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  ऐतिहासिक यात्रा ऐतिहासिक यात्रा: भागलपुर मिथिलाक महत्वपूर्ण बौद्धस्थल-महिषी
  सौराठ सभा    

ऐतिहासिक यात्रा: भागलपुर

भागलपुर बिहार राज्य मे ऐतिहासिक महत्वक एकटा शहर अछि । ई गंगा नदीक दक्षिण किनारा पर अछि । ई पटना सँ २२० कि०मी० पूब अछि आ कोलकाता सँ ४१० कि०मी० उत्तर-पश्चिम अछि ।

भागलपुर सिल्क उत्पादन लेल प्रसिद्ध अछि । एहिठाम कृषि महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग, होम्योपैथी कौलेज आदि अछि।

एकर संदर्भ रामायण आ महाभारत मे भेटैत अछि, जतय एकर वर्णन अंग साम्राज्यक रूप मे भेल अछि । एहि शहर मे वा एकर अगल-बगल सम्राट अशोक कालीन (२७४-२३२ ईसा पूर्व) प्राचीन गुफा अभिलेख भेटल अछि आ सुल्तानगंज मे गुप्तकालीन मंदिर (३२०-५०० ई०) सेहो पाओल गेल अछि । शहरक बीच मे मुगल बादशाह औरंगजेबक भाई ‘शुजा’क मकबरा अछि । विक्रमशिला भागलपुर सँ ५० कि०मी० दूर अछि । विक्रमशिला विश्वविद्यालयक स्थापना आठम लदी मे भेल आ इ तांत्रिक बुद्ध मतक लेल बौद्धिक केन्द्रक रूप मे विकसित भेल । एगारहम सदीक प्रारंभ मे राजा रामपालक समय मे एतय १६० टा शिक्षक आ १००० छात्र छलाह ।

विक्रमशिला बुद्ध सँ सोझे जूड़ल नहि अछि तथापि बाद मे ई बौद्ध शिक्षाक केन्द्र भऽ गेल । ई विश्वविद्यालय एकटा पहाड़ीक उपर गंगा नदीक तट पर छल । विश्वविद्यालयक केन्द्र मे एकटा मंदिर छल । ५३ गोट छोट-छोट मंदिर सेहो छल । मुख्य मंदिरक द्वार पर नागार्जुन आ अतिशाक मूर्ति छल । शांतिपा, जेतरी, रत्नवजरा, जनानाश्रिमित्र, नरोपा आ अतिशा विक्रमशिला विश्वविद्यालय मे ओहि समयक महान विद्वान छलाह ।

मिथिला अनलाईन . कम

मिथिलाक गौरवभूमि सिमरौनगढ

जनकवश तथा लिच्छवी प्रजातन्त्रक पतनक बाद मिथिला राजनीतिक रूपें शिथिल भऽ गेल । तहिना सांस्कृतिक दृष्टिसँ सेहो कतेको वर्षधरि मथिला श्रीहीनरहला । मृदा कर्णाटवंशक उदयक सङहि एकटा नवयुग आरंभ भेल आ मिथिलाक सुषुप्तरहलगरिमा पुन: धुरि आएल । कर्णात कुलभूषण नान्यदेव सिमरौनगढ़कें तिरूहत ( मिथिला) क राजधानी बना एहि नवयुगक शुभारम्भ कएलनि । तकरा बादसँ सिमरौनगढ़ मिथिलाक प्रतिष्ठाक प्रतिनिधित्व करऽ लागल ।

वर्तमान मे सिमरौगढ़ नेपालक बारा जिलाअन्तर्गत पडैत अछि । बाराक मुख्यालय कलैयासँ करीब २२ किलोमीटर दक्षिण- पूर्व मे ई अवस्थित अछि । एकर नामकरण कोना भेल से एखनधरि अनुसन्धानक विषय अछि । किछुगोटे सिमरक वन क्षेत्र मे बसल ई नगर ’सिमर-वन-गढ़’ सँ जे राजा शिवसिंह (हरिसिंह देवक दोसर नाम) क रमण करऽवला गढ़क रूपमेर हलई स्थान ’शिव- रमण गढ़’ सँ अपभ्रंशित होइत सिमरौनग़ढ कर्णाटवंशीय शासकसभक सतकीर्तिक कारणे इतिहास- प्रसिद्ध अछि, ताहिमे कोनो दू मत नहि अछि ।

पराक्रमी चालुक्य- सम्राट विक्रमाद्वितीय छठमक अवसानक बाद चालुक्य साम्राज्य कमजोर पड़ि गेल । एहि कमजोरीक लाभ उठा चालुक्यक प्रान्तीय सामन्त शासक नान्यदेव तिरूहतकेँ स्वतन्त्र राज्य घोषित कऽ राजपाट अपना हाथ मे लेलनि । प्रकृति द्वारा संरक्षित सिमरौनगढ़केँ ई सन मे १०९७ मे स्वतन्त्र तिरहुत राज्यक राजधानी बनाओल गेल । नवस्थापित राजधानी बनाओल गेल । नवस्थापित राजधानीकेँ भव्य सुरक्षा चक्रव्यूहसँ सुरक्षित करबाक यथासंभव प्रयास कएल गेल । अपन राजनीतिक सङ्ठन एवं कुशल प्रशासनिक व्यवस्थाक माध्यमसँ नान्यदेव मिथिलाक पुनर्निर्माण- अभियानकेँ गति देलनि । पचास वर्षक हिनक शासन मे सिमरौनगढ़क ख्याति चारूभर पसरऽ लागल ।

नान्यदेवक उत्तराधिकारीसभक शासनावधिक एवं गतिविधिक प्रामाणिक आधार उपलब्ध नहि अछि । मुदा विभिन्न ग्रन्थक अध्ययन आ विश्‍लेषणसँ ई तथ्य बहराइछ जे नान्यदेवक बाद गाङ्यदेव , नरसिंह देव, रामसिंह देव, शक्तिसिंह देव, भूपालसिंह देव आ हरिसिंह देव मिथिला पर शासन कएलनि । एहि राजासभमे नान्यदेव आ रामसिंह देवक अभिलेख मात्र प्राप्त अछि । राजा रामसिंह देव (ई सन १२२७-१२४१ ) क प्राप्त खण्डित अभिलेख मे मिथिलाक्षर तथा मैथिली भाषाक प्रयोग भेल अछि ।
इतिहास कर्णाट- राजासभकेँ राज्य- विस्तारक कारणे पराक्रमी मानैत अछि । पराक्रमी कहएबाक लल ई योग्यता ओहि समयमे आवश्‍यक छल । मृदा सिमरौनगढ़क सुयशक आधार कर्णाटावंशक सामरिक उपलब्धि नहि, अपितु सास्क्रुतिक अवदान थिक । एहि अवदान थिक । एहि अवदानक सर्वाधिक श्रेय अन्तिम कर्णाट राजा हरिसिंह देवकेँ जाइत अछि । हिनक रानी देवलदेवी आ मन्त्री चण्डेश्‍वरक योगदान सेहो उल्लेखनीय अछि ।

हरिसिंह देव (ई सन १२८०-१३२६ ) क समयक स्वाभिमानक रक्षा विकट काज छल । मुदा हरिसिंह देव दिल्लीक सुल्तान फ़िरोज शाह तुगलकद्वारा पराजित भईयोकऽ झुकलाह नहि । बल्कि तत्लालीन युगधर्मक विपरीत टुटि गेलाह । ओ अपन सर्वस्व गुमाकऽ जे आदर्श स्थापित कएलनि से चिरस्मरणीय रहत । मिथिलाक माथ पर सपूत हरिसिंह देवक सुनाम सदति चमकैत रहत । हुनकाद्वारा तत्कालीन दिग्‍भ्रमित मिथिलाकेँ स्पष्ट दिशा देबाक लेल कएल गेल प्रयत्‍नक प्रभाव एखनहुमिथिला मे विद्यमान अछि । सात सए वर्ष पूर्व स्थापित पप प्रथा अपन गुण- दोषक सङ्ग एखनहु व्यापक , लोकप्रिय आ स्थायी रूपेँ प्रचलित अछि । हिनक सामाजिक व्यवस्थाक अनुकरण पाछाँ चलिकऽ नेपालक शासक जयस्थिति मल्ल कएलनि । ओहि व्यवस्थाक प्रभाव एखनहु नेवारी समाज मे देखल जा सकैत अछि । कला साहित्यिक क्षेत्र मे सेहो हिनक योगदान कम महत्वपूर्ण नहि अछि ।

मुसलमान आक्रमण सँ पराजित हरिसिंह देव आत्मसुरक्षाक लेल अपन रानी, मन्त्री आदिक सड्ङ

सौराठ सभा

प्रायः अपना देशमे अनेको प्रकारक मेलाक आयोजन कएल जाइत अछि जेना सोनपुरक मेला, हरिहर क्षेत्रक मेला आदि । लेकिन मधुबनी सँ ६ कि.मी. दूर सौराठ गाममे जे मेलाक आयोजन कएल जाइत अछि, अपना आप मे अद्वितीय अछि जाहि ठाम वैवाहिक सम्बन्धक मेला लगैत अछि । सौराठ सभाक आयोजन एक निश्‍चित स्थान मे होइत अछि जे ‘सौराठ सभागाछी’ कें नाम सँ प्रसिद्ध अछि । ई सभागाछी मिथिलाक ओहि भूमिक समीप अछि जे अपन विश्‍व प्रसिद्ध मिथिला चित्रकलाक लेल अनुपम ख्याति प्राप्त केने अछि ।

सौराठ सभा संभवतः देशमे एकमात्र एहन तपोभूमि अछि जतय विवाह सँ सम्बन्धी सभाक आयोजन कएल जाइत अछि । सभागाछी मे केवल ब्राह्‌मण जातिक दुल्हा विवाहक पवित्र बंधनमे अपनाकें जोड़बाक लेल अबैत छथि ।

सर्वप्रथम एहि प्रथाक शुभारंभ दरभंगाक अंतिम महाराज स्व. श्री हरि सिंहक द्वारा कएल गेल । श्री हरि सिंह स्वयं कला और साहित्यिक महान संरक्षक और पुजारी छलाह । ओ अक्सर अपन राज-दरबार मे वाद-विवाद और सिम्पोजियाक आयोजन करैत रहैत छलाह संगहि ओहिमे भाग लेनिहार प्रतियोगीकें पुरस्कार दैत छलाह । एक बेर सन्‌ १९३६ मे एहि प्रकारक एकटा प्रतियोगिताक आयोजन कयल गेल जाहिमे २५ वर्ष सँ कम आयुक अविवाहित युवक भाग लेलनि आ एहिमे "वेद सँ लयकें योग" तक कें चर्चा कयल गेल । जाहिमे पुरस्कार अद्वितीय छल । प्रत्येक पुरस्कार विजेताकें पुरस्कार स्वरुप एकटा सुयोग्य कन्या (वधुक रुप में) भेंट कयल गेल । लेकिन समयक रेखाचक्र बदलैत गेल और ज्ञानक चर्चा अधोगति दिस घूमि गेल । परिणामस्वरुप ई सभा विवाहक सभामे पूर्णरुपेण बदलि गेल ।

सौराठ सभा वर्षक अंतिम पखवाड़ा आषाढ़ मास (जून) मे आरंभ होइत छैक । एहि सभाक द्वारा केवल ब्राह्मण जातिक बालक विवाहक लेल योग्य मानल गेल छथि । विवाह कयनिहार गुलाबी, लाल और पीयर धोती आओर पाग पहिरकें जखन सभागाछी के आंगममे शोभा बढ़ाबैत छथि तँ ओहिठामक दृश्य यथार्थमे अति मनोहर लागैत अछि । संगहि खेनाय-पिनाय लेल लागल दुकानो सुन्दरता बढ़ाबय मे कनिको कसरि नहि छोड़ैत छैक । १५ दिन तक ई स्थान उत्सवक विहंगम रुप लेने रहैत अछि ।

सभागाछीमे विवाहक काज सम्पन्‍न कराबयमे एक विशेष व्यक्‍ति महत्वपूर्ण योगदान निबाहैत छथि जिनका "घटक" के नाम सँ सम्बोधित कयल गेल अछि । वर पक्ष और कन्याक पक्षकें बीच गप्पशप्प होइत अछि ओहिमे घटक दुनुक बीच संबंध जोड़ेबाय मे पूलक काज करैत छथि । हुनक अमूल्य योगदानक बिना एहि शुभकाज कें अंतिम सोपान तक कियान्वित केनाय असंभव होइत छैक । विवाह संस्कार एक प्रकार सँ पवित्र यज्ञ मानल गेल छैक, जाहिमे "कन्यादान" कयल जाइछ, यदि असत्यो बात बाजि के कियो एकरा सही अर्थमे पूर्ण करैत छथि तँ ओ शुभफलक भागी बनैत छथि । एहि कलामे घटकजी निपुण होइत छथि । ओ यश व अपयश दुनूमे बराबर के भागीदार होइत छथि ।

जखन दुनू पक्षमे गप्पशप्प सम्पन्‍न भय जाइत छैक तँ तखन गोत्र, मूल और वंशकें जाँच करय लेल पजीयारक समक्ष जाइत छथि । ओहिठाम सिद्धियांतक लेल प्रायः चौरासी (८४) पंजीकार छथि जे सम्पूर्ण मैथिलक लेखा-जोखा करैत छाथि । ८४ रजिस्टरमे मिथिले क्षेत्रटा नहि अपितु बिहारक अतिरिक्‍त झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और नेपालक लगभग २०० गामकें शामिल कयल गेल छैक । एहि रजिस्टरमे ब्राह्मणकें मुख्यतः १२ वंशावलीमे बाँटल गेल अछि ।

पजीयारक द्वारा सम्पूर्ण जाँच-पड़ताल यथा-गोत्र, मूल, परिवारक मान-मर्यादाक होइत छैक, तखन एकटा प्रमाण-पत्र हुनका द्वारा देल जाइत छैक जकरा सिद्धियांत लिखेनाय कहल जाइछ । एकटा ताड़ गाछक पात पर विवाहक शुभदिन लिखल रहैत अछि । तत्पश्‍चात्‌ मैथिलक विवाह पद्धतिक अनुसार एहि मंगल काजकें शुभारंभ कयल लेल जाइत छैक ।

सभागाछीमे विवाहक लेल किछु लोक शौक सँ अबैत छथि तँ किछु घर पर बात नहि बनैत छैक तँ सभाक द्वारा विवाह करय लेल अबैत छाथि । अगर सभा गाछियोसँ कुमारे घर वापस जाय पड़ैत छन्हि तँ ओ अपनाकें अपमानित अनुभव करैत छथि ।

किछु दशक पहिने तक सभागाछीमे १ सँ १.५ लाख (डेढ़ लाख) लोक प्रत्येक वर्ष अबैत छलाह । जखन आगन्तुकक संख्या सवा लाख (१.२५ लाख) सँ अधिक भऽ जाइत छल त सभागाछीक गाछक पात झड़य लगैत छल । कहल जाइछ अछि जे लोकक शरीरक ताप और साँसक उष्णता सँ ई घटना होइत छल । एकर प्रत्यक्ष प्रमाणक लेल एखनहुं पीपड़क गाछ ठाढ़ अछि । लेकिन किछु वर्ष सँ मुश्किल सँ २०-२५ हजार तक व्यक्‍ति सीमित भय गेल छथि । एहि सभागाछीमे आब प्रायः मध्यमवर्ग और निम्न वर्गक लोक अधिक संख्यामे अबैत छथि ।

सौराठ सभामे पहिने विवाहक एकमात्र उद्‍देश्यक पाछू कारण छल दुल्हा परिवारक आर्थिक व सामाजिक परिस्थिति और मान-मर्यादाकें कन्याक पैत्रिक पृष्ठिभूमि खोजब जाहि माध्यम सँ ई पता लगायल जाइत छाल जे कन्याक वंश गृहलक्ष्मीक लेल सुयोग्य छथि । तखन लेन-देनक अत्यधिक महत्त्व नहि छल । लेकिन जखन लोकक नैतिक मूल्यक ह्रास होमय लागल आओर कैंसररुपी दहेजक लोभ हमरा सबहक सामाजिक व्यवस्थाकें चारु दिस सँ ग्रसित कय लेलक तँ स्वाभाविक छैक जे सौराठ सभाक प्रतिष्ठा धीरे-धीरे उसर खेत जकाँ उखड़ लागल ।

ई तथ्य निर्विवाद रुप सँ सत्य अछि जे सभ्यता और संस्कृतिक उद्‍भव और विकास सामाजिक व्यवस्था एवम्‌ वातावरणकें उज्जवल भविष्यक दिस अग्रसर करैत अछि । ताहि प्रकारेण मनुक्खक सुविचारमे परिवर्तन होइत छैक । लेकिन एक दिश जतय हमसब अपन प्रतिष्ठाक प्रतीक एकरा मानैत छी तँ यथार्थमे ई अन्दरे अन्दर हमरा व्यवस्था मे घुन लागिके कुतरि रहल अछि । एकर दोषी हम सब स्वयं छी । आब विवाहमे योग्यताक अनुसार मोल भाव होइत अछि । दोसर सभागाछीमे लोकक घटनाइक प्रमुख कारण रोजगारक लेल अपन मातृभूमि सँ दोसर प्रदेशमे पलायन केनाइयो अछि आ संगहि लोकक सोचमे परिवर्तन सेहो ।

हमरा सबहक जतेक धर्म-संस्कार अछि सब संस्कार महत्वपूर्ण अछि लेकिन विवाह संस्कारक अतिविशिष्ट महत्व अछि । जकरा अभावमे मनुक्खक आगूक पीढ़ी नव-निर्माण अवरुद्ध भय जाइछ । यदि हमरा मैथिलक स्वस्थ सोच मन-मस्तिष्क और विचारमे नहि उपजत तँ एकदिन एहि मूल्यवान सांस्कृतिक धरोहरक (सौराठ सभाक) कृत्ति और गाथा केवल इतिहासक पन्‍नामे सिमटि के रहि जायत । तें हमरा सबहक पुनीत कर्त्तव्य अछि, जे एहि गरिमापूर्ण धरोहरक बारेमे गहन अध्ययन करी और एहि व्यवस्थाकें पुनर्जीवित करबामे अपन सहयोग दी ।

भरत लाल ठाकुर शिक्षा विभाग

दिल्ली विश्‍वविद्यालय

वाजसनेय यज्ञोपवीत मंत्र - ओं यज्ञोपवीतम्‌ परमम पवित्रं प्रजापतेर्यतसहजं पुरस्तात्‌ । आयुष्यमग्रयं प्रतिमुंच शुभं यज्ञोपवीतम्‌ बलमस्तुतेजः ॥

सीतामढ़ी

सीतामढ़ी सँ १ कोसक दूरी पर पुनौरा गाम अछि । स्थानीय लोकक अनुसार राजा जनक एतहि हर चलेलनि जाहि सँ सीताजीक जन्म भेलनि । सीताजीक जन्म राजा जनक द्वारा हर चलेबाक समय दिव्य शक्तिक रूप मे भेल छलनि । माता सीताक जन्मक कारण एहि ठामक धरती पुण्यमयी भऽ गेल । एहि कारण एहि जगहक नाम पुण्य उर्वि भेल जे आई पुनौराक नाम सँ जानल जाईत अछि । जहन माँ सीताक जन्म भेलनि तँ इ स्थान माता सीताक भूमिक नाम सँ प्रसिद्ध भेल आ संगहि आकाश मे मेघ लागि गेल आ मुसलाधार वर्षा होमय लागल । वर्षा भेला सँ प्रजाक कष्ट तँ दूर भऽ गेल, परन्तु नवजात शिशुक समस्या जनकक सामने आबि गेलनि । वर्षा सँ बचबाक लेल एकटा झोपड़ी बनाओल गेल । ओहि स्थानक नाम सीतामढ़ी पडल ।

सीतामढ़ी नगरक पश्चिम छोर पर एकटा कुन्ड अछि । कहल जाइत अछि जे लगभग २५० वर्ष पहिने ओहि कुन्डक भीतर सँ सीताक प्रतिमा भेटय छल । किछु लोकक कहब अछि जे एखन जानकी मंदिर मे स्थापित जानकीक प्रतिमा ओएह अछि जे कुन्ड सँ निकलल छल । पहिने एहि स्थान पर जंगल छल आ एतय महात्मा पुन्डलिक कुटिया छल । सीतामढ़ी मे जानकीक नाम पर हर साल मेला लगैत अछि, जाहि सँ ई स्थान बेस प्रसिद्ध भऽ गेल अछि, तथापि पुनौराक विकास एखन धरि नहि भेल अछि ।

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