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मिथिलांचल मे नृत्यक परम्परा

-डॉ. (श्रीमती) पुष्पम नारायण

मनुष्यक जीवन मे उत्पत्र भेल उमंगक बाह्म प्रकाश नृत्य अछि । जतय जीवनक उत्साह और उमंग अछि ओतहि नृत्य अछि । कोनो समाज के सुन्दर और संघबद्ध करबाक लेल लोकनृत्यक जन्म होइत अछि । ई लोकनृत्य कोनो एक व्यक्तिक सृष्टि नहिं अछि बल्कि एक सामूहिक सृष्टिक प्रक्रिया अछि जकरा समाज स्वीकृत करैत अछि । ई प्रारंभिक काल सँ प्रवहमान होइत समाज और संस्कृतिक एकटा अभिन्न अंग बनि गेल अछि । पूर्वक समाज मे जे व्यावहारिक नृत्य छल ओ देश, काल और समाजक परिवर्त्तन के संगहि-संग लोकनृत्य मे परिवर्तित भऽ गेल । लोकनृत्य पर भौगोलिक और प्राकृतिक वातावरणक प्रभाव पड़ैत अछि । नृत्यक कठोरता और कोमलता सँ ओहि अंचल के पर्यावरणक ज्ञान होइत अछि । संगहि समाजक सौंदर्य बोधक परिचय सेहो होइत अछि । लोकनृत्य सामाजिक ढाँचा मे पूर्ण रुप सँ ढरल रहैत अछि । विभिन्न आंचलिक प्रभाव युक्त भेष-भूषाक प्रयोग होइत अछि । नृत्य अपन रीति-नीति, आचार, व्यवहार, उत्सव, संस्कार आदि प्रथा सँ बान्हल रहैत अछि । केयो शास्त्र मे उल्लिखित देवी-देवताकेँ पूजैत छथि और केयो अपन समाज द्वारा स्वीकृत देवी-देवताक प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करैत छथि । ई दूनू प्रकारक आचार, निष्ठा और पूजा-अर्चना हुनक लोकनृत्य मे ओत-प्रोत होइत अछि ।

मिथिलांचलक संगीतक इतिहास ग्यारहवीं शताब्दी सँ प्रारम्भ भेल अछि । ओहि समय मे सिमराँव के कर्णाट राजवंशक आधिपत्य नान्यदेव (1097-1135 ई.) स्थापित कयलनि और मिथिलेश्‍वर के उपाधि सँ विभूति भेलाह । एहि ठामक संगीत परम्परा मे नृत्य के हस्तक और मुद्रासँ सम्बन्धित शास्त्र ग्रंथ "श्रीहस्त मुक्‍तावली" एक महत्वपूर्ण रचना थिक । एकर रचना खड़ोरे वंशीय मिथिला नरेश शुभंकर ठाकुर (1516-1607 ई.) कयलनि । एहि सँ पता चलैत अछि जे मध्यकालमे मिथिला मे नहिं केवल गीत संगीत बल्कि नृत्यक सेहो सम्मुनत परम्परा छल । "श्री हस्तमुक्‍तावली" के पांडुलिपि नेपाल दरबार के पुस्तकालय मे अछि । (Catalogue in theDurbar Library of Nepal 1907 pp 27) एक अन्य पांडुलिपि असमिया मे उपलब्ध अछि जाहि पर कोनो घनश्याम भाष्य लिखने छथि । कतेक विद्वानक धारणा छैन जे ई घनश्याम राजा शिवसिहक दरबारी गायक तथा नर्तक जयंतक प्रपौत्र छलथि ।

" ज्योतिरीश्‍वर वर्णरत्‍नाकर" मे लोकनृत्यक चर्चा करैत ‘लोरिक नाच्यो’ कहलथि अछि । विद्यापतिक कीर्तिलता (१४ वीं सदी) के दोसर अध्याय मे सिंगार-पर्व, गीत-नाट्‌य और नृत्यक उल्लेख अछि । मिथिलांचल के लोक संगीत के विकास मे लोकनृत्य परम्पराक महत्त्वपूर्ण स्थान अछि । संगीत मे सेहो ताल अछि और नृत्य मे सेहो लय । वस्तुतः ई दुनू एक दोसरक पूरक अछि । मिथिलांचल लोकसंगीत के विकासक परिप्रेक्ष्य मे लोकनृत्य पर दृष्टिपात्‌ करब आवश्यक अछि । ‘वर्णरत्‍नाकर’ क छठम्‌ कल्लोल मे ज्योतिरीश्‍वर नृत्य के चर्चा वृहत रुप सँ केने छथि जे मिथिलांचल मे नृत्यक अति प्राचीन परम्पराक द्योतक अछि । मिथिलांचल के प्राचीन नृत्य परम्परा, ओकर प्राचीन शब्द तथा संगीत के नृत्य सँ अभिन्नता सहज रुप सँ प्रतिपादित होइत अछि । नृत्य संगीतक सहचरी अछि । मिथिलांचल मे प्रचलित लोकनृत्यक शैली लोकसंगीत के अमरता प्रदान करैत अछि । ई शैली सबकेँ निम्लिखित भेद-प्रभेद सँ दर्शायल जा सकैछ ।

आदिम नृत्य :- विषहरा, अघौड़ी, लुखेसरी, बघेसरी और शशिया ।

लोकगाथा नृत्य :- लोरिक (कोबर नृत्य, वियोग नृत्य), सलहेस (बाघिन नृत्य, कुसुमा दोना नृत्य), नयका बनिजारा (प्रथम-मिलन नृत्य), डोमकछ नृत्य, दयाल सिंह (दयाल सिंह नृत्य, कमला नृत्य) एवं कमला कोयला । पौराणिक नृत्य :- राधा-कृष्ण नृत्य, रास, पारिजाहरण, चीर हरण, नारदीय, अंकिया, और कीर्त्तनिया ।
विद्यापति नृत्य :- शिवपक्ष (मान रक्षा नृत्य, भाव नृत्य), कृष्ण पक्ष (वतान-स्वरुप, वयः सन्धि:, मिलन, अभिसार, वियोग सद्यःस्त्राता एवं बाजत द्रिम द्रिम धौ द्रिमद्रिमिया) ।

सामाजिक न्रुत्य :- छकड़बाजी, असिनत्य, डामर, कामर, झरनी, बतहा-बतही नृत्य ।

नारी नृत्य :- नयना-जोगिन, घसकट्टी, सामा-चकेवा, जट-जटिन ।

शिशु नृत्य :- मेघनृत्य (करिया-झुमरि) एवं बगुला-बगुली ।
मिथिलांचलक लोकनृत्यक पृथक इतिहास अछि । लोकसंगीत केँ जीवित रखबाक लेल नृत्य सशक्‍त माध्यम होइत अछि । मिथिलांचल के उपर्युक्‍त लोकनृत्य मे किछुक परिचय एहि प्रकारें अछि :-

आदिम नृत्य :- जंगल युगक ई नृत्य पारम्परिक एवं प्राणवंत अछि । एकरा देवी प्रभाव सँ युक्‍त मानल जाइत अछि । एहि नृत्य के नर्त्तक भगता होइत अछि । भगता देवता विशेषक भाव करैत अछि । एहि नृत्यक प्रमुख वाद्य अछि-झालि, मृदंग और डंडताल । सब देवताक लेल निश्‍चित गीत अछि । गामक बाहर सब देवताक लेल थान या गहबर बनल रहैत अछि ।

विषहरा नृत्य :- ई सर्प नृत्य अछि । भगताक माथ पर छोट-पैघ कलश एक दोसर पर शिखराकार स्थापित रहैत अछि । हुनक हाथ मे धूपदान और बेंत रहैत छनि । गीत शुरु होइत अछि और भगता भाव मे आब’ लागैत छथि । बेंत साँपक प्रतीक, शिखराकार कलश जल कुण्ड के, जे नागक बिहार स्थल मानल जाइत अछि । धूपदान सँ बहराइत ज्वाला साँप विषक प्रतीक अछि और नर्तकक जीभ साँपक सदृश लपलपाइत रहैत छनि । ई वर्गक कतिपय नृत्य अछि बघेसरी, वीररस मे, लुखेसरी वात्सलय रस मे और शशिया नृत्य श्रृंगार रस मे । एहि नृत्यक प्रकार अपन पवित्रताक लेल मानल जाइत अछि ।

लोकगाथा नृत्य :- मिथिला मे लोकगाथा नृत्य अति प्राचीनकाल सँ प्रचलित अछि । विभिन्न जातिक ऐतिहासिक व्यक्‍तित्वक संबंध मे अधिक ओजस्वी शैली मे रचित गेय लोकगाथा आदि काल सँ प्रचलित अछि एकरा लोकमहाकाव्य सेहो कहल जाइत अछि । नृत्यक ई शैली अत्यधिक लोकप्रिय और मनोहारी अछि । कल्पना के उड़ान, कथानक के छवि-छटा, धीरोदात्त नायकक इन्द्रधनुषी चरित्र, ई सब मिली क’ एकटा अपूर्व वातावरणक सृष्टि करैत अछि । चूड़ीक संग तलवारक झंकार सेहो सुनाई दइत अछि । युद्ध और रोमांस हाथ मे हाथ मिलाक’ चलैत अछि । एहि नृत्य मे भक्‍ति, प्रेम और मनोरंजनक समावेश अछि ।
दुलरादयाल नृत्य :- ई पौराणिक प्रेमकथा पर आधारित लोकनृत्य अछि । झालि आ मृदंग एकर प्रमुख वाद्य अछि । नर्तक पहिने "आकर्षक" नृत्य करैत अछि, फेर होइत अछि उच्चाटन नृत्य, मोहन न्रुत्य और अन्त मे वशीकरण न्रुत्य । दुलरादयाल नृत्यक तांत्रिक स्वरुप सेहो ध्यातव्य अछि । दयाल सिंहक माथक स्वर्ण कलश माँ कमला के निवासक प्रतीक, शिवतत्व मे गंगाक प्रतीक, सुवर्ण अग्नितत्व, इनार (धुआँ) सुषुम्ना इनारक लहरा वृताकर चक्‍कर, चन्द्र तत्व ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना जत एकाकार होइत अछि ओहिठाम प्रयाग बनैत अछि । ओतहि जलक (नायिका अमरावती) प्राप्ति होइत अछि और दयालसिंहक हृदय कमल तृप्त भ’ जाइत छनि ।
कमला न्रुत्य :- दयाल सिंह क न्रुत्यक क्रम मे ई दोसर नृत्य अछि । नर्त्तक किशोर वय के होइत छथि । नील रंगक साड़ी मे ओ नवयौवनाक रुप मे उपस्थित कयल जाइत छथि । माथ पर कोड़िलाक मुकुट बनल रहैत अछि जाहि मे सुशोभित होइत कमलफूल, काशफूल, हंस और माछक आकृति । ई सब कमला नदीक प्रतीक अछि । कंचुकी के रंग पियर होइत अछि और हाथ मे होइत अछि पैघ उजर वस्त्र, वाद्ययंत्र मे झालि, मृदंग और दंफाक प्रयोग होइत अछि । गावक क्रम मे कमला मईयाक गीत जाइछ और फेर शुरु भ’ जाइत अछि वेगशील नृत्य । ई प्रचलित अछि जे नृत्यक अन्त मे यदि नर्त्तक के पकड़ि नहिं लेल जाय त’ नाचिते-नाचिते हुनक मृत्यु भ’ जाइत अछि । करुण रागिनी मे नर्त्तक के गीत सुनाई पड़ैत अछि - "कमला मईया नुआ पुराएब, नुआ पुरायब कमला मईया ।"
कमला-कोयला नृत्य :- किशोर नर्त्तक एहि नृत्य्क क्रम मे पूजा, नाव, पतवार-हिलोर और कटनियां के भाव उपस्थित करैत छथि । अन्त मे ओकर बलिदान्क नृत्य, नृत्य गीतक चरमोत्कर्ष उपस्थित करैत अछि ।
सलहेस नृत्य :- शैलेश अर्थात्‌ पहाड़क राजा शैलेश के कुसुमा और दोना दूटा मालिन नवयौवना प्रेम करैत रहथिन । जातिगत बन्धनक कारण हुनक मिलन नहि भऽ सकलनि । प्रेमक आगि मे जरैत कुसुमा-दोना आजीवन विलाप करैत रहली - "केश तिलकि गेल, वयस बीति गेल, राजा सलहेस लै आंचर बान्हलौं, बारह बरिष सँ आँचर बान्हलौ तैयो ने निरदइया दुसधा बुझई रे की ।" ई न्रुत्य पर्वत सँ जल विन्दु के किंकणी बजावैत निर्झरिणी के भाँति गतिशील अछि । एहि नृत्यक क्रम मे दुइटा नृत्य बाघिन नृत्य और कुसुमा-दोना आबैत अछि । एकर वाद्य मे बाँस, तम्बूरा और तार सँ बनल ‘धुना’ और चिक्‍कारा अछि जे मृदंग्क संग बजैत अछि ।
नयका बनिजारा नृत्य :- नयका बनिजारा प्रतापी व्यापारी रहथि । फुलेश्‍वरी हुनक परिणीता रहनि जिनका हुनकर अनुपस्थिति मे हुनक दुष्ट बहिन तिलेश्‍वरी काशी के वेश्या व्यापारी कुम्भा डोम के बेच दैत छथिन । बड़ कौशल सँ रानी फुलेश्‍वरी रस्ता भरि डोम सँ अपन सतीत्वक रक्षा करैत छथि । एहि दृश्य मे रसिक कुम्भा के हाथ मे चाबुक रहैत छनि । कुम्भाक मुद्रा उत्कट वासनाक लेल होइत अछि और फुलेश्‍वरीक मुद्रा मे करुणाक सागर लहराइत अछि । अन्त मे रानीक जीत होइत छनि । डोमक हृदयक वासना तिरोहित भऽ जाइत छनि । ई डोमकछ नृत्य" कहाइत अछि । एहि नृत्यक पृष्ठभूमि मे सारंगी क द्वारा विभिन्न रागिनी क भाव उत्पन्न कयल जाइत अछि । एहि नृत्य मे अन्धकार और आलोकक रहस्यमय मिलन होइत अछि और उत्तेजक क्षण मे नगाड़ा बाजि उठैत अछि ।
लोरिक नाच्यो :- आदिम नृत्य के उपरान्त ई सब सँ पुरान नृत्य अछि । ज्योतिरीश्‍वर ठाकुर सेहो "वर्णत्‍नाकर" मे एकर चर्चा कयने छथि । अखन धरि अपन ओजस्विताके कारण ई नृत्य जन समाज मे पूरा प्रचलित अछि । अपनहिं गण के श्रापित शिव लोरिक, पार्वती मांजरी और गंगा क रुप मे धरती पर अवतरित होइ छथि । नृत्यक शुरु मे आतंक, भय, क्रोध क भाव कियाक अन्त मे सोनिका क वध क’ लाश पर नृत्य करैत छथि । ई नृत्य दर्शक केँ आद्योपान्त बान्हने रखैत अछि । एकरे आधार पर कोबरक नृत्य कयल जाइत अछि । लोक-गाथा नृत्य क मध्य ई सवोत्कृष्ट नृत्य मानल जाइत अछि । एकर तीनटा चरण होइत अछि मोहनी नृत्य (वासना रुपक), कलह नृत्य, करण और आत्मसमर्पण । नारदीय नृत्य :- ई पौराणिक नृत्य पुराण पर आधारित अति प्राचीन न्रुत्य अछि । ई सत्य नारायण के चौपहरा पूजा के अवसर पर प्रदर्शित कयल जाइत अछि । झालि और मृदंगक संग नर्त्तक दल श्रीमन्ननरायण क धुनक संगहि-संग पूजा स्थलक अनवरत नृत्यमान भाव सँ परिक्रमा के क्रम मे तालक अनुसार तीनटा गति होइत अछि :-
(१) हंस गति (विलम्बित)
(२) मृग गति (द्रुत)
(३) गरुड़ गति (गुड़कान)
नर्त्तक के हाथ मे "करताल" होइत अछि और ई पिताम्बर धारण कयने रहैत छथि । गला मे तुलसी माला और कपार पर उजर तिलक रातिक विशेष पहर के अनुसार "श्रीमन्ननारायण" के धुनक विभिन्न राग-रागिनी मे गायल- बजायल जाइत अछि ।
रास नृत्य :- पुरान न्रुत्यमे कृष्ण समबन्धित नृत्य बहुत प्रचलित अछि । एहि मे सबसँ पुरान नृत्य अछि रास नृत्य । मृदंग और बाँसुरी एकर मुख्य वाद्य अछि । न्रुत्यमान गोपी के चलायमान वृत मे राधा कृष्णक नृत्य चलैत रहैत अछि ।
बाँसुरी नृत्य :- रास नृत्यक बाद एकरे स्थान अबैत अछि । एकर पृष्ठभूमि मे बाँसुरी बजैत रहैत अछि । राधा हाथ मे पुष्पमाला लेने रहैत छथि और श्रीकृष्ण मुरली । नृत्य मे राधा कृष्णक कथपोपकथन "गाब" सँ प्रारम्भ होइत अछि । पुनः गानभंग, प्रणय निवेदनक उपरान्त नृत्यक अन्त मे मिलन होइत अछि । राधा पीताम्बरी और लाल कंचुकी धारण कयने रहैत छथि और कृष्ण मोरमुकुट पीताम्बर और माला धारण कयने रहैत छथि । हुनकर मिलन अत्यधिक मोहक ढ़ंग सँ होइत छनि । नाचैत-नाचैत राधा कृष्णक गर्दनि मे माला पहिरा दैत छथिन आ कृष्ण पाछा घूमिक’ राधा केँ पाशबद्ध क’ उल्लासमय बाँसुरी बजाब’ लगैत छथि । नृत्यक विभिन्न स्थितिक संचालन बोल द्वारा होइत अछि ।
चीरहरण नृत्य :- ई नृत्य पहिने अधिक प्रसिद्ध रहैक । सारंगी और बांसुरीक सहारा सँ ई नृत्य कृष्णक संग गोपी क अनुराग भरल वातावरण मे चलैत अछि ।
पारिजातहरण नृत्य :- कृष्णक पत्‍नी सत्यभामा, पारिजात वृक्ष क लेल रुसि गेलीह । श्रीकृष्ण हुनका गरुड़ पर बैसा इन्द्र युद्ध कयलनि आ विजयी भऽ कऽ पारिजात वृक्षक संग द्वारिका ऐलाह । एहि नृत्य मे कोढ़ला आ भड़कीला वस्त्रक मदद सँ गरुड़ बनायल जाइत अछि । एकर वाद्ययंत्र तबला आ सारंगी अछि । ई एक प्रकारक नृत्य-नाट्‍य अछि । पृष्ठभूमि मे क्रमशः गीतक लय परिवर्त्तन होइत अछि और ओहिक अनुरुप नृत्य चलैत रहैत अछि ।
अंकिया या कीर्त्तनिया नृत्य :- अंकिया या कीर्त्तनिया नृत्य मिथिलांचल मे प्रचलित लोकनृत्य के अनुकरणक अनुरुप स्थल-स्थल पर शास्त्रीयता क पुट देखऽ मे भेटैत अछि ।
विद्यापति नृत्य :- पुरान नृत्यक अतिरिक्‍त मिथिला मे विद्यापति नृत्य सबठाम लोकप्रिय अछि । एकर दूटा पक्ष अछि - राधा-माधव पक्ष और हर-गौरा पक्ष । दूनू प्रकार मे राशा-माधव पक्ष क संख्या बेसी अछि । ई नृत्य वतान श्रेणीक नृत्य अछि । वतानक मतलब भाव-भंगिमाक माध्यम सँ अभिव्यक्‍ति, एहि शैली मे विद्यापतिक वयः सन्धि, राधा-कृष्ण दूती मिलन, अभिसार, मान, वियोग आदि पक्ष केँ अभिव्यक्‍तिक माध्यम बनायल जाइत अछि । महाकवि विधापति स्वयं एहि प्रकारक नृत्यक लेल व्यवहारक अनुकूल वाद्ययंत्रक चर्चा कयने छथि । "बाजत द्रिम द्रिम धौ द्रिम द्रिमिया, नटति कलावति मात श्याम संग, कर-करताल प्रबन्धक ध्वनियाँ, डिमडिम-डम्फ डिमिक डिम मादल, रुझुन मंजीर बोल" मुरज, रबाब, बीणा, स्वरमंहल और करताल आदि वाद्ययंत्रक नाम एहि नृत्यक क्रम मे आयल अछि । हर-गौरा पक्षक नृत्य मे मान रक्षा नृत्य बहुत प्रसिद्ध अछि । ई नृत्य महाकविक प्रसिद्ध नचारी पर आधारित अछि ।
" आजु नाथ एक व्रत महासुख लागत हे तोहें शिव धरु नट वेष, हम डमरु बाजाएव हे ।"
एहि नृत्य मे शिव नाचैत छथि और नाचक क्रम मे अपन चारिटा लाचारी सँ सेहो अवगत कराबैत छथि । ई नृत्य मधुर आ कलात्मक वैशिष्टय क लेल प्रसिद्ध अछि । पृष्ठभूमि मे नचारीक राग बँजैत अछि । शिव अपन भाव भंगिमाक माध्यम सँ किछु एहि प्रकारें प्रकट छथि जेना पार्वती नहि रहैत छथिन । गीतक अन्तिम कड़ी "तहुँ गौरा जेबह पराय नाच के देखत हे" के संग शिव भागैत पार्वती क पाछु बेकल भऽ चलि जाइत छथि ।
मनुहारी नृत्य :- नृत्य हास्य रस प्रधान अछि । एकर आधार विद्यापतिक ई पद अछि - "रुसि चलली भबानी तेजि महेश कर धैल कार्तिक गोद गणेश ।"
छकड़बाजी नृत्य :- ई नृत्य सामाजिक नृत्यक श्रेणीमे अबैत अछि । समाज मे एकर महत्त्वपूर्ण स्थान अछि । ई नृत्य इस्लामी महफिल के "साकी नृत्य" सँ प्रभावित अछि । जम्मा पहिरने पटुक्‍का लपेटने माथ पर जड़ीदार टोपी राखि कऽ किशोर वय क नर्त्तक एहि नृत्य केँ प्रदर्शित करैत छथि । सारंगी और तबला एकर मुख वाद्य अछि ।
आसि नृत्य :- एहि नृत्यक परम्परा अति प्राचीन काल सँ चलि आबि रहल अछि । आब एकर प्रचलन समाप्त अछि । एहि मे एक सैनिक अपन प्रेयसीकेँ छोड़ि एक दोसर नवयौवना सँ प्रेम करैत अछि । हुनकर प्रेयसी ई सब देखि लैत छथिन । क्रोध मे पागल भऽ कऽ ओ सैनिक के म्यान सँ तलवार निकाइल लैत छथि और पति केँ वक्ष पर प्रहार करबाक लेल कहैत छथि । लेकिन सैनिक के प्रति अगाध प्रेमक कारण वक्ष्क सामने लऽ जाक’ ओ तलवार म्यान मे राखि दैत छथि । एहि नृत्य मे सैनिक और हुनकर दुनू प्रेयसी मोहक मुद्रा उपस्थित करैत छथि ।
डामर नृत्य :- डामर नृत्यक इतिहास अति प्रचीन अछि । शिवक नचारी पर आधारित ई नृत्य केवल डमरु के ध्वनि पर अवलम्बित होइत अछि एहि गीतक चारिटा मुद्रा और चारिटा गीत होइत अछि - वसहा, त्रिशूल, सर्प और गंगाजल ।
झुकि क’ नचनाई और मस्ती मे सिर हिलेनाई - डोलेनाइ अछि बस्सह मुद्रा, दुनू हाथ उपर उठाकऽ नाचव अछि त्रिशुलक प्रतीक, पंक्‍तिबद्ध भऽ कऽ द्रुतगति सँ आगाँ बढ़ब सर्पक प्रतीक और वेग सँ उछलि क’ लहरिक तरहे आगाँ बढ़नाई अछि गंगा के धाराक प्रतीक । कमर और डामर नृत्य केकरो देखबाक लेल नहिं कयल जाइत अछि, वरन्‌ ओ स्वयं तन्मयताक स्थिति प्रदान करबाक लेल कयल जाइत अछि ।
बतहा-बतही नृत्य :- जूड़शीतलक अवसर पर भांगक गाछ, पत्थर, खल्ली, कारी रंग आदिक संयोग सँ एक व्यक्‍ति शिव बनैत अछि और दोसर पार्वती संगहि केयो बसहाक रुप धारण करैत अछि तऽ केयो बाघक । बाघ नाचैत, बसहा डोलैत और बतहा-बतही अर्थात्‌ शिव-पार्वती नृत्य करैत चलैत छथि । पाछु-पाछु माटि-कादो सँ किछु जन समुदाय भांगक नशा मे ढ़ोल, मृदंग और झालि बजबैत अनेक शिवक भक्‍त और हुनकर अनुसरण करैत छथि ।
झरनी नृत्य :- ई नृत्य हसन-हुसैन के शहादतक गाथा पर आधारित अछि । ई गरबा नृत्यक तरहें होइत अछि । सब नर्त्तक के हाथ मे बाँसक झरनी रहैत अछि । सब वृताकार भऽ कऽ गीत गावैत और चक्‍कर लगावैत छथि संगहि एक दोसर के झरनी पर प्रहार करैत अछि । पृष्ठभूमि मे मिथिलाक प्रसिद्ध वद्य ‘ताशा’ और ‘ढोल’ गड़गड़ाइत रहैत अछि ।
नारी नृत्य :- नारी नृत्यक चारिटा प्रचलित प्रकार अछि । एहि नृत्य मे पुरुष क लेल कोनो स्थान नहि अछि । ई नृत्य अछि नयना-जोगिन नृत्य, सामा-चकेवा नृत्य और जट-जटिन ।
नयना-जोगिन नृत्य :- विवाहक राति मे कोबर घर मे लऽ जाइत दुलहिन के साथ हुनक सब कुमारि बालिका क चारु कोन मे चित्रित नयना के चित्रक सामने सजा देल जाइत अछि और "नयन भंगिमा" नृत्यक बीच ओहि नृत्यमान बालाक बीच सँ वर केँ बधू चिन्हबाक लेल कहल जाइत अछि । अखन एकर स्वरुप मिथिला मे जीवित अछि । एहि नृत्य मे नयन भंगिमा और स्मित हास्यक प्रधानता होइत अछि ।
घसकट्टी नृत्य :- चतुर्थीक दिन वर आ वधू केँ दुर्वाक्षत सँ युक्‍त खेत मे लऽ जायल अछि । बाला क माथ पर झिलमिलाइत दीप माला होइत अछि और वर-वधू केँ वृत मे गीत गावैत ई चक्‍कर दैत छथि । एहि बीच वर सँ (घूमैत) घास काटक लेल कहल जाइत छनि । नृत्यक चरमावस्थाक आरम्भ तखन होइत अछि जखन वर काटल घासक बोझ वधूक माथ पर राख’ चाहैत छथि और ललना सभ वर सँ नहिं-नहिं क सस्वर कहैत छथिन ।
जट-जटिन नृत्य :- ई महिलाक सामूहिक नृत्य अछि । जट अर्थात शिव और जटिन अर्थात्‌ पार्वती । अनावृष्टिक स्थिति मे क्षितिज पर मेघ के बजयबाक लेल नृत्य प्रदर्शित कयल जाइत अछि । नारीक एक दल तरुण पुरुषक भेष मे और दोसर तरुणी भार्याक । दूनू दल आमने-सामने रहिकऽ गीतक माध्यम सँ कथोपकथन करैत अछि । बीच मे एकटा ऊखड़ि मे जल राखल एकटा मण्डुक । एकरे चारुकात सभ ललना मनहर नृत्य करैथ छथि ।
सामाचकेवा नृत्य :- ई नृत्य सेहो महिलाक सामूहिक नृत्य अछि । शारदागमन क संगहि संग हिमालय सँ आब’ वला हंस समूह क स्वागत मे ई नृत्योत्सव मनायल जाइत अछि । सब ललना क माथ पर बाँसक बनल सुन्दर चंगेरा होइत अछि । सबमें सामा-चकेवाक मनहर मूर्ति रहैछ जेकर मुँह सुन्दर नारीक होइत अछि, शरीरक छवि पक्षीक । चाँदनी राति मे दूर्वाच्छादित (कतहु-कतहु जोतल) खेत मे नृत्य चलैत अछि । गीत मे जतऽ भाइ के स्नेहक प्रशंसा कयल जाइत अछि ओतहि भौजी के स्वभावगत शुष्कताक निंदा । गीतक साथ नृत्य चलैत रहैत अछि । सब महिला क हाथ मे उल्का दंड रहैत अछि । माथ पर दीप मालिका सहित डाला, हाथ मे प्रज्वलित उल्कादंड, कंठ मे कोयल गीत और पैर मे गति, एक मोहक चित्ताकर्षक दृश्य क आयोजन करैत अछि ।
करिया झुमरि नृत्य :- ई एक प्रकारक मेघ नृत्य अछि । आषाढ़ मासक नया घनश्याम जखन क्षितिज पर मृदंग के समान गम्भीर गर्जन करैत जाइत अछि और विद्युल्लता रहि-रहिकऽ विहुँसत अछि तखन मिथिला के बालिका दू-दूटाक दल बनाक’ पैर सँ पैर मिलाक आंग्ल भाषाक आठक’ स्वरुप मे नाच’ लागैत छाथि । एकहि संग कै-कै टा जोड़ा नृत्य करैत रहैत अछि । हुनकर कारी-कारी केश फहराइत रहैत छनि जेना घनश्यामक वर्ण केँ चुनौती दऽ रहल छथि ।
बगुला-बगुली नृत्य :- मिथिला मे बालक द्वारा ई नृत्य बहुत प्रचलित अछि । पाँचटा बालकक द्वारा ई नृत्य सम्पादित होइत अछि । एक बालक मध्य मे खड़ा होइत अछि और चारिटा ओकर अलग-अलग एक-एकटा दिशा मे रहैत अछि । हाथ मे एक-एकटा रंगीन वस्त्रक एक छोड़ पकड़ि लैत अछि और नाचऽ लागैत अछि । ई गीत लयक द्वारा गीत केँ सन्तुलित रखैत अछि । प्रत्येक कड़ी क अन्त मे "बगुला-बगुली ओर के पार जो हमर नुआ सुखौने जो, भर-जोड़-जोड़ सँ हिलबैत अछि । नृत्य मे "मुंहबन्ध" करब बड़ जरुरी होइत अछि । एकरा एक प्रकारक शान्तिपाठ कहल जा सकैत अछि । कोनो-कोनो नृत्य के मुँहबन्ध मे राजा भीमसेन, मीरा-सुल्तान और रंगीला मुहम्मद शाह के नाम बेसी रुप सँ अबैत अछि । एकर बाद होइत अछि प्रार्थना । गणेश, गौड़, गंगाक प्रार्थना के बाद करुण स्वर मे नृत्यक देवी सरस्वती केँ विनती कयल जाइत अछि -
" कंठ दिअ सरस्वती माता"
" कोकिला सन दिअ भास"
कोनो-कोनो नृत्यमे नटराज शिव के सेहो प्रशंसा विशेष रुप सँ कयल जाइत अछि । धार्मिक साधना, आन्तरिक उद्वेग, भक्‍ति, श्रृंगार, पूजा, समाजक उल्लास और विभिन्न धाराक प्रतीक मिथिलाक मिथिलांचलक नृत्यक माध्यम सँ मिथिला क लोक संगीत मे रसमय भूमिक परिचय भेटैत अछि । आइयो मिथिला मे नृत्यक माध्यम सँ विद्यापति, गोविन्ददास, उमापति, लालदास, मुशी रघुनन्दन दास क गीत स्मरण कयल जाइत अछि । मिथिलांचल मे प्रचलित लोकनृत्यक अध्ययन अनुशीलन सँ प्रतिभाषित होइत अछि जे ओहि मे साहित्यक अनुपम धरोहर नुकायल अछि । वर्त्तमान परिवेश मे एहि बातक प्रयोजनीयता अछि जे ओकर समग्र स्वरुप केँ संकलित कऽ ओकर साहित्यिक स्वरुप केँ विद्वत वर्गक सामने उपस्थित क’ ओकर साहित्यिक मूल्यांकन करी । एहि ठामक प्रचलित लोकनृत्य के संग्रहीत करबाक दिशा मे सरकारक तरफ सँ समुचित प्रोत्साहन नहिं भेटैत अछि जाहि सँ ई मृत्तप्राय अवस्था मे चलि जा रहल अछि जेकरा संरक्षित रखबाक आवश्यकता अछि ।
(विश्‍वविद्यालय संगीत एवं नाट्‌य विभाग)
ललित नारायण मिथिला विश्‍वविद्यालय,
दरभंगा ।

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