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| • कनियाँ-पुतरा | |
| • प्रमुख जलीय पदार्थ | |
| •आर्थिक विकास मे कृषिक भूमिका | |
| •माँछ मे रोग आ निदान | |
| • जड़ी-बूटीक महत्त्व | |
| • मिथिला मे बाढ़िक समस्या | |
| • लहठी उद्योग |
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कनियाँ-पुतरा उद्योग कनियाँ-पुतरा उद्योगप्राचीन सभ्यताक अध्ययन सेँ ज्ञात होइत अछि जे हड़प्पा एवं सिन्धु घाटी सभ्यता कालहिसँ मनुष्यक समाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अवसर पर धिया-पूताक मनोरंजनार्थ माटिक खेलौना, गुड़िया, कठपुतली, मुखौटा आदिक प्रचलन छल । विशेषकऽ पशु-पक्षी, कनियाँ-पुतरा वला खेलौना आदि भेटवाक प्रमाण भेटैछ । एहन विश्वास कयल जाइछ जे कनियाँ-पुतराक ऐतिहासिक वर्णन मानव जीवनक इतिहाससँ संबद्ध रहल अछि । कहल जाइछ जे सिंधु घाटी सभ्यता सँ ५०० वर्ष पूर्वसँ कनियाँ-पुतराक अस्तित्व पाओल जाइत अछि । भारतीय संस्कृतिक अभिन्न अंगक परिचायक कनियाँ-पुतरा मिथिलाक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अवसरक प्रतीक लाह, कपड़ा, पाथर, प्लास्टिक, कचकाड़ा आदि सँ निर्मित एवं विविध रंग सँ सराबोर कनियाँ-पुतरा प्राचीन कालहिसँ मानव समाज केँ आकर्षित करैत रहल अछि । विभिन्न प्रदेशक विविध संस्कृति, रहन-सहन, आचार-विचार एवं प्रेम व्यवहारक प्रतीक कनियाँ-पुतरा कला उद्योगक रूपमे विभिन्न आकृतिक संग राष्ट्रीय स्तर पर कौतुहल बनल रहैछ । बिहार, बंगाल, उड़ीसा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, असम, उत्तरप्रदेश, नागालैंड, मणिपुर आदि कनियाँ-पुतरा उद्योगक गढ़ मानल जाइछ । विशेष कऽ उत्तर प्रदेशक वाराणसी, मथुरा एवं वृन्दावन, राजस्थानक जयपुर भगवान श्रीकृष्णक पौराणिक गाथा पर आधारित कनियाँ-पुतराक निर्माणलेल प्रसिद्ध अछि । उड़ीसाक जगन्नाथपुरी मे प्राप्त एक विशेष प्रकारक घाससँ निर्मित कनियाँ, कठपुतली एवं मुखौटा मे भव्यता सेहो अद्भुते अछि । मिथिला चित्रकला जकाँ उड़ीसाक कनियाँ-पुतरा उद्योग सेहो अपन रंग-विन्यासक कारणें राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहल अछि । प्राचीन सामाजिक अवधारणाक अन्तर्गत चर्चित बाल-विवाहक समय में एहि कनियाँ-पुतरा आ कठपुतलीक अतिशय महत्व छल । अत्यन्त कम वयस मे विवाहित कन्या केँ अन्य वस्तुक सँग विशेष रूपेँ रँग-बिरँगक परिधान वला कनियाँ-पुतरा, कठपुतली एवं खिलौना देल जयबाक प्रथा छल । राजस्थान, मध्यप्रदेश, असम एवँ उत्तर प्रदेशक ग्रामीण इलाका मे तत्कालीन विवाहक अवसर पर कनियाँ-पुतराक उपहार देब सामाजिक प्रतिष्ठा मानल जाइत छल । जाहि कारणेँ उक्त प्रदेश मे गुड़िया उद्योग एखनो ओतबे प्रतिष्ठित बनल अछि । मिथिलाक वैवाहिक सम्पन्नताक खास पर्व वटसावित्री मे कनियाँ-पुतरा सँठबाक प्राचीन महत्व अछि । अनेको इतिहासकारक कहब छनि जे पूर्व सभ्यताक अन्तर्गत नृत्य करैत मूर्ति आजुक कनियाँ-पुतराक प्रतिरूप अछि जे भिन्न-भिन्न रूप मे देशक भिन्न-भिन्न क्षेत्र मे प्रचलित व्यवहारक अनुरूप उपयोग कयल जाइछ । दक्षिण अफ्रिका मे प्रत्येक नवविवाहित कनियाँ केँ उपहारस्वरूप जोड़ा कनियाँ-पुतरा देबाक अभूतपूर्व प्रथा वरकरार अछि । एकर कारण अछि जे उक्त विवाहित कन्या अपन होमयवला सन्तान केँ वैह कनियाँ-पुतरा परिवारक सम्मान स्वरूप दैछ । इहो परम्परा रहल अछि जे ओहि कन्याक दोसर सन्तान होयतैक त पुनः जोड़ा कनियाँ-पुतरा ओकरा देल जेतैक जे ओ अपन दोसर सन्तान केँ देत । सीरिया मे परम्परा अछि जे कन्याक जखनि विवाह करबाक इच्छा होइछ तऽ घरक खिड़की पर एकटा कनियाँ-पुतरा लटका दइछ । जापान मे पुरुष वर्ग सेहो कनियाँ-पुतरा उत्सवक आयोजन कय अपन शौर्य-गाथा एवँ अन्य तथ्य केँ दर्शबैत अछि । विश्वक अनेको देश मे कनियाँ-पुतरा सँ सम्बन्धित अनेको रोचक प्रसँग अछि जे तत्कालीन समाजक नव एवं प्राचीन मान्यताक उदाहरण स्पष्ट करैछ । भारतक विभिन्न प्रदेश अपन-अपन कनियाँ-पुतराक माध्यम सँ सेहो चिन्हल जाइछ । आसाम एवं पश्चिम बँगाल मे एक विशेष प्रकारक गाछक छालक भीतरी भाग उपयोग कयल जाइछ जे मुख्यतः जँगलक दलदल वला क्षेत्र मे पाओल जाइत अछि । राजस्थान मे काँच माटि सँ कनियाँ-पुतरा बनयवाक प्रचलन अछि । प्रदेशक अन्य भाग मे गायक गोबर, धानक भुस्सी एवं माटिक महत्वपूर्ण मिश्रण सँ बनयवला कनियाँ-पुतरा कुटीर उद्योगक रूप लेने अछि । बिहार, बँगाल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, असम, मेघालय, झारखण्ड आदि प्रदेश मे अन्य वस्तुक अलावा सिकी सँ कनियाँ-पुतरा एवं खिलौना बनयबाक प्रचलन एखनो प्रभावी अछि । अनेक प्रकारक लकड़ी सँ कनियाँ-पुतरा, खिलौना, मुखौटा, कठपुतली बनयबाक परम्परा सर्वप्रथम उड़ीसा मे प्रारम्भ भेल छल । मुदा मिथिलाँचलक सिकी कलाक अनुपम बाजार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अछि । सिकी आ बाँसक कमची सँ एहि क्षेत्र मे घरेलू उपयोगक सामान बनयबाक बेसी महत्व छल, तेँ मिथिला मे सेहो लकड़ी, माटि, पेपरमेसी आदि सँ गुड़िया बनयबाक प्रथा रहल । कहल जाइछ जे दुर्गापूजाक उत्सव कनियाँ-पुतराक उत्सव सँ सम्बद्ध अछि । कतिपय इतिहासकार मानैत छथि जे प्रागैतिहासिक काल सँ कनियाँ-पुतराक प्रादुर्भाव अछि । ६००० वर्ष पूर्व मिस्त्रक गुफा मे सेहो कनियाँ-पुतरा पाओल गेल छल । लकड़ी सँ बनल उक्त कनियाँ-पुतरा चमकीला रँग- रोगन बला होइत छल । पूर्वक माटि, काठ, बाँसक कमची, पाथर एवं कपड़ाक अतिरिक्त खर एवं तूर सँ बनल कनियाँ-पुतरा आधुनिक बार्बी डॉलक अतीत मानल जाइछ । मुदा भारतीय सामाजिक, पारम्परिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्सवक लेल सेहो कनियाँ-पुतरा महत्वपूर्ण मानल जाइत रहल । सन् १९७५ मे मशहूर कार्टूनिस्ट के० शंकर पिल्लै दिल्लीक नेहरू भवन मे संसारक सब सँ पैघ “डॉल म्यूजियम" स्थापित कयलनि । एहि संग्रहालयक स्थापना मे पूर्व प्रधानमंत्री पं० नेहरूक महत्वपूर्ण योगदान अछि । कनियाँ-पुतरा, कठपुतली, बार्बी डॉल, खिलौना आदि सँ अत्यधिक लगाव राखयवला पिल्लै जखन पत्रकार छलाह तखनहि देश-विदेशक करीब ५०० सँ अधिक कनियाँ-पुतरा एवं कठ-पुतलीक अद्भुत संग्रह कयलनि । देशक अनेको भाग मे संग्रहित कनियाँ-पुतराक प्रदर्शनी लगबैत रहलाह । कहल जाइछ जे एक एहन प्रदर्शनीक अवसरि पर पं० नेहरू जखन इन्दिरा गाँधीक सँग पहुँचलाह तखन पिल्लै अपन समस्या पं० नेहरू केँ कहलथिन आ इन्दिरा गाँधीक सहयोग सँ ‘चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट’ भवन मे उक्त ‘डॉल म्यूजियम’ क स्थापना भऽ सकल । दिल्ली में बहादुरशाह जफर मार्ग पर स्थित चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट भवनक पहील तल्ला पर उकत संग्रहालय अवस्थित अछि । तकरीबन २०० शीशाक शोकेस मे संसारक लगभग ६५०० कनियाँ-पुतरा धियापूताक आकर्शणक केन्द्र बनल अछि । ग्रीस, मैक्सिको, थाईलैण्ड, आस्ट्रेलिया, कोरिया, श्री लंका, चीन, बँगलादेश एवं भारत आदिक एक स एक पुरान एवं नव कनियाँ-पुतरा सँ सुसज्जित उक्त संग्रहालयक अपन विशाल कार्यशाला सेहो छैक । जाहि मे देश-विदेशक अनेको भाव-भंगिया वला कनियाँ-पुतराक निर्माण होइछ । गुजरातक राजकोट मे सेहो एक कनियाँ-पुतराक सँग्रहालय बनाओल गेल अछि । जाहि मे करीब १०० देशक हजारो कनियाँ-पुतरा संग्रहित अछि । राजकोट नागरीक सहकारी बैंक, रोटरी क्लबक सहयोग सँ मीडटाउन (गुजरात)क चर्चित व्यक्ति अरविन्द भाई जनियार जनकल्याण ट्रस्टक सहायता सँ स्थापित कयल गेल अछि । एक करोड़क लागत सँ तैयार उक्त कनियाँ-पुतरा संग्रहालयक प्रभारी दीपक अग्रवालक उक्त संग्रहालय मे एहनो कनियाँ-पुतरा अछि जकर मूल्य ५०,००० तक आँकल जाइछ । मुदा अन्य कतेको कनियाँ-पुतरा देशक अनेको भागक कला, संस्कृति आ परम्पराक विरासत रूपी महत्वपूर्ण ऐना सदृश्य विद्यमान अछि । उक्त संग्रहालय मात्र धियापूताक मनोरंजनात्मक स्थल अछि । ट्रस्टक ट्रस्टी कल्पना मनियार कहैत छथि जे मनोरंजनात्मक माध्यम बनल एहि संग्रहालय मे कठपुतली एवं मुखौटाक संग्रह धिया-पूता मे व्याप्त अवगुण केँ हटयबाक लेल कयल गेल अछि । एक विशेष मनोरंजनक रूप मे कठपुतली सेहो कनियाँ-पुतराक दोसर रूप मे विकसित अछि । कठपुतली विभिन्न रूप मे सजि कऽ विशेष प्रकारक डोरा सँ अंगुरीक सहारे प्रदर्शन कयल जाइछ । कठपुतली नृत्यक रूप मे मोहक होइछ । भारत नहि विदेशक धरती पर सेहो कठपुतली नृत्य प्रसिद्ध रहल अछि । विदेश में कठपुतली केँ कनियाँ-पुतराक स्वरूप मे बुझल जाइत अछि । जे बूढ़-प्रौढ़, युवा एवं धिया-पूता सबहक लेल आकर्षणक केन्द्र बनल रहैछ । मुदा एहि वैज्ञानिक युग में कनियाँ-पुतरा सँ धियापूताक मनोरंजने मात्र नहि होयबाक चाही । एहि सँ ज्ञान प्राप्त करब सेहो आवश्यक अछि । ज्ञानवर्धक आधार पर कनियाँ-पुतरा मात्र खेलयबाक वस्तु नहि बल्कि यथार्थ चित्रणक रूप मे विद्यमान अछि जकर वास्तविक स्वरूप बार्बी डॉलक रूप मे उपलब्ध अछि । तूर, कपड़ा आ खरक कतरा आदि सँ निर्मित बार्बी डॉल कनियाँ-पुतराक रूप मे विश्व स्तर पर अपन अद्भुत संसार बना लेलक अछि । बार्बी डॉल आँखि, कान, नाक, मुँह चमकबैत अछि, नचैत अछि, विभिन्न तरहक स्वर निकालैत अछि जे मात्र मनोरंजनात्मके नहि ज्ञानवर्धको मानल जाइछ । धियापूताक अतिरिक्त युवक-युवती सेहो एहि सँ प्रभावित होइछ । बार्बी डॉलक फिनीशींग, बनावट, एकर लोकप्रियता दुनियाँ मे सब कियो मानि लेलक अछि । मानवक दैनिक जीवनक सभ आयाम बार्बी डॉल मे विद्यमान अछि । हालहि मे सीरियाक “न्यु ब्वाय डिजाइन स्टूडियो" एकटा नब तरहक बार्बी कनियाँ-पुतरा तैयार कयलक अछि । जकर आँखि पीयर नहि भऽ कारी अछि । एकर माथ के स्कार्फ सँ झाँपल गेल अछी । आ माथ सँ पयर तक बुर्का जकाँ ढकल अछि । एकर नाम ‘फुल्ला’ राखल गेल अछि । सन् २००३ मे पहिल बेर फुल्ला बजार मे दाखिल भेल अछि । जे बार्बी डॉलक रूप मे ‘बेस्ट सेलर’ आइटम बनि गेल । एहि सँ ओहि कम्पनी के अत्यधिक मुनाफा भेलैक अछि । सीरिया, जोडन, कतर, कोरिया सहित अन्य कतेको देश मे एहि फुल्लाक नाम पर कपड़ा, साइकिल, चॉकलेट एवं चूइंगम सेहो बनय लागल । एक जमाना छल जखन बार्बी डॉलक प्रादुर्भाव पश्चिम संस्कृतिक हमला कहल जाय लागल छल । एकरहि प्रेरणा सेँ इरान ‘सारा’ नामक कनियाँ-पुतरा बनौलक जे विश्वक बजार मे चानी काटि रहल अाछि । सब सेँ फराक मानवीय गुण सँ भरल ‘सारा’ कनियाँ-पुतरा सँ प्रभावित भय सीरियाक प्रोडक्ट ‘फुल्ला’ सेहो संशोधन कय बजार मे तहलका मचौने अछि । फुल्लाक प्रदर्शन सब आयु वर्गक व्यक्ति केँ आकर्षित करैछ । कनियाँ-पुतराक रूप मे फुल्ला मानव जकाँ ईमानदार, आज्ञाकारी, व्यवहार कुशल आ माय-बाप के आदर करयवाली अछि । लगभग बीस डॉलर वला फुल्ला सीरियाक अल्प आय वाला नागरिक मे सेहो चर्चित अछि । मुख्यतया विदेशी मूलक उक्त बार्बी डॉल अनेको रूप मे भेटैछ । नीक बार्बी डॉल जतय भारी, राजकुमारी आ हास्य व्यंग्यक पर्याय बनल अछि ओतय चुड़ैल वा मुखौटा सँ सम्बद्ध अनेको आकृतिक रूप मे बच्चा के सेहो डरबैत अछि । बार्बी डॉल साधारणतया भारत मे २०० सँ ५००० रूपया धरिक होइत अछि । एकर परिधान पर होमयवला खर्च सेहो कम महत्वपूर्ण नहि होइछ । पटनाक अनेको स्थान पर बार्बी डॉलक संग अन्य देशी डॉल सेहो डोलैत रहैत अछि । जे फर्क बूढ-जुआन, नव-पुरान, देशी-विदेशी मे होइछ सैह फर्क उक्त कनियाँ-पुतराक मे परिलक्षित होइछ । किएक त भारतीय पारम्परिकताक प्रतीक कनियाँ-पुतराक महत्व फराक रूप मे आँकल जाइछ । भय अछि जे भारतीय गुड्डा कतहु विदेशी बार्बी डॉलक व्याय फ्रेण्ड बनि अपन सांस्कृतिक प्रचलन केँ नहि छोड़ि दय । देशी कनियाँ-पुतरा आ विदेशी, बार्बी डॉलक एहि भाग-दौड़ मे मुखौटाक प्रयोग कनियाँ-पुतराक विभिन्न रूप मानल जाइत अछि । फर्क एतवहि अछि ओ मुँह मे लगाओल जाइछ । मुदा ओकर आकृति कनियाँ-पुतरा जकाँ होइछ । आ मुखौटा के मुँह मे लगबैत देरी मानवक दुनियाँ बदलि जाइछ । जकर अनेको रोचक प्रसंग अछि । मुदा एकर एक मात्र मकसद होइछ मनोरंजन ।
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