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  मिथिला : एक परिचय मिथिलाक राजा राज दरभंगा

ईतिहास

मिथिलाक राजा

मिथिला प्राचीन भारत मे हिमालय सँ लऽ कऽ गंगा नदीक बीच स्थित विदेह साम्राज्यक राजधानी छल । विदेह साम्राज्य भ्रांतिवश मिथिला साम्राज्यक रूप मे अधिक जानल जाइत अछि । मिथिलाक प्राचीन भाग आब भारत आ नेपालक भागक रूप मे बँटा गेल अछि । रामायण ग्रंथक अनुसार मिथिला विदेह साम्राज्यक राजधानी छल । एहि शहरक पहचान नेपालक धनुषा जिलाक आजुक जनकपुर सँ कयल जाइत अछि । एकरा जनकपुरधाम सेहो कहल जाइत अछि । एहि क्षेत्र के तीरभुक्ति (तिरूहतक प्राचीन नाम) सेहो कहल गेल अछि । विदेह या मिथिला साम्राज्यक उत्तर मे हिमालय , दक्षिण मे गंगा, पूब मे कोशी नदी आ पश्‍चिम मे गंडक नदी छल । एहि क्षेत्र मे दुनियाक धार्मिक इतिहासक दू आदरनीय व्यक्ति गौतमबुद्ध आ वर्धमान महावीर सेहो अपन पर्याप्त समय बितेलनि ।

प्राचीन इतिहास आ मिथक

पौराणिक गाथाक अनुसार निमि एहि क्षेत्रक पहिल राजा छलाह आ हुनक मृत्यु गुरु वशिष्ठ द्वारा देल गेल श्रापक कारणें भेलनि । हुनक मृत्युक बाद अराजकता पसरि गेल । तखन साधू सन्यासी लोकनि एकत्रित भेलाह आ निमिक आत्मा कें मानवीय रूप मे पुन: अयबाक प्रार्थना कयलनि । निमिक मृत शरीर के एहि आशा सँ चूर्णक रूप मे राखल गेल जे हुनक मृत शरीर पुन: मानवीय रूप मे आबि जाए । सन्यासी लोकनिक प्रयास सफ़ल भेलनि आ चूर्ण सँ मिथि (एकर अर्थ अछि माटि) उत्पन्न भेलाह । मिथिलाक नाम एहि मिथि राजा सँ लेल गेल अछि । ओ अपन राज्यक राजधानी मिथिलापुरी मे स्थापित केलनि आ एहि तरहें ई क्षेत्र मिथिला कहाओल । चूँकि हुनक जन्म अपन पिताक शरीर सँ भेलनि तें ओ जनक कहेलाह । एकरा बाद मिथिलाक राजा कें जनक कहल गेलनि । सब सँ प्रसिद्ध जनक सीरध्वज जनक (सीताक पिता) भेलाह । ओ मिथिलाक एकैसम जनक छलाह । ई साम्राज्य विदेह जनक कहल गेल । विदेह जनकक राजवंश मे ५२ गोट राजा भेलाह । ई क्षेत्र मूलत: विदेहक रूप मे जानल गेल । विदेह साम्राज्यक उल्लेख पहिल बेर यजुर्वेद संहिता मे भेल अछि । विदेहक राजधानी मिथिलाक उल्लेख जातक (बौद्ध सहित्य), ब्राह्मण, पुराण (वृहद विष्णु पुराण मे विस्तार सँ वर्णित) आ रामायण आ महाभारत एहन विभिन्न ग्रंथ मे भेल अछि । महाभारत और जातक मे राजाक सूची देल गेल अछि ।


जननक वंश परंपरा


रामायण काल धरि जनक

वाल्मीकि रामायण मे जनकक वंश परंपराक उल्लेख अछि । वाल्मिकी रामायण मे स्वयं राजा सीरध्वज जनक अपन पूर्ववर्ती राजाक उल्लेख राजा दशरथ (रामक पिता) सँ कयलनि अछि । वाल्मीकि रामायणक अनुसार जनक, जे मिथिला पर शासन केलनि, हुनक सूची एना अछि :


निमि


मिथि - मिथिलाक संस्थापक आ पहिल जनक
उदवसु
नन्दिवर्धन
सुकेतु
देवव्रत
ब्रिहद्व्रत
महावीर
सुध्रिति
दृष्टकेतु
हर्यस्व
मरु
प्रतिन्धक
क्रितिरथ
देवमिध
विभूत
महिध्रत
कीर्तिरत
महोरम
श्वर्णोरम
हरिस्वरोम
सीरध्वज - सीताक पिता

 

रामायण कालक पश्‍चात जनक :


भानुमान
शतद्युम्न
शुचि
उर्ज्नामा
क्रिति
आन्जन
कुरुजित
अरिष्टनेमि
श्रुतायु
सुपार्श्व
सृन्जय
क्षेमावी
आनेना
भौमरथ
सत्यरथ
उपागु
उपगुप्त
स्वागत
श्वानन्द
शुवर्चा
शुपार्श्व
शुभाष
शुश्रुत
जय
विजय
ऋत
सुनय
वीतहव्य
धृति
बहुलाश्व
क्रिति

जनकक पश्‍चात मिथिला

इ कहल जाइत अछि जे जनक राजवंशक अंतिम राजा- कीर्ति जनक अत्याचारी छलाह आ अपन प्रजा पर हुनक नियंत्रण नहि रहलनि । आचार्य (विद्वान व्यक्ति) लोकनिक नेतृत्व मे आम जन हुनका गद्दी पर सँ उतारि देलक । मिथिला साम्राज्यक एहि पतनक अवधि मे लिच्छ्वीक प्रसिद्ध गणतंत्रक वैशाली मे उदय भऽ रहल छल आ मिथिला क्षेत्र सदी ईसा पूर्व सातम सदीक आसपास लिच्छ्वी राज्यक अंग बनि गेल । पुन: छठम सदी ईसा पूर्व मगध साम्राज्यक अजातशत्रु लिच्छ्वी कें पराजित कऽ देलनि आ एहि तरहें मिथिला मगध साम्राज्यक नियंत्रण मे आबि गेल । एकरा बाद विभिन्न राजवंश यथा शिशुनाग, नंद, मौर्य, शुंग, कंठ, गुप्त, वर्धन आदि समय- समय पर एतय शासन केलनि । जनकक बाद पाँच- छह शताब्दी धरि, जा धरि कि राजा सलहेस राजा भेलाह मिथिला मे कोनो महत्वपूर्ण राजा नहि भेलाह । शैलेश जयवर्द्धन ओ महिसौधा- सिरहा (वर्तमान मे नेपाल मे) कें अपन राजघानी बनौलनि । ओ कतेको बेर तिब्बती आक्रमण सँ एहि क्षेत्रक रक्षा केलनि । आ तें हुनका जयवर्द्धन सँ शेलेंद्र (पहाड़क राजा ) कहल गेल । जे बाद मे सलहेस भऽ गेल ।

लगभग छ्ठम शताब्दी सँ नवम शताब्दी- पाल राजवंश

मिथिला पर प्राय: तीन दशक धरि पाल वंशक राजा शासन केलनि । पालवंश बौद्ध मतक अनुयायी छलाह । हुनक राजधानी बलिराजगढ़ (बाबूवरही -मधुबनी जिला) मे अवस्थित मानल गेल अछि । पाल वंशक अंतिम राजा मदनपाल छलाह । ओ कमजोर राजा रहथि आ हुनका आदिशूर सामंत सेनक सेना हरा देलकनि । पालवंशक प्रमुख राजा छलाह : -

 

" गोपाल (७५०-७७०)
" धर्मपाल (७७०-८१०)
" देवपाल (८१०-८५०)
" शुरपाल/महेन्द्रपाल (८५० - ८५४)
" विग्रहपाल (८५४ - ८५५)
" नारायणपाल (८५५ - ९०८)
" राज्यपाल (९०८ - ९४०)
" गोपाल ॥ (९४०-९६०)
" विग्रहपाल ॥ (९६० - ९८८)
" महिपाल (९८८ - १०३८)
" नयपाल (१०३८ - १०५५)
" विग्रहपाल ॥। (१०५५ - १०७०)
" महिपाल ॥ (१०७० - १०७५)
" शुरपाल ॥ (१०७५ - १०७७)
" रामपाल (१०७७ - ११३०)
" कुमारपाल (११३० - ११४०)
" गोपाल ॥। (११४० - ११४४)
" मदनपाल (११४४ - ११६२)
" गोविन्दपाल (११६२ - ११७४)

पाल वंशक संस्थापक गोपाल छलाह । ओ बंगालक पहिल स्वतंत्र बौद्ध धर्मावलंबी राजा छलाह आ लोकतांत्रिक चुनाव द्वारा गौड़ मे ७५० ई० मे सत्ता मे अयलाह । ई चुनाव ओहि समय अपना आप मे अद्‌भुत छल । ओ ७५०-७७० क बीच शासन केलनि आ पूरा बंगाल पर अपन नियंत्रणक विस्तार करैत अपन शक्तिक संचय केलनि । हुनक उत्तराधिकारी धर्मपाल (७७०-८१० ई) आ देवपाल (८१०-८५० ई ) उत्तरी आ पूर्वी भारतीय उपमहाद्वीप मे अपन नियंत्रणक विस्तार केलनि । पाल साम्राज्य सेन राजवंशक आक्रमणक कारण बारहवीं सदी मे बिखरि गेल ।


लगभग ग्याहरवीं सदी सँ १३वीं सदी - सेन वंश

सेनवंश हिन्दुत्वक अनुयायी छलाह आ तें मिथिलाक लोक, जे हिन्दुत्वक अनुयायी छल मदनपाल कें हरेबा मे सामंत सेन के मददि केलनि । सेन वंश मे ५ गोट राजा भेलाह :


हेमन्त सेन (१०७० ई.)
विजय सेन (१०९६-११५९ ई.)
बल्लाल सेन (११५९ - ११७९ ई.)
लक्ष्मण सेन (११७९ - १२०६ ई.)
विश्वरूप सेन (१२०६ - १२२५ ई.)
केशव सेन (१२२५-१२३० ई.)

लगभग १३वीं सदी सँ १४वीं -कर्नाट राजवंश

नान्यदेव सेन वंशक राजा लक्ष्मण सेन के पराजित केलनि आ मिथिलाक राजा भऽ गेलाह । नान्य देव पश्‍चिम सँ एलाह आ अपन पहिल राजधानी सिमरौन गढ़ (बीरगंज) बनेलनि । संपूर्ण मिथिला कें जीतलाक बाद ओ अपन राजधानी कमलादित्य स्थान ( कमलादान ) हस्तांरित केलनि । अंधराठाढी नामक दोसर गामक उल्लेख सेहो कर्नाट लोकनिक राजधानीक रूप मे भेल अछि। एहि गाम मे ६ दर्जन पोखरि अछि, जाहि मे सँ २७टा नयनाभिराम मालाक मोती जकाँ अछि । ई पोखरि आपस मे एक दोसर सँ जुड़ल अछि आ बाढ़िक पानि सँ पुन: भराईक लेल सुगरवे नदी सँ सेहो जुड़ल अछि । कर्नाट राजा द्वारा निर्मित ई पोखरि सभ अद्‌भुत सिंचाई व्यवस्थाक नमूना अछि आ आठ सदी बितलाक बाद आइयो एकर उपयोगिता अछि । कर्नाट राजवंश मे सेहो पाँच गोटा राजा भेलाह :-

नान्य देव : महान योद्धा हेबाक अलावा नान्यदेवक संगीत मे सेहो खूब रूचि छल । ओ रागक वर्गीकरण आ विश्‍लेषण केलनि आ हास्य (हँसी) और श्रृंगार (सजावट) रसक लेल माध्य लय, करूण रसक लेल विलम्बित , वीर ( बहादुरी) क लेल द्रुत रस, रौद्र (क्रोध), अद्‌भूत (विचित्र) और भयानक (डरावना) रसक चयन केलनि । ओ संगीत पर एकटा वार्ता " सरस्वती हृदयालंकार " लिखलनि, जे भंडारकर अनुसंधान संस्थान पुणे मे सुरक्षित अछि ।


गंग देव
नरसिंह देव
शक्रसिंह देव


हरि सिंह देव - राजा हरिसिंह देव सब सँ बेसी प्रसिद्ध भेलाह । ओ मैथिल ब्राह्मण आ मैथिल कायस्थ (कर्ण कायस्थ) मे पंजी व्यवस्था शुरू करब आ लागू करब मे प्रमुख सूत्रधार छलाह । ओ कला आ साहित्यक महान प्रेमी छलाह ।

पं० कामेश्वर ठाकुर हरिसिंह देवक दरबार मे राजकीय पुरहित छलाह, जे वर्ण रत्‍नाकर लिखलनि । वर्ण रत्‍नाकर कोनो उत्तर भारतीय भाषा मे लिखल गेल पहिल गद्य आ कोनो उत्तर भारतीय भाषाक विश्‍वकोष मानल जाइत अछि । पं० कामेश्‍वर ठाकुर ओईनवार-राजवंशक संस्थापक छलाह ।


१३२६ ई० सँ १५२६ ई० धरिक राजा- ओईनवार वंश

फ़िरोजशाह तुगलक १३२६ ई० मे मिथिला क्षेत्र पर आक्रमण केलक आ एकरा जीत लेलक । कर्नाट राजवंशक अंतिम राजा हरिसिंह देव नेपाल भागि गेलाह । इतिहासकार डॉ० उपेन्द्र ठाकुरक अनुसार अगिला २७ साल धरि मिथिला मे अराजकता व्याप्त रहल । १३५३ ई० मे फ़िरोजशाह तुगलक कामेश्‍अवर ठाकुर कें करद राजा बनेलनि । करद राजाक नियुक्ति सम्राट द्वारा कर इक्ट्‍ठा करबाक और भुगतान करबाक लेल और सेनाक रखरखावक लेल कएल गेल । कामेश्‍वर ठाकुर ओइनी गामक वासी छलाह, जे वर्तमान मे मुजफ़्फ़रपुर जिला मे अछि । राजवंशक नाम ओइनी गामक नाम पर ओइनवार राजवंश पड़ल । कामेश्‍वर ठाकुर विद्वान छलाह आ तें कर इकट्‍ठा कऽ कऽ फ़िरोजशाह तुगलक कें देबा मे असमर्थ रहलाह । आ तें हुनका गद्दी पर सँ उतारि देल गेल आ हुनक पुत्र भोगीश्‍वर ठाकुर कें मिथिला क्षेत्रक राजा बनाओल गेल । इ राजवंश भारतवर्षक किछु राजवंश मे सँ छल, जे ब्राहाण छल । तत्पश्‍चात मिथिला क्षेत्र मे केवल ब्राह्मण जाति सँ राजा भेलाह । ओइनवार राजवंशक राजाक सूची एना अछि । :


कामेश्‍वर ठाकुर - १३५३ ई मे फ़िरोजशाह तुगलक स्वयं प० कामेश्‍वर ठाकुर कें करद राजा नियुक्त केलनि ।


भोगीश्‍वर ठाकुर - कामेश्‍वर ठाकुर सक्षम शासक सिद्ध नहि भेलाह आ फ़िरोजशाह तुगलक कें कर इकट्‍ठा कऽ कऽ देबा मे असमर्थ छलाह । आ तें फ़िरोजशाह तुगलक हुनका गद्दी पर सँ हटा देलक आ हुनका स्थान पर हुनक पुत्र भोगीश्‍वर ठाकुर कें राजा बनेलक ।

गणेश्‍वर सिंह- अपन पिता भोगीश्‍वर ठाकुरक निधनक पश्‍चात गणेश्‍वर सिंह राजा भेलाह । गद्दी हड़पि लेबाक षडयंत्र मे असलान नामक व्यक्ति द्वारा १३६१ मे हुनक हत्या कऽ देल गेल । असलान हुनक दुनू पुत्र वीर सिंह आ कीर्ति सिंह के सेहो मारय चाहैत छल परन्तु ओ सफ़ल नहि भेल कारण हुनका सुरक्षित रुप सँ कतौ नुका देल गेल ।


कीर्ति सिंह - कीर्ति सिंह तुगलक शासक सँ मददि मँगलनि, जे मिथिला पर पुन: कब्जा जमेबाक लेल अपन सेना भेजलाह । तेहक लड़ाई मे आसलान आ वीर सिंह मारल गेलाह । कीर्ति सिंह राजा भेलाह परन्तु शीघ्रे हुनक निधन भऽ गेलनि ।

भवेश ठाकुर (भव सिंहक रूप मे सेहो जानल गेलाह) - ओ कामेश्‍वर ठाकुरक छोट पुत्र छलाह । चूँकि कीर्ति सिंह नि:संतान मरलाह, राज्य भवेश ठाकुरक छोट पुत्र छलाह । चुँकि कीर्ति सिंह नि:संतान मरलाह, राज्य भवेश ठाकुर कें भेटलनि ।

देव सिंह


शिव सिंह - ओ अपना कें स्वतंत्र राजा घोषित कऽ देलनि आ तुगलक साम्राज्य के करक भुगतान रोकि देलनि । तुगलक साम्राज्यक प्राधिकार के चुनौती देबाक हुनक निर्णयक कारणें इब्राहिम शाह तुगलक मिथिला पर आक्रमण केलक । युद्ध मे शिवसिंह मारल गेलाह ।
पदम सिंह - ओ शिवसिंहक छोट भाय छलाह ।

रानी विश्‍वास देवी - पदम सिंह कम उम्र मे संतान- हीन मरि गेलाह । हुनक मत्युक बाद हुनक पत्नी रानी विश्‍वास देवी मिथिला पर शासन केलनि, परन्तु ओहो शीघ्रे मृत्यु कें प्राप्त कऽ गेलीह ।

हरिसिंह - ओ पदमसिंहक पितीऔत भाई छलाह । चूँकि पदम सिंह नि:-संतान मरि गेलाह तें राजगद्दी हिनका भेटलनि ।

नरसिंह
धीरसिंह (१४५९ सँ १४८० ई०)

भैरव सिंह (१४८० सँ १५७५) - ओ लोकप्रिय राजा छलाह आ पोखरि खुनेनाई, रस्ता बनेबनाई , इनार खुनेनाई, मंदिर बनबेनाई आदि विभिन्न विकास संबंधी काज शुरु केलनि । ओ कला आ संस्कृतिक पैघ प्रेमी छलाह ।
रामचंद्र सिंह देव

लक्ष्मी नाथ सिंह देव - ओ ओइनवार वंशक अंतिम राजा छलाह । १५२६ ई० मे सिकन्दर लोदी मिथिला पर आक्रमण केलक और महाराज लक्ष्मीनाथ सिंह देव ओहि लड़ाई मारल गेलाह ।

१५२६ सँ १५७७-अराजकताक काल

सिकम्दर लोदी अपन जमाय अलाउद्दीन कें एहि क्षेत्रक राजा बनौलनि । एहि अवधि मे दिल्ली मे मुगल साम्राज्यक जड़ि स्थिर भऽ रहल छल । अलाउद्दीन सफ़ल शासक नहि छलाह आ आगामी ५० वर्ष धरि मिथिला मे अराजकता पसरल रहल । जहन अकबर सम्राट भेलाह तँ ओ मिथिला मे सामान्य स्थिति बहालीक प्रयास केलनि । ओ एहि निष्कर्ष पर पहुँचलाह जे जा धरि मिथिलाक राजा मैथिल ब्राह्मण कें नहि बनाओल जाएत , ता धरि एतय शान्ति नहि होयत या कर नहि असूलल जा सकत । १५७७ ई० मे अकबर प० महेश ठाकुर के मिथिलाक शासक घोषित केलनि । प० महेश ठाकुर खरौड़े भौर मूलक छलाह आ तें हुनक राजवंश ’खंडवला कुल’ कहौलक आ एकर राजधानी मधुबनी जिला मे राजग्राम बनाओल गेल ।

१५७७ सँ १९४७- खंडवला राजवंश

राजा महेश ठकुर
राजा गोपाल ठाकुर - ओ राजा महेश ठाकुर ज्येष्ठ पुत्र छलाह । हुनक अचानक मृत्यु भऽ गेलनि आ । ओ बड़ कम्मे दिन शासन केलाह ।
राजा परमानंद ठाकुर - ओ राजा महेश ठाकुरक दोसर पुत्र छलाह । ओहो कम्मे दिन शासन केलनि ।
राजा शुभंकर ठाकुर (१६०७ मे मृत्यु ) - ओ राजा महेश ठाकुरक पाँचम पुत्र छलाह ।
राजा पुरुषोत्तम ठाकुर (१६०७-१६२३) - ओ राजा शुभंकर ठाकुरक पुत्र छलाह । ओ १६२३ मे मारल गेलाह ।
राजा नारायण ठाकुर (१६२३-१६४२)
राजा सुंदर ठाकुर (१६४२-१६६२)
राजा महिनाथ ठाकुर (१६६२-१६८४)
राजा निरपत ठाकुर- (१६८४-१७०० ई० धरि) - ओ अपन राजधानी राजग्राम सँ दरभंगा अनलनि । भारतक आजादी धरि दरभंगा हुनका लोकनिक शक्‍तिक केन्द्र बनल रहल ।
राजा रघु सिंह (१७००-१७३६) - राजा रघु सिंह दरभंगा आ मुज्जफ्फरपुर सहित पूरा सरकार तिरहुतक लीज १,००,००० टाका वार्षिक पर प्राप्त केलनि, जे ओहि समय मे एकटा पैघ रकम छल ।
राजा विष्णु सिंह (१७३६-१७४०)
राजा नरेन्द्र सिंह (१७४०-६०)
राजा प्रताप सिंह (१७६०-१७७६)
राजा माधो सिंह (१७७६-१८०८)
महाराजा छत्र सिंह बहादुर (१८०८-३९)
महाराजा रुद्र सिंह बहादुर (१८३९-५०)
महाराजा महेश्वर सिंह बहादुर (१८५०-६०)
महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह बहादुर (१८६०-९८)
महाराजा रमेश्वर सिंह बहादुर (१८९८-१९२९)
महाराजा कामेश्‍वर सिंह बहादुर (१९२९-१९४७) - १५ अगस्त १९४७ भारतक आजादी धरि, जहन सभटा राज्य भारतीय संघ मे शामिल भऽ गेल ।

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