‌एव भगवतोपवर्षेण प्रथमे तंत्रे आत्माभिधान प्रक्षक्तौ, शारीरके वक्ष्याम , इत्युद्धार: कृत: । "

३. स्वामी रामनुजाचार्य : स्वामी रामानुज त’ बोधायनाचार्य के साक्षात्‌ भगवान कहने छथिन । स्वामी श्री रामानुज अपन ‘श्री भाष्य’ केर रचना बोधायनक सिद्धान्तक आधार पर करैत कहैत छथिन- ‘भगवान बोधायनकृतां विस्तीर्णा ब्रह्‌मसूत्र वृत्तिम्‌ ।"

४. वेदान्त देशिक वेंकटाचार्य : स्वामी रामानुज ‘श्री भाष्य’ केर रचना कयलनि । पुन: वेदान्त देशिक वेंकटाचार्य ‘श्रीभाष्य’ पर अपन ‘तत्त्वटीका’ लिखलनि । श्रीभाष्य पुस्तकक’ स्फोटक प्रकरण’ केर टीका मे बेंकट जी लिखने छथिन जे "वृत्तिकारोपज्ञं स्वमतमाह - ‘शब्दस्य एकरुपत्वमपि न साधीय’ इति अपि दूर्षण समुच्चयार्थ: । " एहि वाक्य मे "वृत्तिकारोपज्ञं स्वमताह- " ई वाक्यांश पाणिनीय सूत्र संख्या २/ ४/ २१- उपशोकक्रमे तदोदयोचिख्यासायाम्‌" केर आलोक मे ई तथ्य प्रमाणित करैत अछि जे वृत्तिकार भगवान बोधायने विशिष्टाद्वैत सिद्धान्तक प्रथम प्रवर्तक छथिन ।

५. सेश्वर मीमांसा : वेदान्त देशिक स्वामी वेंकट अपन रचना "सेश्वर मीमांसा" मे इहो बात लिखने छथिन जे- "जैमिनी बादरायणा उभयाभिप्रायवेदी भगवान बोधायन: विंशाति लक्षणीं मीमांसा परस्पर संगमाथ विस्तरेणं व्याख्यादिति वृद्धा विदामासु:॥" अर्थात्‌ वेदान्त देशिक महोदयक कहब छनि जे ब्रह्मसूत्रक पैघ वृत्ति केर सदृश मीमांसा पूर्व काण्डद्वय केर पैघ विस्तृत वृति पुस्तक भगवान बोधायन लिखने छालाह ॥

भगवान बोधायनरचित पुस्तक -

श्री बोधायन्‌ अनेक्‌ पोथी लिखलनि- जेनाकि वृहद्‌ वृत्ति ग्रंथ्‌, बोधाय्‌ श्रौत्‌ सूत्र्‌, गृह्‌यसूत्र्‌, धर्मसूत्र्‌, धर्मशास्त्रम्‌, बोधायन्‌ स्मृति, समन्वय्‌ सिद्धान्त्‌ इत्यादि ।

त्रिकांड्‌ मीमांसा दर्शनशास्त्रक्‌ भाष्यकार्‌ लोकनि बोधायनक्‌ जाहि पैघि वृत्ति ग्रंथ्‌ सभक्‌ उल्लेख्‌ कैने छथिन्‌, दुर्भाग्यवश्‌ ओ पोथी सभ्‌ एखन्‌ उपलब्ध्‌ नहि अछि । एखन्‌ बोधायन्‌ रचित्‌ मात्र्‌ तीनटा पोथी उपलब्ध्‌ अछि- बोधायन्‌ श्रौत्‌ सूत्र्‌, बोधायन्‌ गृह्‌य्‌ सूत्र्‌ तथा बोधायन्‌ स्मृति ।

लाहौर्‌ (पाकिस्तान्‌) केर्‌ प्रसिद्ध्‌ पुस्तक्‌ विक्रेता सर्वश्री मेहरचन्द्‌, लक्ष्मण्‌ दास्‌ (स्‌ंस्कृत्‌ पुस्तकालय्‌ प्रशाखा) केर्‌ सन्‌ १९३३ ईस्वी में प्रकाशित सूची पत्र में बोधायन रचित निम्नांकित पोथीक जानकारी भेटैत अछि -

१. बोधायन धर्मसूत्र (श्री गोविन्द स्वामी प्रणीत संस्कृत विवरण सहित) मूल्य आठ रूपये ।
२. बोधायन धर्मशास्त्रम्‌ (टिप्प्णी तथा शब्द सूची सहित) मूल्य चौदह रूपये ।
३. बोधायन श्रौत सूत्र (चौदहभाग में सम्पूर्ण, कलपकता) मूल्य तेरह रूपये ।
४. बोधायन गृह्‌य सूत्र (मूल सुन्दराक्षर, मद्रास)- मूल्य दो रूपये बारह आना ।
५. बोधायन पितृमेध (सूत्र संस्कृत मूल नोट तथा शब्दानुक्रमणिका सहित, यूरोप) मूल्य ग्यारह रूपये ।
६. बोधायन वृत्ति (वैशेषिक, बिडवी प्रेस, मिश्र, सन्‌ १९०० ई०)- मूल्य उन्तीस रूपये ।
७. बोधायन वृत्ति (वैशेषिक, हाबर्ट प्रेस, बरलिन, जर्मनी, सन्‌ १९०९ ई०)- मूल्य अठारह रूपये ।
८. बोधायन वृत्ति (महर्षि भरद्वाज प्रणीत वैज्ञानिक ग्रंथ, अंशुबोधिनी पर, हाबर्ट प्रेस, बरलिन, जर्मनी, सन्‌ १९०९ ई०)- मूल्य पचहत्तर रूपये ।

9. The Ritural sutra of Baudhayan Edited With text in roman Characters dy Dr. W. Calanb Forein Rs.. २/-.

(विशेष- अमर पितामह पं० बच्चा पाठक उर्फ प्रकाश पाठक लाहौर में अध्यापक छलाह । लाहौर कें भारतवर्षक ’पेरिस’ कहल जा‌इत छलैक । पाकिस्तान बनैत काल में प्रपितामह अपन मकान-मंदिर सभटा छोड़ि कय प्राणक रक्षा करैत मिथिला वापस आबि गेलाह । हुनके सन्दूक मे राखल फाटल-पुरान पोथी सभक संग में लाहौरक सूची-पत्र प्राप्त भेल छल । आब बोधायनक पोथी सभक उपलब्धि असम्भव अछि ।

चरैवति (भ्रमण करैत रहू) :

सन्यास आश्रम धारण कयलाक उपरान्त ‘उपवर्ष’ केर उपनाम ’पुरुषोत्तमाचार्य’ भेलनि । तथापि ओ ‘बोधायन’ केर नाम सँ प्रसिद्ध रहलाह । ओ अपन एकटा आश्रम ‘वनग्राम’ में स्थापित कयलनि । ओ सम्पूर्ण भारतक यात्रा कयलनि । जखन ओ उत्तराँचल मे छलाह त’ हुनक यश सुनि कय काश्मीर महाराज आचार्य बोधायन कें सादर अपना ओतय ल’ गेलखिन । ओकर उपरान्त ओ पुष्कर, अजयमेरू (अजमेर) हो‌इत द्वारिका तथा प्रभास क्षेत्र गेलाह । (संकेत-एखन प्रभास क्षेत्र अरब सागर मे एकटा द्वीप अछि, जतय सँ मात्र एक सय कि०मी० दूर मे कराँची पत्तन छैक) ।

महाप्रयाण :

द्वारिका : क्षेत्र मे ताप्ती नदीक तट पर अवस्थित श्री मैथिल महर्षि गौतम केर समाधि-स्थलक समीप मे तपस्या करैत भगवान बोधायन महाप्रयाण कयलनि ।

भगवान बोधायन स्वेच्छा सँ अन्न-जल त्याग देलनि, जेकरा ’प्रायोपवेशन’ कहल जा‌इत छैक । ओ पूर्व दिशा मे मुख करैत पद्मासन मे बैस गेलाह । कियेक त’ बोधायनक जन्मभूमि वनग्राम (सीतामढ़ी) गुजरात सँ पूर्व दिशा मे अवस्थित छैक । ओ अग्नि देवता के आह्‌वान कैलखिन । हुनका शरीर से सूर्यांश प्रवाहित भ’ गेलनि । भयंकर विस्फोट भेल । क्षण मे हुनक काया भस्मीभूत भ’ गेलनि ।
समाधि :

भगवान बोधायनक समाधि गुजरात प्रदेश मे सूरत नगरक समीप मे ताप्ती नदी-तट पर ‘बोधायनेश्वर तीर्थ’ केर नाम सँ प्रसिद्ध अछि ।

सारांश :

मिथिलाक विद्वान लोकनिक एकटा आदर्श परम्परा रहल अछि जे कोनो विशेष पंथक उपासक रहलाक बादो कोनो अन्य अनुयायी लोकनि सँ कोनो राग-द्वेष नहिं करैत छथि । मैथिल विद्वान ककरो शास्त्रार्थ सँ पराजित करैत छथिन न कि शस्त्र सँ । एहि आदर्श परम्पराक प्रवर्तक भगवान बोधायन छलाह । एकर प्रमाण अछि जे भगवान बोधायन अपन रचना मे विष्णु, शिव आदि देवता सभक वर्णन एक समान भाव सँ कैने छथिन ॥ इति ॥