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| नृत्यक परम्परा | लोकमूर्ति कला | नागपूजनक आयाम | गौरवभुमि सिमरौनगढ | |
| रंगमंचक विकास | महत्वपूर्ण बौद्धस्थल-महिषी | सौराठ सभा |
मैथिली रंगमंचक विकास
- प्रोफेसर डॉ. प्रेम शंकर सिंह
नाटक दूधारी विधा थिक । ई साहित्य सेहो अछि आ रंगमंच सेहो । किन्तु नाटककारक माध्यम मात्र भाषा थिक । अतएव एक नाटककारक हेतु एक वास्तविक चुनौती अछि-एक एहन भाषाक अन्वेषण जे एहि दूनू प्रयोजनकेँ एकहि संग साधि सकथि । रंगमंचक बुनियादी आधार अभिनय अछि । एहि दृष्टिसँ नाटकक साहित्यिक अर्थात् भाषागत उत्कृष्टताक कसौटी इहो अछि जे ओहिमे अभिनयक हेतु कतेक संभावनादि अछि । नाटककारक समस्याक समाधान सेहो इऐह अछि । साहित्यक दृष्टिसँ नाटकक श्रेष्ठता एहि बातमे निहित अछि जे ओ कतेक जटिल मानवीय स्थिति द्वन्द्व, मनक सूक्ष्मतम परत एवं अन्तर्द्वन्द्व आदिक आवेगमय मार्मिकताकेँ उभारि पबैत अछि । जे नाटक जाहि सीमा धरि एहन क’ पबैछ ओहिमे अभिनयक संभावना ओतबे अधिक निहित होइत अछि, कारण जटिल स्थिति एवं चरित्र आर ओकर सूक्ष्मतम अन्तर्द्वन्द्व केँ सम्प्रेषित क’ पयबामे अभिनयक उत्कृष्टता सिद्ध होइत अछि । एक रेखीय वा एकायामी चरित्र वा स्थितिकेँ चाहे कतबो रंगमंचीय युक्ति वा प्रदर्शन परक तामझामक संग प्रस्तुत कयल जाय ओहिसँ कोनो उत्कृष्ट रंगमंचीय कृतिक जन्म नहि भ’ पबैछ, कारण ओहि मे मानवीय मनक गंभीर अन्तर्द्वन्द्व रंगमंचीय युक्ति प्रदर्शन कौशलक प्रयोग हैबाक चाही ।
मैथिली रंगमंचक स्वरुप ओ विकास यात्रासँ अवगत हैबाक हेतु हमरा मूलतः एकर नाट्य साहित्यक अध्ययन-अनुशीलनसँ रंगमंचक विकास यात्राक बोध करय पड़य, किऐक तँ मैथिली रंगमंचक प्रसंग मे उल्लेखनीय तत्वक सर्वथा अभाव अछि । साहित्येतिहासक तथ्यक पर्यालोचनसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि जे उत्तर भारतक भाषा सहित्य मे मैथिली नाटकक उपलब्धि सर्वधिक प्राचीन अछि, कारण नाटकक प्रचार- प्रसार तखने संभव अछि जखनकि रंगमंचक व्यवस्थित परंपरा हो । एकर अभावमे नाटकक कल्पना करब युक्ति संगत नहि प्रतीत होइत अछि । एहन स्थितिमे जखन हम नाट्य-साहित्य दिस दृक्पात करैत छी तखन ई मानय पडैत अछि जे सुव्यस्थित श्रृंखला एतय वर्त्तमान छल, जकर फलस्वरुप मैथिली साहित्यमे विपुल नाट्य संपदाक परंपरा देखबाक हेतु भेटैत अछि ।
मैथिली रंगमंचक विकास-यात्रा पर विचार करैत छी तँ एकर ई स्वरुप हमरा समक्ष अछि- लोक मंच ओ रंगमंच । मैथिली लोक मंचक विकास कहिया भेल ई कहब अत्यन्त कठिन प्रतीत होइछ, किन्तु उपलब्ध साहित्यक आधार पर संभवतः एकर विकास यात्रा प्रागैतिहासिक शताब्दीसँ मानल जा सकैछ । मिथिलांचलक ई सौभाग्य थिक जे लोक-मंचक माध्यमे पृथक-पृथक अंचलमे लोकानुरंजनक रुपमे जीवित अछि । लोक जीवनमे बाँचल रहनिहार एहि श्रेणीक रंगमंच तँ मात्र एहि विशाल भू-भागमे रंगमंचीय निरन्तरता बनौने रहल; प्रत्युत अपन सहज स्वाभाविक स्थानीय लोक नाट्य-परंपराक एक मिश्रित समन्वित रुपकेँ शताब्दी धरि अक्षुण्ण राखलक । मैथिली रंगमंचक अध्ययनक ई एक पक्ष अछि जे मैथिलीक प्राचीन महत्वपूर्ण कलाक रुपमे पुनरुद्धार एवं पुनरुज्जीवन प्राप्त कयलक ।
लोकमंच :
लोकमंचक दृष्टिसँ मिथिलामे प्रचलित लोक-नृत्यक महत्त्वपूर्ण स्थान अछि । जखन साहित्यिक परंपरा नहि छल तखन जन सामान्य रंगमंचक माध्यमे एहि श्रृंखलाकेँ कायम कयलक । लोकगीतक समान लोक-नृत्यमे मिथिलाक सांस्कृतिक अन्तरात्माक प्रतिध्वनि सुनबा मे अबैत अछि तथा एकरा माध्यमे लोक-जीवनक दृश्य सेहो हमरा सभक समक्ष अबैछ । एहि प्रकारक नृत्यक कथानकमे नैसर्गिक सुन्दरता एवं उल्लास एवं एतयक जीवनमे परिव्याप्त व्यापक दरिद्रता पर आधारित होयबाक कारणेँ अत्यधिक मर्मस्पर्शी, भाव-पूर्व एवं आकर्षक अछि । वस्तुतः लोकनृत्य हमर दुःखमय जीवनकेँ सुखमय बनयबाक प्रयास करैछ । विशेषतः मिथिलांचलक लोकनृत्य एहन प्राणवन्त अछि जे सतत हमरा जीवनकेँ सुखमय बनौने रहैत अछि ।
सम्पूर्ण मिथिलांचल ग्रामीण क्षेत्र अछि । ग्राम्य जीवनक प्रमुखताक कारणेँ लोक-जीवनक जतेक भव्य स्वरुप लोकमंच मे उपलब्य अछि ततेक अन्यत्र दुर्लभ । वस्तुतः मिथिलांचक ग्रामीण जीवन सभ्यतासँ पृथक अछि तकर परिणाम एतबा अवश्य भेलैक जे ओ अपन प्राचीन स्वरुपकेँ तद्वत सुरक्षित रखने अछि । एकर रुप रंग एवं रसमे अद्यापि कोनो परिवर्त्तन नहि भेल अछि । भौगोलिक दृष्टिसँ मिथिलाक बनावटि लोकनाट्यक हेतु सर्वथा अनुकूल अछि । इऐह कारण अछि जे एतय अनेक लोक-नाट्य सुरक्षित रहल । एहि भूमि मे लोकनाट्यक विविधताक दर्शन होइत अछि । एक समान भूमि नाट्य रुपकेँ सीमित एवं संकीर्ण बनबैत अछि । नाट्य विविधता तथा विकासशीलता हेतु भूमिक विविध सूक्ष्मता आवश्यक प्रतीत होइछ । हमर लोकनाट्यक विशाल सुदृढ़ ऐतिहासिक परंपरा अछि । मिथिलांचलमे निम्नस्थ लोक नाट्यक अनुष्ठानगत परंपरा प्रचलित अछि जाहिमे लोकमंचक स्वरुपक दिग्दर्शन होइछ यथा - दसौत, सामा-चकेवा, झिझिया, जटा-जटिन, झुमरि, रमखेलिया, डोमकछ, लोरिक=सलहेस, गोपीचन्द, विदापत, हरिलता एवं विहुला आदिक उल्लेख लोकनाट्यान्तर्गत कयल जाइछ । एकर अतिरिक्त अन्य प्रचलित लोक-नाट्य यथा-चौपहरा, नारदी, नयना-योगिन, भाव, झड़नी, पमरिया आदिक उल्लेख सेहो भेल जाहि दिशा मे अनुसंधानक प्रयोजन अछि ।
उपर्युक्त विश्लेषणसँ ई स्पस्ष्ट भ’ जाइछ जे एहि प्रागैतिहासिक एवं ऐतिहासिक कृतिमे लोक-जीवनक चित्रांकन भेल अछि जे मैथिली साहित्यक अमूल्य निधि थिक । एहिमे लोक जीवनक परम्परा, लोक विश्वास एवं अनुश्रुति रुपमे सुरक्षित रहल जे समयक गतिमे शनैः- शनैः हमर साहित्यकेँ प्रभावित कयलक । ई परंपरा चिरन्तनसँ विकसित होइत रहल तथा ओकर मान्यता ओकर प्रतिमान युगक अभिरुचिक अनुकूल परिवर्तित होइत गेल । एहि परंपराक चित्र, संगीत एवं अभिनयक वास्तविक विश्लेषण कयल जाय तँ ओहिमे लोक जीवनक स्पष्ट छाप परिलक्षित हैत । उपर्युक्त परम्पराक पृष्ठभूमिमे भरत, धनंजय, अभिनवगुप्त, नन्दिकेश्वर तथा रामचन्द्र गुणचन्द्र आदि नादयाचार्य लोक जीवनसँ प्रेरणा ग्रहणक’ कए नाट्यधर्मी नाटकक रचना करबाक प्रेरणा देलनि ।
एहि परंपराक परिप्रेक्ष्यमे मिथिलांचलक लोकमंच विभिन्न आख्यान पर आधारित भ’ विकसित भेल जकर दिग्दर्शन उपलब्ध होइछ जाहिमे मिथिलांचक लोक-जीवनक विभिन्न समस्याकेँ प्रतिपादित कयल गेल जे हमर साहित्यक अक्षय भंडार थिक । सभ्यता एवं विकासक नाम पर नागरिक जीवन लोक जीवनकेँ अनेक क्षेत्रमे प्रभावित कयने जा रहल अछि । एहना स्थिति मे प्रयोजन अछि मैथिली लोक अनुरंजक साधनकेँ यथावत संग्रहीत कयल जाय । मैथिली लोकनाट्यक अध्ययन मात्र मौलिक एवं ज्ञान विस्तारकेँ नहि प्रत्युत लोक जीवनक सांस्कृतिक स्वरुपक सुरक्षाक दृष्टिएँ हमर साहित्यक हेतु उपयोगी हैत । नाटक ओ रंगमंच परस्परालम्बित अछि । कारण नाटक भाषिक कंकाल थिक एवं रंगमंच ओकर प्राण प्रतिष्ठा करैछ । नाटकक आन्दोलनक फलस्वरुप मैथिली रंगमंचक विकास अत्यन्त तीव्र गतिएँ भेल । यद्यपि मैथिली नाट्य-साहित्यक विपुल सामग्री रहितहुँ रंगमंचीय कौशलक दृष्टिएँ विश्लेषण भेल अछि बीसम शताब्दीक सप्तम दशाब्दमे । जतेक दूर धरि मैथिली रंगमंचक प्रश्न अछि एहि प्रसंग मे एहि पाँतीक लेखक अपन पोथी "मैथिली नाटक ओ रंगमंच" मे सर्वप्रथम विस्तार पूर्वक विश्लेषण कयलनि । स्वान्त्रयोत्तर भारत मे क्षेत्रीय रंगमंचक स्तर सँ नाटक-लेखनमे तीव्रता आयल आर प्रत्येक क्षेत्रसँ रंगमंचक प्रसंग मे चिन्तन-मननक नव आयामक स्त्रोत प्रवाहित होमय लागल । पूर्वक अपेक्षा आधुनिक रंगमंच क्रमशः विकसित भेल जा रहल अछि । एहि प्रकारेँ मैथिली रंगमंचक स्वरुपक विकास मिथिला एवं मिथिलेत्तर क्षेत्र मे विभिन्न स्थान पर भेल तकर विश्लेषण पृथक-पृथक रुपेँ प्रस्तुत कयल जा रहल अछि ।
शनैः शनैः मुसलमानक आधिपत्य मिथिला पर अधिक होमय लागल जकर फलस्वरुप जातीयता एवं धार्मिकताकेँ सुरक्षित रखबाक हेतु मैथिल विद्वत-मंडली नेपाल जाक’ आश्रय लेलनि तकर प्रसादात नेपाल मे मैथिली भाषा ओ साहित्यक व्यापक प्रचार-प्रसार भेल । नेपाल पर मुसलमानक प्रभाव नहि छल । एहि प्रसंगमे डॉ. ए. बी. कीथक कथन छानि जे वस्तुतः नाटक ओहि भूभागक आश्रय लेलक जतय मुसलमानक शक्तिक प्रभाव कम छल । मल्ल राजा लोकनिकेँ मैथिलीक प्रति अगाध प्रेम छलनि । मल्ल वंशक राजा लोकनिकेँ सेहो संगीतक प्रति अगाध अभिरुचि छलनि आ हुनका सभक संपर्क मिथिलाक संगीतज्ञ लोकनिसँ भेलाक फलस्वरुप ओतय एक वैभव पूर्ण रंगमंचक आविर्भाव भेल । वस्तुतः रंगमंचक स्वरुप ओ विकासमे मल्ल राजा लोकनिक सहयोग स्तुत्य अछि । एहि वंशक अनेक राजा लोकनि स्वयं अपन आश्रित नाटककार द्वारा राज-दरवारक रंगमंचक परंपरा सुरक्षित राखलनि । तद्युगीन समाज मे नाटकक अतिरिक्त मनोरंजनक कोनो दोसर साधन नहि छल । अतएव एहि दिशा मे प्रत्येक नरेशक ध्यान अधिक रहैत छलनि । ओ एहि बातसँ अवगत रहथि जे रंगमंचक माध्यमे समाजकेँ आह्लादित कयल जा सकैछ । जय स्थित मल्ल स्वयं नाट्य विधाक अत्यन्त पारखी छलाह । ओ अनेक कलाविद एवं साहित्यकारकेँ आश्रय द’ कए प्रोत्साहित कयने छलाह । हिनक पुत्र धर्म मल्लक जन्मोत्सव पर रामायण नाटकक अभिनय भेल छल । हुनकर विवाहोत्सव पर "भैरवानन्द नाटकम्" केँ मंचस्थ कयल गेल छल ।
एहि प्रकारेँ नेपालमे रंगमंचक परंपरा दरवारमे सुरक्षित छल, किन्तु दर्शक वर्गमे प्रत्येक वर्गक लोक रहैत छलाह । नेपालस्थ मैथिली नाटकमे अंकक विभाजन नहि भेल अछि, प्रत्युत ओहि स्थल पर दिवसक उल्लेख भेटैत अछि । यथा "इति प्रथमांक अथ द्वितीय दिवसे" । रंगमंचक दृष्यिएँ ई अत्यन्त साधारण छल । नेपाल स्थित रंगमंचमे परम्परागत नियमक पालन कयल गेल अछि जेना महादेवक स्तुतिक पश्चात् नान्दी पाठ एवं सूत्रधारक प्रवेश इत्यादि । रंगमंच पर सूत्रधार उपस्थित भ’ कए पुष्पांजलि श्लोकपदिक प्रस्तावनाक उल्लेख करैत छलाह । प्रस्तावनाक पश्चात् मुख्य कथांश प्रारंभ होइत छल । पात्रक प्रवेशक सूचना मैथिली गीतमे उपलब्ध होइत अछि । रंगमंचीय निर्देश नेवारी भाषा मे उपलब्ध भेटैत अछि । कतहु-कतहु परंपरागत संस्कृत नाटकक समान भरत-वाक्यक प्रयोग भेल अछि । नृत्य आ गीतक बाहुल्यक फलस्वरुप जीवनक यथार्थताक चित्रण एहि मे नहि भेल अछि । एहि मे काल्पनिकताक आश्रय लेल गेल अछि । रंगमंचक दृष्यिएँ एहि नाटकक प्राण आ वाद्ययंत्र आवश्यक अंग थिक । एहि नाटकक जतेक गीत उपलब्ध अछि ओ सभ राग, ताल-लय निवद्ध अछि । नाटककार, सूत्रधार आ अभिनेता संगीत विशारद होइत छलाह जकर पुष्ट प्रमाण नाटकमे प्रयुक्त गीतक पारायणसँ होइत अछि । एहि प्रकारक नाटककेँ दिनमे मंचस्थ कयल जाइत छल तथा कथानक धार्मिकता एवं पौराणिकतासँ ओतप्रोत छल । नेपाल मे मैथिली नाटकक अभिनय ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक अवसर पर होइत छल । इतेह कारण अछि जे मैथिली रंगमंचक एक सुव्यवस्थित कड़ी निश्चित रुपेँ वर्त्तमान छल ।
नेपालीय मैथिली नाट्य साहित्यक आधार पर मैथिली रंगमंचक विकास अभिनयक अवसर, राज्य-वर्णन, नगर-वर्णन, राग-रागिनी, नाटकक प्रवेश गीत, परिचय गीत, प्रसंग गीत आदिक अतिरिक्त नृत्य आ संगीतक प्रधानताक कारणेँ सूर्य विक्रमज्ञयानी एकर तुलना यूरोपीय आपेराक संग कयलनि अछि । नेपाल स्थित मैथिली रंगमंचक विकास सिमरौनगढ़, मल्लक उपत्यका एवं मानकपुर मे भेल । मल्लकालीन मंचस्थ मैथिली नाटकक नाटककार, रचनाकाल एवं अभिनयक सूचना भेटैत अछि । मैथिली रंगमंचक प्रारंभिक विकसित स्वरूप नेपाल मे भेटैत अछि जे वस्तुतः एकर आधार स्तंभ कहल जा सकैछ ।
उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यमे वर्त्तमान शताब्दीक प्रारंभिक चरणसँ ल’ कए अद्यपर्यन्त रंगमंचक व्यवस्थित परंपरा अनुवर्त्तमान अछि । रंगमंचक विकासक दिशा मे नव कल्प देबाक प्रयासमे मिथिला नाट्य कला परिषद, चित्रगुप्त सांस्कृतिक केन्द्र, जनकपुर, भानु मोरंग कला केन्द्र, विराट नगर, अर्पण कला परिषद, गागुली, धनुषा, नव जीवन नाट्य कला परिषद, युवा नाट्यकला परिषद, परवाहा इत्यादिक अतिरिक्त तोहना, बभनगामा, ठेरा, कनक पट्टी, बिसविट्टी, तिलाठी, देवडीहा, बनौली, जलेश्वर, महिनाथपुर, बसहिया, कुम्हरौरा आदि मैथिली रंगमंचकेँ देखैत ओहिठामक रंगमंचक बदलैत स्वरुपक अभिज्ञान करबैत अछि । उपर्युक्त संस्थामेसँ भानु मोरंग कला केन्द्र विराट नगर एवं चित्रगुप्त सांस्कृतिक केन्द्र जनकपुरकेँ ई श्रेय छैक जे पटना ओ दिल्लीमे कतिपय प्रदर्शन क’ चुकल अछि ।
नेपालक मैथिली रंगमंचक चर्चाक्रममे विद्या चौधरी, उमा श्रेष्ठ, सुभद्रा हमाल, उर्मिला अयाल, अनामिका भंडारी, रमा श्रेष्ठ, रेखा कुमारी कर्ण एवं सुमधु बराल आदि अभिनेत्रीक सेवा अधिक उल्लेखनीय अछि जे एहि विधाक विकासार्थ अपन अपरिमित सेवा क’ रहल छथि । कतिपय मैथिल जे नेपालक विभिन्न अंचलमे बसल छथि ओ सेहो अपन सक्रिय सहयोगसँ एकर विकासार्थ संलग्न छथि । नेपालस्थ मैथिली रंगमंचक प्रसंग मे १९८४ केँ संभावनाक वर्ष मानल जाय तँ कोनो अत्युक्ति नहि । ई श्रेय छनि महेन्द्र मलंगियाकेँ जनिक पहलसँ किछु सफल प्रदर्शनक आयोजन एहि दिस नव संभावनाकेँ बढ़ा देलक अछि । महिला रंगकर्मीक सक्रिय सहयोगक फलस्वरुप एकर विकासमे नव गति आयल अछि । किन्तु समर्पित कलाकार योगेन्द्र नेपालीक आकस्मिक निधनसँ नेपालस्थ मैथिली रंगमंचकेँ एक अपूर्णीय क्षति भेल अछि । प्रदर्शनक सूची विशाल भ’ जयबाक कारणेँ ओकर चर्चा नहि कयल जा रहल अछि । नेपालक ग्रामीण मंच एखनो नहि उठि सकल अछि तेँ प्रोत्साहनक अपेक्षा रखैत अछि । निजी स्तर पर जे प्रयास भ’ रहल अछि ओ उत्साहवर्द्धक थिक । अतएव मैथिली रंगमंचक विकासक अपरिमित संभावना नेपालमे दृष्टिगत भ’ रहल अछि तथा प्रयोजन अछि जे उपर्युक्त संस्थादि द्वारा अद्यापि मंचस्थ नाटकक वृहत सूची प्रकाशित कयल जाय जे मैथिली रंगमंचक कड़ी केँ सुव्यवस्थित स्वरुप प्रदान करबा मे सहायक सिद्ध हो ।
असम स्थित मैथिली रंगमंच :
मैथिली रंगमंचक वास्तविक विस्तृत रुप असममे उपलब्ध होइत अछि । वैष्णव संत युग-पुरुष शंकरदेव रंगमंचक दिशा मे क्रांतिकारी डेग उठौलनि जकर परिणाम भेल जे रंगमंचकेँ एक नव-दिशा भेटलैक । ओ सूत्रधारकेँ प्रस्तावनाक सीमन्त परिधिसँ निकालि नाटकमे आद्योपान्त उपस्थित कयलनि । गद्य संवादकेँ सेहो भाषा मे निबद्ध कयलनि तथा संस्कृत एवं प्राकृतक प्रयोग ओतहि कयलनि जतय ओकर आवश्यकता बुझलनि । अंकीयानाटमे प्रयुक्त भाषा असमिया मिश्रित मैथिली थिक । ई एक आश्चर्यक विषय थिक जे शंकर देव अपन नाटकक हेतु एक नूतन चयन कयलनि जखन कि ओ असमियामे अनेक पुस्तक लिखने छथि । ई एक रहस्यमय प्रहेलिका थिक । ओ संस्कृत नाटकक विशेषताक संगहि संगीतक पद्धतिकेँ अपनौलनि । ओ गीतगोविन्दक शैलीकेँ स्वीकार कयलनि तथा असमलोक जीवनसँ अनुप्राणित भ’ कए एहि नव नाट्य विधाकेँ जन्म देलनि । एहि परंपराक परिप्रेक्ष्यमे असम मे एक अभिनव रंगमंचक विकास भेल जाहि मे शंकरदेव जन-नाट्य-शैलीक अनुसरण करैत नट-नटी ओ सामाजिकक बीच संबंध जोड़लनि ।
वैष्णव-संतसँ पूर्व असममे "देवधानी नाच" "पुतलानाच" एवं "ओझा पालि" क तथा "दैनिपाल" के एहि रंगमंच पर आनल गेल । एहि रंगमंच पर नाटकक प्रदर्शन रातिमे भोजनोपरान्त प्रारंभ होइत छल । नाटक पैघ रहैत छल तँ ओकर प्रदर्शन दिनमे प्रारम्भ भ’ जाइत छल । एहि रंगमंचक कार्य प्रायः अवकाशक समय मे होइत छल । एकर प्रदर्शनमे अभिनेता भाग लैत छलाह । संस्कृत नाट्यशालामे भाग लेनिहार अभिनेताक सम्मान समाजमे नहिए जकाँ छल, किन्तु एकर विपरीत स्थिति असमिया नाट्य- प्रस्तुतिमे भाग लेनिहार अभिनेताक छल । ओ समाज मे सम्मानक दृष्टिएँ देखल जाइत छलाह । एकर अभिनेता पांडित्यपूर्ण उत्कृष्ट कलाकार, सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिज्ञ रहैत छलाह जे अपन प्रतिष्ठाक विनु ह्रासक अनुभव कयने रंगमंच पर उपस्थित होइत छलाह । एकर अभिनेता सूत्रधार प्रत्येक पात्रक आगमनक सूचना दैत रहथि । अभिनेता सूत्रधार अत्यधिक सुसंस्कृत ओ प्रभावशाली होइत छलाह । सूत्रधार प्रत्येक पात्रक आगमनक सूचना दैत रहथि । अभिनेता अपन वेश-भूषाक प्रति अत्यधिक साकांक्ष रहैत छलाह । कम वयसक किशोरावस्थाक बालककेँ स्त्रियोचित वस्त्रा-भूषणसँ सुसज्जित कयल जाइत छल एहिमे विभिन्न प्रदर्शनक हेतु मुखौटाक प्रयोग कयल जाइत छल । प्रसाधनोपयोगी वस्तुकेँ "खनिकर" मे रखबाक परंपरा छल । संगीत एहि प्रस्तुतिक प्राण स्वरुप छल । स्वयं शंकरदेव संगीतक पूर्णज्ञाता रहथि । "धेमाल" अंकीया नाटक पूर्व रंगकेँ कहल जाइत अछि तथा एकर रंगशालाकेँ "नाम घर" ओ रंगशाला स्थायी रुपसँ निर्मित रहैत छल जाहिमे वैष्णव संत समय- समय पर नाट्य प्रस्तुति करथि । एकर सटलहि "गरभागृह" रहैत छलैक । किछु प्रदर्शन अस्थायी रंगशाला खुजल मैदान मे विशेष पर्वक अवसर पर होइत छल जकरा "सभा गृह" कहल जाइत छलैक । एकर दृश्य-विधानमे कोनो पद्धति नहि छल । जाहि दृश्यमे नाटक प्रारंभ होइत छल तकर अन्त ओही दृश्यमे भ’ जाइत छलैक । एहि नाट्य-प्रदर्शनक समाप्ति पर "मंगल गीत" वा "मुक्ति मंगल महिमा गीत" क संग होइत छल । एहि प्रकारक गीतक माध्यमे समाजक प्रति शुभकामना प्रगट कयल जाइत छल ।
उपर्युक्त तथ्यक पर्यालोचनसँ स्पष्ट भ’ जाइछ जे असममे मैथिली रंगमंच के एक व्यवस्थित स्वरुप प्रदान कयल गेल कारण एकर परिधि धार्मिकताक भावनासँ ओतप्रोत छल । एहि प्रकारेँ एहन नाट्य-प्रस्तुति धार्मिकताक भावनासँ ओतप्रोत संगहि संग मनोविनोदात्मक सेहो बनि गेल । एहि रंगमंचकेँ दरबारमे सेहो अधिक प्रश्रय भेटय लागल । विशेषतः विदेशसँ जखन कोनो राजा असम अबैत रहथि तखन ई नाट्य-प्रदर्शन निश्चित रुपेँ होइत छल । समयक क्रममे एहि रंगमंचकेँ राजकीय स्तर भेटि गेलैक । वस्तुतः असम स्थित रंगमंच सेहो मैथिली रंगमंचक विकाससे एक महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलक जाहिसँ ओ द्रुत गतिएँ आगाँ बढ़ल ।
मिथिला स्थित मैथिली रंगमंच :
जखन मिथिला स्थित रंगमंच पर विचार करैत छी तखन कोनो ऐतिहासिक पुष्ट प्रमाण नहि उपलब्ध होइत अछि जाहि आधार पर कल्पना कयल जा सकय जे एतय नाट्याभिनयक परम्परा वर्त्तमान छल । तथापि मिथिलामे अनेक केन्द्र एखनो वर्त्तमान अछि जाहि आधारपर रंगमंचक कल्पना कयल जा सकय । हाटी मे एहि नाट्य-मंडलीक नेता बबुजन नायक, लगमाक अजब लाल झा, आलापुरक खुशीदास, सरिसव एवं गंधवारि आ शेरपुरमे उमाकान्त झा एहि दलक नेता रहथि । मिथिलामे एहि प्रकारक नेताकेँ जामति कहल जाइत छलनि । एकर नेताकेँ "नायक" सेहो कहल जाइत छलनि जे सूत्रधारक ओ प्रमुख अभिनेताक रुपमे रंगमंच पर उपस्थित होइत छलाह । एहिमे महिला वर्गक सर्वथा अभाव छल । रंगमंच पर महिलाक उपस्थिति अनिवार्य भेला पर पुरुष पात्रक द्वारा महिलाक अभिनय कराओल जाइत छल । ई रंगमंच प्रत्येकक हेतु उन्मुक्त छल । अभिनेताक योग्यता इऐह छल जे ओ "मान" "नचारी" ओ तिरहुति गयबामे निपुण होइत छलाह । एहि प्रकारेँ मिथिलाँचलमे नाट्य प्रदर्शनक श्रीगणेश भेल । नांदी पाठोत्तर विशेष वेश-भूषामे सुसज्जित भ’ कए सूत्रधार प्रवेश करैत छलाह । नायक "जामा", "नीमा", "पैजामा" पहिरैत छलाह । सूत्रधारक हाथ मे एक विशेष प्रकारक छड़ी रहैत छल जकरा "फुलहत्था" कहल जाइत छलैक । ओकर पैरमे "पादुका" तथा माथ पर मिथिलाक परम्परागत "पाग" रहैत छलैक । एहि रंगमंच पर अभिनेता एवं पात्रक संख्या अत्यन्त सीमित छलैक । प्रवेश गीतक पश्चात् नायक नायिका दू तीन सखी, नारद वा घटक आ विदूषक वा विपटा द्वारा एहि नाटकक प्रदर्शन होइत छल । रंगमंच-निर्देश संस्कृत वा प्राकृतमे उपलब्ध होइत अछि । एकर अतिरिक्त मैथिली मे गीतक माध्यमे भाव व्यक्त कयल जाइत छल । एकर दर्शक वर्ग मे सभ तरहक व्यक्ति उपस्थित रहैत छलाह । एहि प्रदर्शनमे वाद्यिक एवं यांत्रिक-संगीतक प्रधानताक संगहि संग विदूषकक हास्य आ आकर्षक गीतक माध्यमसँ विभिन्न वस्तुकेँ प्रदर्शित कयल जाइत छल । उपर्युक्त परंपराक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली नाट्य-साहित्यक इतिहासमे अनेक नाटक उपलब्ध अछि ; जे लोकप्रियता उमापतिक "पारिजातहरण" केँ भेटलैक ओहन ककरो नहि । वस्तुतः एहि नाटकक काव्यात्मक प्रभाव पड़ल । वर्त्तमान शताब्दीक सातम दशाब्द मे मैथिली रंगमंचक इतिहाससे एक पैघ विवाद उपस्थित भेल । डॉ. जयकान्त मिश्र अपन "ए हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर", वालुम -१ मे एहन नाटककेँ कीर्त्तनियाँ नाटक कहलनि, किन्तु एकर विपरीत रमानाथ झा "प्रबन्ध संग्रह" १९६३ मे कहलनि जे मिथिलामे नाचक परंपरा अवश्य छल, किन्तु नाटकक सर्वथा अभाव छल । डॉ. प्रेमशंकर सिंह "मैथिली नाटक ओ रंगमंच" १९७८ मे अपन मन्तव्य देलनि जे जाधरि अभिनयक सबल परंपरा नहि छल ताधरि नाटक लिखले ने जायत । डॉ. सिंह एकरा लीला नाटक कहि ओकर सत्यता पर मोहर लगौलनि जे भगवतक विशेष लीलाक प्रदर्शनार्थ लीला-रंगमंचक प्रादुर्भाव मिथिलांचलमे भेल । एहि रंगमंच पर पात्रक प्रवेशक सूचना दर्शकेँ "प्रवेश गीत" क माध्यमे देल जाइत छलनि । एहि गीतमे पात्रक पूर्ण परिचय, वेश-भूषा, अंग-विन्यास, मनोभाव, चरित्रगत विशेषता, व्यक्तित्व एवं प्रसंगोपयुक्त तृप्ति प्रस्तुत कयल जाइत छल । एकर प्रवेश गीत आधुनिक नाटक सदृश रंग निर्देशकक कार्य करैत अछि । नाटकक कथांश तपस्या, विवाह, युद्ध भोजन इत्यादिकेँ गीतक माध्यमे सामाजिककेँ सूचित कयल जाइत छल । दूरस्थ प्रसंगकेँ सेहो गीतक माध्यमे जोड़ल जाइत छल ।
एहि विश्लेषणसँ स्पष्ट होइत अछि जे लीला रंगमंचक दुइ स्वरुप अछि - प्रथमक अन्तर्गत कथोपकथनमे संस्कृत एवं प्राकृत तथा गीत मैथिलीमे ओ द्वितीय रंग-निर्देशमे संस्कृत प्राकृतक सर्वथा वहिष्कार । किछु नाटक एहन अछि जाहिमे संस्कृतक सर्वथा अभाव अछि तथा कथांश पद्यमे निबद्ध अछि । एहि विश्लेषणसँ स्पष्ट होइछ जे प्रथम रुपक रचना विद्वन्मण्डली एवं राजदरवारीक रंगमंचक हेतु भेल तथा द्वितीय जन सामान्यक हेतु छल । नाटककार जनसामान्यक हृदयकेँ आकर्षित करबाक हेतु अपन नाटकमे सरस गीतक प्रयोग कयलनि । एहि सँ स्पष्ट अछि जे नाटककारकेँ रंगमंच अभिनियता ओ विभिन्न रुपक सामाजिक एवं हुनक रुचिकेँ ध्यानमे राखि नाट्य-रचना कयलनि । उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यमे मिथिला स्थित रंगमंचक परम्पराकेँ कायम राखल गेल । रंगमंचक एहि स्वरुपक व्यापक प्रभाव पड़ल जकर फलस्वरुप स्वातन्त्रयोत्तर काल अबैत-अबैत मैथिली रंगमंच अत्यन्त व्यापक रुप अपना लेलक ।
मैथिली रंगमंचक विकसित रुप :
रंगमंचक इतिहास साक्षी अछि जे बम्बई सँ ल’ कए कलकत्ता धरि सम्पूर्ण देशमे रंगकर्मी संस्थाक व्यापक प्रभाव परिलक्षित होइत अछि, किन्तु जतेक दूर धरि मैथिली रंगमंचक प्रश्न अछि ओ उपेक्षित रहल किन्तु परंपरागत रुपसँ मैथिली रंगमंचक जे परंपरा चलि आबि रहल छल तकरा पुनर्जीवित करबाक दिशामे मिथिलांचल एवं मिथिलेत्तर क्षेत्रक रंगकर्मी प्रेमी सचेष्टता देखौलनि तकर फलस्वरुप मैतिली रंगमंचक विकसित परंपराक स्थापना भेल अछि । अध्ययनक सुविधाक दृष्टिएँ एकरा दुइ काल खण्ड मे विभाजित क’ कए एकर अनुशीलन करब वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे अत्यावश्यक प्रतीत भ’ रहल अछि ।
मिथिलांचलक ग्रामांचलक रंगमंच :
बीसम शताब्दीमे आबिक’ आइ प्रायः कोनो गाम नहि अछि जतयकि नाट्याभिनय नहि होइत हो । किछु ग्रामांचक एहन अछि जतय निश्चित रुपसँ नाट्याभिनय एवं रंगमंचक परम्परा वर्त्तमान अछि ताहिमे निम्नांकित रंगकर्मी संस्थादि उल्लेखनीय अछि यथा-मधुबनी नाट्य-संघ १९३२, नाट्य परिषद सरिसवपाही, विद्वान्नाट्य परिषद १९१७, नवटोल , नाट्य परिषद १९२३ पिण्डारुछ, भद्रकाली नाट्य- परिषद कोइलख इत्यादि । मैथिली रंगमंचक विकासक परंपरामे किछु नाट्यकर्मी संस्थादि मिथिलांचलमे सतत नाट्याभिनयक आयोजन करैत रहल अछि जाहिमे उल्लेखनीय अछि - कला निकेतन रतपुड़ा, रंगवाणी, लहेरियासराय, युवक संघ बरहा बेनीपट्टी, नाट्यकला परिषद पुतई, कारज नाट्य परिषद कारज, समाज सुधार संघ नवानी, हरिपुर डीह टोल, काली मंदिर कटिहार, गन्धवारि नाट्य परिषद्, नाट्यकला परिषद माऊँबेहट, नवयुवक संघ भटराघाट, नाट्य-परिषद सझुआर, नाट्यकला परिषद् होरपुर, युवक नाट्यकला परिषद निकासी, ग्राम एकता समिति भौर, श्यामा नाट्य परिषद् चनौर, राढ़ी नाट्य परिषद राढ़ी, मिथिला नाट्यकला परिषद सरिसव, तरुण नाट्यकला परिषद बिट्ठो, पंचायत नाट्य परिषद सिंहवाड़ा, जमसम नाट्य परिषद्, जमसम, राजग्राम नाट्य परिषद, किशोर नाट्य परिषद धमदाहा, तरुण नाट्य परिषद माऊँबेहट, कीर्तिनाथ कला परिषद लालगंज, भच्छी नाट्य समिति भच्छी, घनानाथ नाट्य परिष्द्, राहठौर नाट्य परिषद् योगियारा, कृष्णकला परिषद् उजान, श्याम नाट्य परिषद भौर, उग्रतारा नाट्यकला परिषद् पहीटोल, दुर्गा कला केन्द्र उजान एवं दुर्गा नाट्य कला परिषद् नवटोल उल्लेखनीय अछि ।
उपर्युक्त नाट्य संस्थादिक प्रस्तुतिक अतिरिक्त मिथिलांचलक निम्नस्थ ग्रामांचलमे यथा कविलपुर गजहारा, खोजपुर, दंगा, भवानीपुर, भटपुरा, नवानी चनौर, वीरसायर, लोहना, पतोर, पनिचोभ, लालगंज, सरिसव, शेरपुर, लगमा, सहमौरा, शाहपुर, मोहनपुर, पंडौल, समौल इत्यादि स्थानमे निश्चित रुपें नाट्याभिनयक आयोजन होइत रहल अछि । वस्तुतः एहि समयमे विद्यालय एवं महाविद्यालयमे शिक्षित वर्ग द्वारा नाट्य प्रदर्शनक स्थायी मंचक स्थापना भ’ गेल अछि । अनेक स्थानमे उत्साही युवक जखन कर्मलोकमे व्यस्तभ’ गेलाह तखन जनसाधारणक अप्रवृत्तिक कारणेँ एहि प्रकारक स्थायी रंगमंच नष्ट भ’ गेल अछि ।
पटनास्थ रंगमंच :
रंगमंचक विकास यात्रामे पटनास्थ मैथिली रंगमंचक विविध रंगकर्मी संस्थादिक योगदानान्तर्गत अभूतपूर्व कहल जा सकैछ । डॉ. प्रेमशंकर सिंह "मैथिली नाट्य ओ रंगमंच" एवं "मैथिली नवीन साहित्य" मे एहि संस्थादिक द्वारा रंगमंचक विकास यात्राक उल्लेख कयने छथि । रंगमंचक माध्यमे पटनास्थ मैथिली नाट्य साहित्य समुन्नतक श्रेणी मे परिगणित भ’ सकल अछि अन्यथा मैथिली नाटकमे नव-नव तकनिकक नाटक रचना संभव नहि छल । चेतना समितिक तत्वावधानमे नाट्य मंच १९७२ मे स्थापित कयल गेल । एहि संस्थाक प्रधान उद्देश्य आधुनिक नाटकक प्रणयन एवं मंचन रहल तथा ई कतिपय नाटकक प्रकाशन सेहो कयलक । अद्यावधि जतेक नाटकक प्रस्तुति एहि संस्थाक तत्वावधानमे भेल अछि ओ सभ अत्यधिक लोकप्रियता अर्जित कयलक अछि । अभिनय कलाक दृष्टिसँ जतेक कलाकार भाग लेलनि अछि ओहि मे क्यो पछड़ल नहि कहल जा सकैछ । रंगमंचक विकास यात्रा मे एहि संस्थाक महत्त्व एहि विषयकेँ ल’ कए अछि जे एकरा द्वारा अभिनीत नाटकमे नारी पात्रक भूमिकामे मैथिलानी कलाकारक सहयोग स्तुत्य अछि । एहि संस्था द्वारा अद्यापि तीससँ वेशी प्रदर्शन कयल गेल अछि । ई संस्था जीवित अछि तथा नाट्य प्रदर्शन मे लागल अछि ।
मैथिली रंगमंचक विकासार्थ अरिपन १९८२ नाट्यायोजनक क्षेत्र मे एक अभिनव भूमिकाक निर्वाह कयलक अछि जकर ज्वलन्त प्रमाण अछि जे पाँच बेर एहि संस्थाक तत्वावधानमे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर साप्ताहिक नाट्य महोत्सवक आयोजन कयल गेल अछि जे निश्चये मैथिली रंगान्दोलनक इतिहासमे एक नव आयाम कहल जा सकैछ । प्रथम सँ चतुर्थ नाट्यायोजन तँ पटनहिमे भेल, किन्तु पंचम नाट्य सप्ताहक आयोजन दिल्लीमे भेल । एहि रंगकर्मी संस्थाक चर्चा रंगक्षेत्र मे एहि कारणेँ विशेष उल्लेखनीय अछि जे प्रत्येक समारोहक अवसर पर नाट्य-लेखनक एवं नाट्य-मंचनक प्रतियोगिताक आयोजन सेहो कयल जाइत छल । एहि प्रतियोगिताक सद्यः प्रभाव ई भेल जे नाट्य साहित्यक अध्ययन एवं लेखन दिस लोकक ध्यानाकर्षित भेलैक ।
रंगमंचानुकुल भंगिमाक स्थापना १९८४ ई. पटनाक प्रबुद्ध रंगप्रेमी लोकनिक द्वारा कयल गेल । एकर लोकप्रियताक अनुमान तँ एही सँ कयल जा सकैछ जे अपन प्रवेश वर्ष मे चारि नाटकक प्रदर्शन क’ कए मैथिली रंग-आन्दोलनमे अपन परिचय देलक । अपन अत्यन्त अत्यल्प अवधिमे सीमित साधन ल’ कए चलल ई संस्था सफलताक सीढ़ी पर आगाँ बढ़ि रहल अछि । एहि रंगकर्मी संस्थाक दुई प्रधान उद्देश्य अछि - एकतँ कलाकारकेँ संगठितक’ कए नाट्य प्रदर्शन तथा नाट्य सम्बन्धी पत्रिकाक प्रकाशन । एहि संस्थाक द्वारा अद्यावधि सय सँ अधिक नाट्य मंचस्थ कयल गेल अछि । २२ अंक धरि नियमित रुपेँ पत्रिकाक प्रकाशन रहल अछि । एहि रंगकर्मी संस्थासँ सम्बद्ध रंगकर्मी सतत कार्यरत अछि । संगहि ओकर गुणात्मकता दिस वेशी साकांक्ष तथा सचेष्ट बुझना जाइछ । एकर प्रत्येक प्रस्तुति रंगकर्मक प्रति एकर दृष्टिकोण, उद्देश्य आ लक्ष्यक द्योतक रहल । लोकक अनुमान छैक जे ई रंगकर्मी रंगान्दोलनमे सिरमौर प्रमाणित भेल अछि । एहि संस्था द्वारा प्रकाशित नाट्य-विषयक अनियत्कालीन पत्रिकाक प्रकाशन आन्दोलनकेँ नव दिशा देत ई हमर विश्वास अछि । पटनाक अन्य रंगकर्मी संस्थादिमे उल्लेखनीय अछि सांस्कृतिक मंच, लोहिया नगर, कला समिति, गर्दनी बाग, रंग लोक इत्यादि ।
मिथिलेत्तर क्षेत्रक रंगमंच :
मिथिलांचलसँ जीवकोपार्जनार्थ जे मैथिल मिथिलेत्तर क्षेत्र मे चल गेल छथि हुनका हृदय मे अपन मातृभाषाक प्रति अगाध श्रद्दा ओ संभावना छनि तकरे प्रतिफल थिक जे कतिपय नाट्य संस्थाक स्थापना संभव भ’ सकल अछि जाहि मे उल्लेखनीय अछि मिथिलाक्षर जमशेदपुर, मिथिला सांस्कृतिक परिषद बोकारो स्टील सीटी, उगना विद्यापति परिषद एवं नवतरंग इत्यादि । उपर्युक्त संस्थादिक द्वारा अनेक नाटक मंचस्थ कयल गेल अछि जकर सूचना संस्था द्वारा प्रकाशित स्मारिकादिमे उपलब्ध अछि । आवश्यकता एहि विषयक अछि जे ओहि संस्थादिक क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत कयल जाय जकर परिप्रेक्ष्यमे ओकर समुचित विश्लेषण कयल जा सकय ।
प्रवासी रंगकर्मी :
ऐतिहासिक तथ्यक अध्ययन अनुशीलनसँ स्पष्ट भ’ जाइछ जे मातृभाषाक विकासार्थ प्रवासी लोकनि रंगमंचक अभ्युत्थानार्थ जेहन सत्प्रयास कयलनि अछि ओहि रुपक कार्य मिथिलांचल क्षेत्र मे नहि भेल अछि । जतेक दूर धरि रंगमंचक प्रश्न अछि ओहि दिशा मे दिल्ली एवं कलकत्ताक मैथिली प्रेमीक सेवा सहयोग इतिहासक पन्ना मे स्वर्णाक्षरमे अंकित कयल जायत । दिल्ली एवं कलकत्तामे समान रुपक कार्य प्रारंभ भेल किन्तु कलकत्ता एहि क्षेत्र मे अग्रगण्य अछि । कलकत्तास्थ मैथिली सतत विद्यापति जयन्ती, कवीश्वर चन्दा झा जयन्ती, संस्थादिक वार्षिकोत्सव एवं मैथिली दिवसक अवसर पर नाट्यायोजन करैत रहल अछि । कलकत्ताक रंगकर्मी केँ अधिक सफलता भेटल तकर प्रधान कारण बंगला रंगमंचक सामीप्य कहल जा सकैछ । बंगला रंगमंच पर प्रदर्शित होइत नव-नाट्य शिल्पसँ मैथिली साहित्यानुरागी बड़ वेशी प्रभावित भेलाह तथा मैथिली संस्थादिक आयोजनोत्सव पर नाट्य प्रस्तुतिक श्रीगणेश कयलनि । कलकत्तास्थ रंगमंचक संस्थादिमे कला केन्द्र, मैथिली रंगमंच, अखिल भारतीय मिथिला संघ, कूर्मि क्षत्रिय छात्रवृति कोष, मिथियात्रिक, ऑल इण्डिया मैथिल संघ एवं मिथिलामित्र संघ सदृश रंगकर्मी संस्थादि द्वारा नव नाट्यान्दोलन अनेक नाट्ककारकेँ प्रेरित कयलक जे बीसम शाताब्दीक सप्तम दशाब्दमे लिखल गेल नाटक अव्यावसायिक रंगमंचक हेतु अत्यधिक उपादेय प्रमाणित भेल । हमर मान्यता अछि जे एहि दुइ दशाब्दमे मैथिली नाट्य-साहित्यकेँ सम्पोषित करबाक सब श्रेय छैक कलकत्तास्थ मैथिली रंगमंचकेँ । अखिल भारतीय मिथिला संघ दिल्लीक तत्वावधानमे अद्यापि मात्र दुइ नाटक अभिनीत भेल अछि जे रंगमंचीय कौशलक दृष्टिएँ सफल प्रदर्शन नहि कहल जा सकैछ ।
ई श्रेय प्रवासीकेँछनि जे अनेक बेर लघुमंच पर सफलतापूर्वक अभिनय क’ चुकल छथि । मैथिली नाट्याभिनयक इतिहासमे अध्ययन कक्षीय नाटक एवं पथवर्त्ती नाटकक सफल प्रयोग कलकत्ताक मैथिली रंगमंच कयलक । किन्तु दुर्योगक विषय थिक जे प्रवासी मैथिल द्वारा जाहि उत्साह ओ तत्परताक संग रंगमंचकेँ स्थापित कयल गेल ओही पारस्परिक वैमनस्यता ओ कटुताक संग ओ सभ काल कवलित भ’ गेल अछि जाहि सँ रंगमंचक भविष्य धुमिल भ’ गेल अछि ।
महिला रंगकर्मीक भूमिका :
भारतीय नाट्य मंच पर महिला सदिखन समस्यामूलक रहल अछि । प्रत्येक उन्नत भाषाक रंगकर्म एहि समस्यासँ कम वेशी अद्यापि ग्रस्त अछि । मैथिली रंगमंच सेहो तीन दशकसँ कतेको सार्थक नाटक मंचित करबासँ वंचित रहि गेल अइ । समाजक कतोक पारंपरिक धारणा आ नारीक प्रति पूर्वाग्रह नारीकेँ घरक सीमन्त चौखटिसँ मंचक सीढ़ी धरि नहि आबय दैत छैक । समाजक उलहन उपराग सुनैत किछुए नारी रंगमंचक प्रति प्रतिबद्ध रहि पबैत छथि आ संस्कृतिक एहि विशिष्ट विधामे अपनाकेँ समर्पित क’ दैत छथि । अद्यावधि कोनो तथ्यपरक सूचना नहि भेटल अछि जे मिथिलान्तर्गत नाट्य प्रदर्शनमे महिला रंगकर्मी सहभागी भेल होथि । जँ कदाचित एहि दिशा मे प्रयास कयास कयल जाय तँ संभव अछि जे नाट्य-प्रदर्शनमे महिला रंगकर्मी सहभागी भ’ सकैछ । पटनास्थ जे रंगकर्मी संस्थादि अछि ओहि पर १९५८ मे सुभद्रा झा मैथिली रंगमंचक इतिहासमे सशक्त हस्ताक्षर कयलनि जे पश्चात् जाक’ मीलक पाथर प्रमाणित भेल । तत्पश्चात् भंगिमा एवं अरिपनक अनेक रंगकर्मी महिला कलालार रंगमंच पर उपस्थित भेलीह जाहि मे सर्वाधिक उल्लेखनीय छथि प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’ । मिथिलेत्तर क्षेत्र मे कलकत्ता मे मंचस्थ मैथिली नाटकमे कतिपय महिला रंगकर्मी सहभागी भेलीह जे मैथिलानी तँ नहि रहथि; किन्तु मैथिली सीखी क’ ओ सभ रंगमंच पर प्रस्तुत भेलीह । बंगला रंगमंचक कुशल अभिनेत्री सभ मैथिली रंगमंच पर उपस्थित भेलीह जकर प्रभाव अन्यान्य रंगकर्मी प्रेमी महिला पर पड़ल तथा एहि दिशा मे अग्रसर भ’ कए प्रदर्शन केँ सार्थक बनौलनि । अन्यान्य भाषाक रंगमंच द्रुतगतिएँ आगाँ बढ़ि रहल अछि तकर प्रधान कारण अछि जे हुनका सभक भावना उच्च छनि । जँ कदाचित कोनो महिला एहि दिस उन्मुखो छथि तँ हुनक पैर पाछाँ खींचल जाइत अछि । आब युग परिवर्त्तित भ’ गेल अछि तेँ रंगमंचकेँ आगाँ बढ़यबामे हुनक सक्रिय सहयोगक आवश्यकता प्रतीत भ’ रहल अछि ।
नाट्योपकरणक विविध प्रयोग :
नाट्योपकरणक विविध प्रयोग मैथिली रंगमंचक संदर्भमे सर्वप्रथम कलकत्ता स्थित मंच पर कयल गेल जकर विस्तृत विश्लेषण करबाक श्रेय छनि मैथिली नाटक ओ रंगमंचक प्रस्तोता डॉ. प्रेम शंकर सिंहकेँ । रंगमंच पर नाटककेँ नव जीवन प्रदान कयल जाइछ । वस्तुतः नाटकतँ स्थुल भाषिक कंकाल थिक जकर प्राण प्रतिष्ठा होइछ रंगमंच पर । नाट्यकृति ओ विन्दु थिक जाहि पर रंगमंचीय प्रस्तुतिक समारंभ होइछ । इऐह कारण अछि जे ओकर सत्ताकेँ प्राथमिक महत्त्व देल जाइछ । एहि संदर्भ मे एतबा अवश्य कहल जाइछ जे नाट्य परस्तुतिक माध्यमे रंगमंच, अभिनेता, मिथिला एवं मिथिलेत्तर क्षेत्रक कुशल अभिनेता एवं अभिनेत्री, अव्यावसायिक रंगमंचक निर्देशक, रंगमंचक भाषा, दर्शक, आलोक, संपात, रंग-निर्देश, अभिकल्पक, नृत्य एवं संगीत, दृश्य संयोजन, पूर्वाभ्यास, मंचसज्जा, वेश- भूषा ओ रुपसज्जा इत्यादिक वृहत विश्लेषण "मैथिली नाटक ओ रंगमंच" मे कयल गेल अछि । एहि मे समालोचक मात्र मिथिले क्षेत्रक नहि, प्रत्युत मिथिलेत्तर क्षेत्रक कलाकार लोकनिक वृहत-विश्लेषण कयलनि अछि । वस्तुतः एहि दशकमे मैथिली रंगमंच अपन प्रयोगावस्था मे अछि, किन्तु एतवा स्वीकार करबामे कोनो तारतम्य नहि होइछ जे नवीन संघर्षशील परिस्थितिमे नाट्य परंपराक विकासकेँ जीवन स्तर पर प्रतिष्ठित कयलक अछि । सम्पूर्ण नवोन्वेषमे रंगमंचक विकास यात्रा एक नव अध्यायक श्रीगणेश कयलक अछि । नाटककार एवं रंगमंचक घनिष्ठ सम्पर्क तथा अपना केँ प्रस्तुतकर्त्ता, निर्देशक, अभिनेता एवं दर्शकसँ संयुक्त कयलक अछि । अतएव रंगशाला मे बैसिक’ नाटककार नाट्य रचना स्वयं प्रस्तोता, निर्देशक एवं अभिनेताक भूमिकामे अपन रचना प्रक्रियाकेँ सम्बद्ध कयलनि अछि ।
संभावना :
मैथिली रंगमंचक इतिहासक सामंजस्य युगक प्रारंभ वर्त्तमान शताब्दीक अष्टम दशक मे भेल । एहि सँ पूर्वक नाटक पूर्णतः साहित्यिक छल जकरा रंगमंचसँ कोनो सामंजस्य नहि छलैक । इऐह प्रमुख कारण अछि जे अधिकांश नाटक भंडारमे बंद रहल तथा ओकर सफल प्रस्तुतिकरण नहि भ’ सकल । पूर्वक नाटककार साहित्यिक सिद्धान्त पर अधिक बल देलनि; किन्तु रंगमंचीय सुविधा पर कोनो ध्यान नहि देलनि; किन्तु विवेच्य दशाब्दमे नाटककार रंगमंचक दिस अधिक ध्यान देलनि । मैथिली रंगमंचक विकासमे अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं नाट्य-लेखन वर्त्तमान दशकक एक महत्वपूर्ण उपलब्धि अछि । एहि कालावधिमे रंगकलाक आनुषांगिक शाखा-नाट्यलेखन, अभिनय, निर्देशन, मंच परिकल्पना एवं प्रकाश व्यवस्थाक विशिष्ट प्रतिभाग माध्यमे प्रौढ़ता प्राप्त कयलक अछि । रंगमंचक परिवर्तित रुपकेँ ध्यानमे राखि एहि दशाब्दक नाटककार नाट्य-रवना कयलनि अछि । विवेच्य कालावधिमे जतेक नाटक ओ एकांकी उपलब्ध अछि ओकर केन्द्र विन्दु थिक आधुनिक सामाजिक पृष्ठभूमि । मैथिलीक परम्परागत कथा रुढ़िकेँ ओ भंजन करैत परवर्ती नाटककारकेँ दिशा-बोध करौलनि अछि जे एहनो विषय पर सुगमतापूर्वक नाट्य-रचना संभव अछि । एहि दशाब्दक नाटकक सर्वाधिक वैशिष्ट्य अछि जे नाटककार सड़ल-गलल परम्पराक प्रति विद्रोहात्मक स्वर अपनाय अत्याधुनिक नवीन परिवेशक पृष्ठभूमिमे सजगता अनबाक प्रयास कयलनि जे वस्तुतः प्रशंसनीय अछि ।
मैथिली रंगमंचक हेतु अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति अछि जे अद्यावधि कोनो व्यावसायिक रंगमंचक अभ्युदय नहि भेल अछि । जँ सभ्रान्त नागरिक एवं राज्यशासन व्यवस्था सँ किछुओ सहयोग भेटैत तँ मैथिली रंगमंच एहन स्थितिमे नहि रहैत । एहि दिशा मे प्रयत्न हैबाक प्रयोजन अछि जे प्रत्येक क्षेत्रमे एक रंगशालाक स्थापना हो तथा प्रत्येक समर्थ नाटककारकेँ आमंत्रित कयल जाय जे ओ राष्ट्रीय दृष्टिकोणसँ महान नाटकक सृष्टि करथि । वस्तुतः मैथिली रंगमंच अद्यापि हवा मे झुलि रहल अछि । ओहि मे प्रयोग पर प्रयोग निश्चित रुपेँ भ’ रहल अछि, किन्तु निश्चित दिशाबोधक सर्वथा अभाव परिलक्षित भ’ रहल अछि । जाधरि मैथिलीक हेतु व्यावसायिक रंगमंचक स्थापना नहि हैत ताधरि रंगमंचक दिशामे अन्यान्य भारतीय भाषाक रंगमंचक समकक्ष ई नहि आबि सकत ।
विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग तिलका माझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर-८१२००७