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सरस    बोल    मुस्की    मुख   पान  ।
विद्या-वैभव        शान्ति        प्रतीक,  
सरितांचल  श्री  क्षेत्र  मिथिला  थिक॥
मिथिलाधाम
 » साहित्य » विद्यापति परिचय
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विद्यापति

विद्यापति भारतीय साहित्य की भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभों मे से एक और मैथिली के सर्वोपरि कवि के रूप में जाने जाते हैं। इनके काव्यों में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरुप का दर्शन किया जा सकता है। इन्हें वैष्णव और शैव भक्ति के सेतु के रुप में भी स्वीकार किया गया है। मिथिला के लोगों को 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' का सूत्र दे कर इन्होंने उत्तरी-बिहार में लोकभाषा की जनचेतना को जीवित करने का महती प्रयास किया है।

मिथिलांचल के लोकव्यवहार में प्रयोग किये जानेवाले गीतों में आज भी विद्यापति की श्रृंगार और भक्ति रस में पगी रचनायें जीवित हैं। पदावली और कीर्तिलता इनकी अमर रचनायें हैं।

प्रमुख रचनायें
महाकवि विद्यापति संस्कृत, अबहट्ठ, मैथिली आदि अनेक भाषाओं के प्रकाण्ड पंडित थे। शास्र और लोक दोनों ही संसार

 

में उनका असाधारण अधिकार था। कर्मकाण्ड हो या धर्म, दर्शन हो या न्याय, सौन्दर्य शास्र हो या भक्ति रचना, विरह व्यथा हो या अभिसार, राजा का कृतित्व गान हो या सामान्य जनता के लिए गया में पिण्डदान, सभी क्षेत्रों में विद्यापति अपनी कालजयी रचनाओं के बदौलत जाने जाते हैं। महाकवि ओईनवार राजवंश के अनेक राजाओं के शासनकाल में विराजमान रहकर अपने वैदुश्य एवं दूरदर्शिता सो उनका मार्गदर्शन करते रहे। जिन राजाओं ने महाकवि को अपने यहाँ सम्मान के साथ रखा उनमें प्रमुख है:

(क) देवसिंह (ख) कीर्तिसिंह (ग) शिवसिंह (घ) पद्मसिंह (च) नरसिंह (छ) धीरसिंह (ज) भैरवसिंह और (झ) चन्द्रसिंह।

इसके अलावे महाकवि को इसी राजवंश की तीन रानियों का भी सलाहकार रहने का सौभाग्य प्राप्त था। ये रानियाँ है:

(क) लखिमादेवी (देई) (ख) विश्वासदेवी और (ग) धीरमतिदेवी।

मैथिलीक आकाशमे विद्यापति एकटा एहन नक्षत्रराज भेलाह जनिका लऽ कऽ हमरालोकनि आन-आन भाषा-भाषीक समक्ष गौरवक अनुभव कऽ रहल छी । बड्गालीलोकनि हिनक कृतिसँ मुग्ध भऽ कऽ हिनका बङ्गाली बनएबाक अथक प्रयास सेहो कएलनि, मुदा ओ लोकनि सफल नहि भेलाह । महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री, जस्टिस शारदाचरण मित्र, बाबू नगेन्द्रनाथ गुप्त आदि बङ्गाली विद्वानलोकनि मानि लेलनि जे विद्यापति बङाली नहि, मिथिलावासी छलाह आ मैथिलीमे गीत लिखलनि । एहि दिशामे काज कएनिहार ग्रियर्सन साहेब निश्‍चित रुपसँ धन्यवादक पात्र छथि जे सर्वप्रथम विद्यापतिकेँ बंगाली सँ बिहारी प्रमाणित कएलनि ।

विद्यापतिक जन्म सन १३६० ई. मे मधुबनी जिलाक बिस्फी गाममे भेल छलनि । ई बैशैबारगढ़ मूलक काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण छलाह । मुदा जहियासँ बिस्फी गाम उपार्जन कएलनि तहियासँ हिनक मूल बिशैबार बिस्फी भऽ गेलनि । हिनक पिताक नाम गणपति ठाकुर तथा माताक नाम हासिनी देवी छलनि । कहल जाइत अछि जे कपिलेश्‍वर महादेवक आराधना कऽ गणपति ठाकुर एहन पुत्ररत्‍न प्राप्त कएने छलाह । मिथिलाक प्रसिद्ध विद्वान हरि मिश्र सँ ई शिक्षा ग्रहण कएने छलाह । पक्षधर मिश्र हिनक सहपाठी छलथिन ।

ई एकटा मनोवैज्ञानिक तथ्य अछि जे जखन केओ समाजमे उच्च पदपर आसीन भऽ जाइत छथि तँ हुनक विद्वेषी हुनक व्यक्तित्वकेँ छोट करबाक हेतु नाना प्रकारक बात सभ करऽ लगैत अछि । एहन विद्वेषीमे एकटा केशव मिश्र सेहो छलाह । ओ अपन द्वैतपरिविष्ट नामक धर्मशास्त्र-ग्रन्थमे ‘ये केञ्चन्र भागवतः ग्राम याचकः नर्तकाः’ कहि कऽ विद्यापतिक उपहास छथि । अर्थात ओ राजदरबारमे भागवतक वाचन करैत छलाह तेँ भगवतिया भेलाह, ओ राजा शिवसिंहसँ बिस्फी ग्राम उपहारस्वरुप पओने छलाह तेँ ग्राम-याचक भेलाह आ देशी भाषामे गीत बनौलनि ते नटुआ भेलाह । मुदा अपसोचक बात ई अछि जे केशव मिश्र आइ जीवित नहि छथि । जँ ओ आइ जीवित रहितथि तँ विद्यापतिक लोकप्रियता देखिकऽ हुनक माथ लाजसँ झुकि जइतनि ।

विद्यापतिक पिता गणपति ठाकुर राजा गणेश्‍वरक दरबारमे मन्त्री छलाह । तें ओ नेत्रहिसँ अपन पिताक सङ्ग गणॆश्‍वरक दरबारमे जाइत-अबैत छलाह । गणेश्‍वरक बाद कीर्तिसिंह राजा भेलाह । अतः ओ हिनका दरबारमे जाए-आबऽ लगलाह । विद्यापति एहि कीर्तिसिंहक नामपर अपन पहिल पुस्तक कीर्तिलता लिखलनि । एकर भाषा अपभ्रंश (संस्कृत-प्राकृत मिश्रित मैथिली) अछि, जकरा ओ अवहट्ट कहने छाथि । एहि भाषा पर हुनका गर्व सेहो छलनि । एतदर्थ देखल जा सकैत अछि ओहि पुस्तकक पहिल पल्लबक ई पांति-

देसिल बयना सब जन मिट्ठा ।

तें तैसन जम्पओ अवहट्ठा ॥

अर्थात देशी भाषा (अपन भाषा) सभकेँ मीठ लगैत छैक । तें हम एहि भाषामे एकर रचना कएल । हुनक मोनमे इहो शङ्का छलनि जे ज्योतिरीश्‍वर जकाँ हमरो एहि भाषाकेँ देखिकऽ संस्कृतक पंडित हँसताह । कारण, ओहि समयमे न्याय आ मीमांसाक अध्ययन तथा टिप्पणी लिखब पण्डितलोकनिक प्रिय वस्तु छलनि । मुदा विधापति एहि मार्ग कें बदलि कऽ ज्योतिरीश्‍वर जकाँ अपन नव मार्ग बनेलनि । ई नव मार्ग विषय-वस्तु तथा भाषा दुनू स्तर पर छल । तें हुनक भाषाक संबंधमे कहल जाईछ :- बाल चन्द विज्जावइ भाषा ।

दुहु नहि लग्गै दुज्जन हासा ॥

श्री परमेश्‍वर हर सिर सोहई ।

ई णिच्चई णाअर मन मोहइ ॥

अर्थात्‌ बालचन्द्र तथा मैथिली भाषा देखि कऽ दुर्जन लोक कें हँसी नहि लगतनि । कारण बाल चन्द्रमा शिवक मस्तक पर शोभित छनि आ ई भाषा बुझनिहार लोकक मन मोहबला अछि । एहिठाम हमरा सभ के इ नहि बिसरबाक चाही जे विद्यापति एहि भाषा कें वाल चन्द्र सदृश ठाद कएने छथि । विद्यापति अपन एहि भाषा मे कीर्तिपताका आ कीर्तिलता नामक ग्रंथ लिखलनि । एहि दुनू ग्रंथक अलावा ओ संस्कृत मे भू-परिक्रमा, पुरुष परीक्षा, लिखनावली, शैव सर्वस्वसार, गंगावाक्यावली, दानवाक्ययावली, दुर्गा भक्‍ति तरंगिनी, विभाग सार, न्याय पत्तल, ज्योति प्रदर्पण, वर्षकृत्य, गोरक्ष विजय (नाटक ), मणिमंजरी (नाटक) आदि ग्रंथक रचना कएलनि । जतऽ भू परिक्रमा मे विद्यापति मुख्य तीर्थ सभक वर्णन कएने छथि ओतऽ लिखनावली मे पत्र लेखन शैलीक विवरण अछि । राजा शिवसिंहक आदेश पर लिखल गेल पुरूष परीक्षा मे ललित कथाक रूप मे धार्मिक तथा राजनीतिक विषयक वर्णन अछि । ठीक एहिना दुर्गा भक्ति तरंगिनी मे दुर्गाक गहना तथा दुर्गा पूजाक विधि संबंधी बात नरसिंह देवक आदेश पर लिखल गेल । शैव सर्वस्वसार मे भव सिंह सँ लऽ कऽ विश्‍वास देवी धरिक राजाक कीर्ति कथाक संगहि शिवपूजा विधिक उल्लेख अछि ।

एहि तरहें देखल जाय तँ ओ मात्र गीतकारे नहि, अपितु यात्रा वृतांत लेखक, कथाकार, पत्र लेखक, निबन्धकार आदि छलाह । मुदा सभ सँ बेसी हुनका ख्याति भेटलनि गीतकारक रूप मे । एहि रूप मे ओ अमर भऽ गेलाह । हुनक गीतक संबंध मे ग्रियर्सन कहने छथि - ’भलेहि हिन्दू धर्मक सुर्य अस्त भऽ जाय, ओहन समय आबि जाए जखन कृष्णक स्तुतिक लेल लोक मे विश्‍वास आ श्रद्धा नहि एहि जाईक जे हमरा लोकनिक अस्तित्वक औषधि अछि, तथापि विद्यापति गीतक प्रति जे अनुराग अछि, ओ कहियो कम नहि होयत जाहि मे ओ राधा कृष्णक चर्च कएने छथि ।

विद्यापतिक जतेक गीतसभ अछि ओहिमे अधिकांश गीत सभ षृंगार-रस प्रधान अछि, जाहिमे संस्कृत शास्त्रक अनुसार वय: सन्धि, नखशिख, विरह, अभिसार, सद्य: स्नाता, कौतुक, मान, मिलन आदिक वर्णन बहुत मनमोहक ढ़ग सँ कएल गेल अछि । उदाहरणक रूप मे नख शिख वर्णनक एकटा गीत देखल जा सकैछ -

माधव की कहब सुन्दरि रूपे ।

कतन जतने विहि आनि समारल, देखल नयन सरूपे ॥

पल्लवराज चरण -युग सोभित, गति गजराजक भाने ।

कनक कदलिपर सिंह समारल, तापर मेरू समाने ।

मेरू उपर दुई कमल फ़ुलाएल, नाल बिना रूचि पाई ।

मनिमय हार धार बहु सुरसरि, तेँ नहि कमल सुखाई ॥

अधर बिम्बसन, दसन दाडिम बिजु , रवि ससि उगथि पासे ।

राहु दूर बसु निअरे न आवथि तेँ नहि करथि गरासे ॥

सारंग उपर उगल दस सारंग, केलि करथि मधुपाने ॥

भन‍ई विद्यापति सिन बर जौबति, एहि जगत नहि आने ।

राजा सिवसिंह रुपनाराएन, लखिमा देह प्रतिभाने ॥

विद्यापतिक उपर्युक्त गीत समस्त भारतीय भाषा-संसार मे अद्वितीय मानल गेल अछि । एहि गीतपर मोहित भऽ कऽ महाकवि सूर तथा कवि चन्द सेहो एहि प्रकारक गीत लिखबाक चेष्टा कएलनि, मुदा जे उचाँइ विद्यापति अपना गीतमे दऽ सकलाह ओ उँचाइ हिनाकालोनिसँ सम्भव नहि भऽ सकल ।

विद्यापति मात्र एकटा साहित्यिके व्यक्‍ति नहि, अपितु ओ एकटा सफ़ल कूटनीतिज्ञ सेहो छलाह । एकर पुष्टि एहि तथ्यसँ होइत अछि जे जखन यवन सेना हुनक प्रिय राजा शिवसिंह केँ पकड़िकऽ दिल्ली लऽ गेलनि तँ ओ अपन कुटनीतिक प्रयाससँ हुनका छोड़ाकऽ दिल्ली सँ पुन: मिथिला अनलनि । एहि क्रम मे दिल्लीक बादशाह केँ जखन अपन परिचय देलथिन तँ ओ कहलकनि जे तोँ अपनाकेँ कवि कहैत छह तँ अपन कौबल देखाबह । एहिपर विद्यापति कहलथिन जे हम अद्रुश्य चीजक वर्णन कऽ सकैत छी । तखन हुनक आँखिपर पट्टी बान्हि देल गेलनि ।

कोनो- कोनो ठाम उल्लेख अछि जे सन्नुकमे बन्न कऽ कऽ हुनका इनारमे धऽ देल गेलनि आ कतेको ठाम इहो उल्लेख अछि जे हुनका कोठली मे बन्न कऽ देल गेलनि । मुदा ई दुनू बात विश्‍वसनीय नहि बुझना जाइछ । कारण जाहिठाम दरबार लगैत छल होएत ओहिठाम इनार रहब असंगत बुझि पड़ैत अछि । दोसर जँ विद्यापति चिचिया- चिचियाकऽ गबितथि तखनहि बादशाह तथा अन्य दरबारीलोकनिकेँ सुनऽमे अबितनि एहना स्थिति मे पट्टीए समचीन बुझना जाइत अछि । खैर तखन एकरा बाद जे नृत्यांगना नृत्य कएलनि ओकर बोल निम्नाड्गित रूपेँ देलनि -

सजनि निहुरि फ़ुकू आगि ।

तोहर कमर भमर मोर देखल, मदन उठल जागि ॥

जौँ एहि सङ्कटसौ जिव बाँचत होएत लोचन मेला ॥

भन विद्यापति चाहथि जे विधि करथि से- से लीला ।

राजा शिवसिंह बन्धन मोचन तखन सुकवि जीला ॥

राजा शिवसिंह स्वच्छंद प्रकृतिक लोक रहबाक कारणे पुन: दिल्लीक बादशाहक उल्लङ्कन करऽ लगलाह । अत: ओ कुपित भऽ कऽ हिनकापर चढ़ाइ कऽ देलकनि । एहिबेरक लछण- करम ठीक नहि छल , तेँ शिवसिंह अपन सभसँ विश्‍वासी व्यक्ति विद्यापतिक सङ्क महारानी लोकनिकेँ राजा पुरादित्यक ओहिठाम रहलाह । ओहि राजाक विश्‍वासपात्र बनल रहलाह । ओ दोसर, कोनो आन राजाक समक्ष कोना की बर्ताव कएल जाए, तकर ज्ञान हिनका नीक जकाँ छलनि । ई दुनू बात हिनक व्यक्तित्व उल्लेखनीय पक्ष अछि

विद्यापति कतेको राजा तथा रानीक दरबार मे रहलाह । यथा- गणेश्‍वर, भवेश्‍वर, कीर्तिसिंह, देवसिंह, शिवसिंह, पद्मसिंह, विश्‍वासदेवी, रत्नसिंह तथा धीरसिंह । एहिमे गणेश्‍वरक वध कऽ भवेश्‍वर राजा भेल छलाह । कीर्तिसिंह दिल्लीक बादशाहक सहयोगसँ भवेश्‍वरक पुत्रकेँ मारि हत्याक बदला लऽ राज्य फ़िर्ता लेलनि । शिवसिंह युद्धभूमिसँ लापता भऽ गेलाह । कतेको राजासँ हुनकालोकनिक स्वाभाविक मृत्युक कारणे विद्यापतिक सङ्क छुटि गेलनि । एहि तरहेँ ओ गणेशवरसँ धीरसिंह धरिक घटनाकेँ देखैत- देखैत भीतरसँ टुटि गेल छलाह । तेँ अधिकांश गीतमे धैर्य रखबाक प्रेरणा देनिहार महान आशावादी कवि निराशावादी मे बदलि गेलाह । एहना स्थिति मे ओ कहि उठलाह - माधव हम परिणाम निरासा ।

यवनक आक्रमण तथा जल्दी जल्दी नेतृत्व परिवर्त्नक कारणे मिथिलाक आर्थिक आ सामाजिक स्थिति सुदृढ छल से नहि कहल जा सकैत अछि । कारण, ई परिपाटी देखल गेल अछि जे जखन कोनो क्षेत्रपर यवन सेना आक्रमण करैत छल तँ ओसभ ओहि क्षेत्रके नाश कऽ दैत छल । रूपमती स्त्रीलोकनिक आत्मा ओकरासभक अत्याचार सँ कलपि उठैत छलनि । राज्यक लोकसभ त्राहिमाम त्राहिमाम करऽ लगैत छल । एहना स्थितिमे गार्हस्थ्य जीवन छिन्न भिन्न भऽ जाइत छलैक । एहि विकट परिस्थिति मे गार्हस्थ्य जीवनसँ पलायनोन्मुख समाजकेँ पुन: गार्हस्थ्य जीवन मे घुमएबाक हेतु विद्यापति एहि शिवगीतक रचना करैत देखल जाइत छथि -

बेरि-बेरि अरे सिव, मोञ तोहि बोल्यो

किरिस करिअ मन लाए ।

बिनु सरमे रर्हिअ, भिखिए पए मड्गिअ

गुन गौरब दुर जाए ॥

खटमऽ काटि हर हर बन्धबिए

तिरसिल तोड़िअ करू फ़ारे ।

बसह धुरन्धर लए हर जोतिअ

पाटिअ सुरसरि धारे ॥

एतबए नहि, विद्यापतिक समय मे मिथिला मे बहु विवाहक प्रथा छल । स्वयं राजा शिवसिंह छओटा विवाह कएने छलाह । स्त्री केँ भोगक वस्तु मानल जाइत छल । तेँ लोक बुढ़ो मे विवाह करबाक हेतु आतुर रहैत छल । एकर चित्र हमरालोकनिकेँ विद्यापतिक दोसर गीत मे भेटैत अछि -

आगे माइ , हम नहि आजु रहब एहि आड्गन ।

जञो बुढ़ होएत जमाय ॥

मिथिलाक किछु वर्ग मे ई देखल जाइत अछि जे जखन पति पत्नी मे कोनो प्रकारक झगड़ा होइत छैक तँ पत्‍नी अपन बेटा - बेटीकँ कखियाकऽ नैहर चलि दैत अछि । ई परिपाटी विद्यपतिकालीन मिथिला मे सेहो छल । एकर चित्रण हमरा लोकनिकँ विद्यापतिक निम्नाङित गीत मे भेटैत अछि _

चलली भवानी तेजिअ महेश ।

कर धए कार्तिक गोद गणेश ॥

उपर्युक्त शिवगीतकँ देखैत ई बात सरासर गलत होएत जे विद्यापति खाली रजनीए- सजनीमे लागल रहलाह । किछु समीक्षकलोकनि एहू बातकँ बिसरि जाइत छथि जे “घन घन घनन गुगुर कतऽ बाजए , हन हन कर तुअ काता" वला भैरवी वन्दना सेहो ओ लिखलनि जे वीररसकेँ साकार करैत अछि । एहि तरहें देखैत छी जे विद्यापति अपन कलमरूपी तरूआरि नीकजकाँ चारूदिस भजलनि । ईएह कारण अछि जे विद्यापतिकेँ जतेक उपाधि देल गेलनि ओतेक उपाधि संसारक कोनो कवि नहि पाबि सकलाह । आइ ई हमरालोकनिक समक्ष कविकोकिल, कविकण्ठहार, कविरञ्जन, कविशेखर, सुकवि, महाकवि, दशावधान, पञ्चानन , अभिनव जयदेव आदि उपाधिसँ जानल जाइत छथि ।

मिथिलाक ई नक्षत्र सन १४५० ई मे कैलाशवासी भऽ गेलाह । यद्यपि हिनक जन्म आ मृत्युक साल विद्वानलोकनिक बीच मतान्तरक विषय आछि, तथापि मास तिथि मे कोनो विवाद नहि अछि । कारण, एकर उल्लेख हमरालोकनिकेँ भेटि गेल अछि-

विद्यापतिक आयु अवसान ।

कार्तिक धवल त्रयोदशि जान ॥



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