मैथिलीक आकाशमे विद्यापति एकटा एहन नक्षत्रराज भेलाह जनिका लऽ कऽ हमरालोकनि
आन-आन भाषा-भाषीक समक्ष गौरवक अनुभव कऽ रहल छी । बड्गालीलोकनि हिनक कृतिसँ
मुग्ध भऽ कऽ हिनका बङ्गाली बनएबाक अथक प्रयास सेहो कएलनि, मुदा ओ लोकनि
सफल नहि भेलाह । महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री, जस्टिस शारदाचरण मित्र,
बाबू नगेन्द्रनाथ गुप्त आदि बङ्गाली विद्वानलोकनि मानि लेलनि जे विद्यापति
बङाली नहि, मिथिलावासी छलाह आ मैथिलीमे गीत लिखलनि । एहि दिशामे काज कएनिहार
ग्रियर्सन साहेब निश्चित रुपसँ धन्यवादक पात्र छथि जे सर्वप्रथम विद्यापतिकेँ
बंगाली सँ बिहारी प्रमाणित कएलनि ।
विद्यापतिक जन्म सन १३६० ई. मे मधुबनी जिलाक बिस्फी गाममे भेल छलनि
। ई बैशैबारगढ़ मूलक काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण छलाह । मुदा जहियासँ
बिस्फी
गाम उपार्जन कएलनि तहियासँ हिनक मूल बिशैबार बिस्फी भऽ गेलनि ।
हिनक पिताक नाम गणपति ठाकुर तथा माताक नाम हासिनी देवी छलनि । कहल
जाइत अछि जे कपिलेश्वर
महादेवक आराधना कऽ गणपति ठाकुर एहन पुत्ररत्न प्राप्त कएने छलाह
। मिथिलाक प्रसिद्ध विद्वान हरि मिश्र सँ ई शिक्षा ग्रहण कएने छलाह
। पक्षधर मिश्र
हिनक सहपाठी छलथिन ।
ई एकटा मनोवैज्ञानिक तथ्य अछि जे जखन केओ समाजमे उच्च पदपर आसीन
भऽ जाइत छथि तँ हुनक विद्वेषी हुनक व्यक्तित्वकेँ छोट करबाक हेतु
नाना प्रकारक
बात सभ करऽ लगैत अछि । एहन विद्वेषीमे एकटा केशव मिश्र सेहो छलाह
। ओ अपन द्वैतपरिविष्ट नामक धर्मशास्त्र-ग्रन्थमे ‘ये केञ्चन्र
भागवतः ग्राम
याचकः नर्तकाः’ कहि कऽ विद्यापतिक उपहास छथि । अर्थात ओ राजदरबारमे
भागवतक वाचन करैत छलाह तेँ भगवतिया भेलाह, ओ राजा शिवसिंहसँ बिस्फी
ग्राम उपहारस्वरुप
पओने छलाह तेँ ग्राम-याचक भेलाह आ देशी भाषामे गीत बनौलनि ते
नटुआ भेलाह । मुदा अपसोचक बात ई अछि जे केशव मिश्र आइ जीवित नहि
छथि
। जँ ओ आइ जीवित
रहितथि तँ विद्यापतिक लोकप्रियता देखिकऽ हुनक माथ लाजसँ झुकि
जइतनि ।
विद्यापतिक पिता गणपति ठाकुर राजा गणेश्वरक दरबारमे मन्त्री
छलाह । तें ओ नेत्रहिसँ अपन पिताक सङ्ग गणॆश्वरक दरबारमे जाइत-अबैत
छलाह । गणेश्वरक
बाद कीर्तिसिंह राजा भेलाह । अतः ओ हिनका दरबारमे जाए-आबऽ लगलाह
। विद्यापति एहि कीर्तिसिंहक नामपर अपन पहिल पुस्तक कीर्तिलता
लिखलनि
। एकर भाषा अपभ्रंश
(संस्कृत-प्राकृत मिश्रित मैथिली) अछि, जकरा ओ अवहट्ट कहने
छाथि । एहि भाषा पर हुनका गर्व सेहो छलनि । एतदर्थ देखल जा सकैत
अछि
ओहि पुस्तकक
पहिल पल्लबक ई पांति-
देसिल बयना सब जन मिट्ठा ।
तें तैसन जम्पओ अवहट्ठा ॥
अर्थात देशी भाषा (अपन भाषा) सभकेँ मीठ लगैत छैक । तें हम एहि
भाषामे एकर रचना कएल । हुनक मोनमे इहो शङ्का छलनि जे
ज्योतिरीश्वर जकाँ
हमरो एहि भाषाकेँ देखिकऽ संस्कृतक पंडित हँसताह । कारण,
ओहि समयमे न्याय आ
मीमांसाक अध्ययन तथा टिप्पणी लिखब पण्डितलोकनिक प्रिय
वस्तु छलनि । मुदा विधापति एहि मार्ग कें बदलि कऽ ज्योतिरीश्वर
जकाँ अपन
नव मार्ग बनेलनि
। ई नव मार्ग विषय-वस्तु तथा भाषा दुनू स्तर पर छल ।
तें
हुनक भाषाक संबंधमे कहल जाईछ :- बाल चन्द विज्जावइ भाषा ।
दुहु नहि लग्गै दुज्जन हासा ॥
श्री परमेश्वर हर सिर सोहई ।
ई णिच्चई णाअर मन मोहइ ॥
अर्थात् बालचन्द्र तथा मैथिली भाषा देखि कऽ दुर्जन लोक कें
हँसी नहि लगतनि । कारण बाल चन्द्रमा शिवक मस्तक
पर शोभित छनि आ ई भाषा
बुझनिहार
लोकक मन मोहबला अछि । एहिठाम हमरा सभ के इ नहि
बिसरबाक चाही जे विद्यापति एहि भाषा कें वाल चन्द्र सदृश ठाद कएने
छथि । विद्यापति
अपन एहि भाषा
मे कीर्तिपताका आ कीर्तिलता नामक ग्रंथ लिखलनि
।
एहि दुनू ग्रंथक अलावा ओ संस्कृत मे भू-परिक्रमा, पुरुष परीक्षा,
लिखनावली, शैव सर्वस्वसार,
गंगावाक्यावली, दानवाक्ययावली, दुर्गा भक्ति
तरंगिनी, विभाग सार, न्याय पत्तल, ज्योति प्रदर्पण, वर्षकृत्य,
गोरक्ष
विजय (नाटक ),
मणिमंजरी (नाटक)
आदि ग्रंथक रचना कएलनि । जतऽ भू परिक्रमा मे
विद्यापति मुख्य
तीर्थ सभक वर्णन कएने छथि ओतऽ लिखनावली मे पत्र
लेखन शैलीक विवरण अछि
। राजा शिवसिंहक
आदेश पर लिखल गेल पुरूष परीक्षा मे ललित कथाक
रूप मे धार्मिक तथा राजनीतिक विषयक वर्णन अछि । ठीक एहिना दुर्गा
भक्ति
तरंगिनी मे
दुर्गाक गहना तथा
दुर्गा पूजाक विधि संबंधी बात नरसिंह देवक आदेश
पर लिखल गेल । शैव सर्वस्वसार मे भव सिंह सँ लऽ कऽ विश्वास देवी
धरिक
राजाक
कीर्ति
कथाक संगहि शिवपूजा
विधिक उल्लेख अछि ।
एहि तरहें देखल जाय तँ ओ मात्र गीतकारे नहि,
अपितु यात्रा वृतांत लेखक, कथाकार, पत्र लेखक,
निबन्धकार
आदि छलाह
। मुदा सभ सँ
बेसी हुनका ख्याति भेटलनि गीतकारक रूप
मे । एहि रूप मे ओ अमर भऽ गेलाह । हुनक गीतक संबंध मे
ग्रियर्सन कहने छथि - ’भलेहि हिन्दू धर्मक सुर्य अस्त भऽ
जाय, ओहन समय
आबि जाए जखन
कृष्णक स्तुतिक लेल लोक मे
विश्वास आ श्रद्धा नहि एहि जाईक जे हमरा लोकनिक अस्तित्वक
औषधि अछि, तथापि विद्यापति गीतक प्रति जे अनुराग
अछि, ओ
कहियो कम
नहि होयत जाहि
मे ओ राधा कृष्णक चर्च कएने
छथि ।
विद्यापतिक
जतेक गीतसभ अछि ओहिमे अधिकांश गीत सभ षृंगार-रस प्रधान अछि, जाहिमे संस्कृत शास्त्रक
अनुसार वय: सन्धि, नखशिख, विरह, अभिसार, सद्य: स्नाता, कौतुक, मान, मिलन आदिक
वर्णन बहुत मनमोहक ढ़ग सँ कएल गेल अछि । उदाहरणक रूप मे नख शिख वर्णनक एकटा गीत
देखल जा सकैछ -
माधव की कहब सुन्दरि रूपे ।
कतन जतने विहि आनि समारल, देखल नयन सरूपे ॥
पल्लवराज चरण -युग सोभित, गति गजराजक भाने ।
कनक कदलिपर सिंह समारल, तापर मेरू समाने ।
मेरू उपर दुई कमल फ़ुलाएल, नाल बिना रूचि पाई ।
मनिमय हार धार बहु सुरसरि, तेँ नहि कमल सुखाई ॥
अधर बिम्बसन, दसन दाडिम बिजु , रवि ससि उगथि पासे ।
राहु दूर बसु निअरे न आवथि तेँ नहि करथि गरासे ॥
सारंग उपर उगल दस सारंग, केलि करथि मधुपाने ॥
भनई विद्यापति सिन
बर जौबति, एहि जगत नहि आने ।
राजा सिवसिंह रुपनाराएन, लखिमा देह प्रतिभाने ॥
विद्यापतिक उपर्युक्त गीत समस्त भारतीय भाषा-संसार मे अद्वितीय मानल गेल
अछि । एहि गीतपर मोहित भऽ कऽ महाकवि सूर तथा कवि चन्द सेहो एहि प्रकारक गीत लिखबाक
चेष्टा कएलनि, मुदा जे उचाँइ विद्यापति अपना गीतमे दऽ सकलाह ओ उँचाइ हिनाकालोनिसँ
सम्भव नहि भऽ सकल ।
विद्यापति मात्र एकटा साहित्यिके व्यक्ति नहि, अपितु ओ एकटा सफ़ल कूटनीतिज्ञ
सेहो छलाह । एकर पुष्टि एहि तथ्यसँ होइत अछि जे जखन यवन सेना हुनक प्रिय राजा
शिवसिंह केँ पकड़िकऽ दिल्ली लऽ गेलनि तँ ओ अपन कुटनीतिक प्रयाससँ हुनका छोड़ाकऽ
दिल्ली सँ पुन: मिथिला अनलनि । एहि क्रम मे दिल्लीक बादशाह केँ जखन अपन परिचय
देलथिन तँ ओ कहलकनि जे तोँ अपनाकेँ कवि कहैत छह तँ अपन कौबल देखाबह । एहिपर विद्यापति
कहलथिन जे हम अद्रुश्य चीजक वर्णन कऽ सकैत छी । तखन हुनक आँखिपर पट्टी बान्हि
देल गेलनि ।
कोनो- कोनो ठाम उल्लेख अछि जे सन्नुकमे बन्न कऽ कऽ हुनका इनारमे धऽ
देल गेलनि आ कतेको ठाम इहो उल्लेख अछि जे हुनका कोठली मे बन्न कऽ
देल गेलनि । मुदा ई दुनू
बात विश्वसनीय नहि बुझना जाइछ । कारण जाहिठाम दरबार लगैत छल होएत ओहिठाम इनार
रहब असंगत बुझि पड़ैत अछि । दोसर जँ विद्यापति चिचिया- चिचियाकऽ गबितथि तखनहि
बादशाह तथा अन्य दरबारीलोकनिकेँ सुनऽमे अबितनि एहना स्थिति मे पट्टीए
समचीन बुझना जाइत
अछि । खैर तखन एकरा बाद जे नृत्यांगना नृत्य कएलनि ओकर बोल निम्नाड्गित रूपेँ
देलनि -
सजनि निहुरि फ़ुकू आगि ।
तोहर कमर भमर मोर देखल, मदन उठल जागि ॥
जौँ एहि सङ्कटसौ जिव बाँचत होएत लोचन मेला ॥
भन विद्यापति चाहथि जे विधि करथि से- से लीला ।
राजा शिवसिंह बन्धन मोचन तखन सुकवि जीला ॥
राजा शिवसिंह स्वच्छंद प्रकृतिक लोक रहबाक कारणे पुन: दिल्लीक बादशाहक उल्लङ्कन
करऽ लगलाह । अत: ओ कुपित भऽ कऽ हिनकापर चढ़ाइ कऽ देलकनि । एहिबेरक लछण- करम ठीक
नहि छल , तेँ शिवसिंह अपन सभसँ विश्वासी व्यक्ति विद्यापतिक सङ्क महारानी लोकनिकेँ
राजा पुरादित्यक ओहिठाम रहलाह । ओहि राजाक विश्वासपात्र बनल रहलाह । ओ दोसर,
कोनो आन राजाक समक्ष कोना की बर्ताव कएल जाए, तकर ज्ञान हिनका नीक जकाँ छलनि ।
ई दुनू बात हिनक व्यक्तित्व उल्लेखनीय पक्ष अछि
विद्यापति कतेको राजा तथा रानीक दरबार मे रहलाह । यथा- गणेश्वर,
भवेश्वर, कीर्तिसिंह, देवसिंह, शिवसिंह, पद्मसिंह, विश्वासदेवी,
रत्नसिंह तथा धीरसिंह । एहिमे गणेश्वरक
वध कऽ भवेश्वर राजा भेल छलाह । कीर्तिसिंह दिल्लीक बादशाहक सहयोगसँ भवेश्वरक
पुत्रकेँ मारि हत्याक बदला लऽ राज्य फ़िर्ता लेलनि । शिवसिंह युद्धभूमिसँ लापता
भऽ गेलाह । कतेको राजासँ हुनकालोकनिक स्वाभाविक मृत्युक कारणे विद्यापतिक सङ्क
छुटि गेलनि । एहि तरहेँ ओ गणेशवरसँ धीरसिंह धरिक घटनाकेँ देखैत- देखैत भीतरसँ
टुटि गेल छलाह । तेँ अधिकांश गीतमे धैर्य रखबाक प्रेरणा देनिहार महान आशावादी
कवि निराशावादी मे बदलि गेलाह । एहना स्थिति मे ओ कहि उठलाह - माधव हम परिणाम
निरासा ।
यवनक आक्रमण तथा जल्दी जल्दी नेतृत्व परिवर्त्नक कारणे मिथिलाक आर्थिक
आ सामाजिक स्थिति सुदृढ छल से नहि कहल जा सकैत अछि । कारण, ई परिपाटी
देखल गेल अछि जे
जखन कोनो क्षेत्रपर यवन सेना आक्रमण करैत छल तँ ओसभ ओहि क्षेत्रके नाश कऽ
दैत छल ।
रूपमती स्त्रीलोकनिक आत्मा ओकरासभक अत्याचार सँ कलपि उठैत छलनि । राज्यक लोकसभ
त्राहिमाम त्राहिमाम करऽ लगैत छल । एहना स्थितिमे गार्हस्थ्य जीवन छिन्न भिन्न
भऽ जाइत छलैक । एहि विकट परिस्थिति मे गार्हस्थ्य जीवनसँ पलायनोन्मुख समाजकेँ
पुन: गार्हस्थ्य जीवन मे घुमएबाक हेतु विद्यापति एहि शिवगीतक रचना करैत देखल
जाइत छथि -
एतबए नहि, विद्यापतिक समय मे मिथिला मे बहु विवाहक प्रथा छल । स्वयं राजा
शिवसिंह छओटा विवाह कएने छलाह । स्त्री केँ भोगक वस्तु मानल जाइत छल । तेँ लोक
बुढ़ो मे विवाह करबाक हेतु आतुर रहैत छल । एकर चित्र हमरालोकनिकेँ विद्यापतिक दोसर
गीत मे भेटैत अछि -
मिथिलाक किछु वर्ग मे ई देखल जाइत अछि जे जखन पति पत्नी मे कोनो प्रकारक
झगड़ा होइत छैक तँ पत्नी अपन बेटा - बेटीकँ कखियाकऽ नैहर चलि दैत अछि । ई परिपाटी
विद्यपतिकालीन मिथिला मे सेहो छल । एकर चित्रण हमरा लोकनिकँ विद्यापतिक निम्नाङित
गीत मे भेटैत अछि _
उपर्युक्त शिवगीतकँ देखैत ई बात सरासर गलत होएत जे विद्यापति खाली
रजनीए- सजनीमे लागल रहलाह । किछु समीक्षकलोकनि एहू बातकँ बिसरि
जाइत छथि जे “घन घन घनन गुगुर
कतऽ बाजए , हन हन कर तुअ काता" वला
भैरवी वन्दना सेहो ओ लिखलनि जे वीररसकेँ साकार करैत अछि । एहि तरहें देखैत छी
जे विद्यापति अपन कलमरूपी तरूआरि नीकजकाँ चारूदिस भजलनि । ईएह कारण अछि जे विद्यापतिकेँ
जतेक उपाधि देल गेलनि ओतेक उपाधि संसारक कोनो कवि नहि पाबि सकलाह । आइ ई हमरालोकनिक
समक्ष कविकोकिल, कविकण्ठहार, कविरञ्जन, कविशेखर, सुकवि, महाकवि, दशावधान, पञ्चानन
, अभिनव जयदेव आदि उपाधिसँ जानल जाइत छथि ।
मिथिलाक ई नक्षत्र सन १४५० ई मे कैलाशवासी भऽ गेलाह । यद्यपि हिनक
जन्म आ मृत्युक साल विद्वानलोकनिक बीच मतान्तरक विषय आछि, तथापि
मास तिथि मे
कोनो
विवाद नहि
अछि । कारण, एकर उल्लेख हमरालोकनिकेँ भेटि गेल अछि-