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बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई
प्रात: स्मरणीय गोस्वामी लक्ष्मीनाथ परमहंस (बाबाजी)क जन्म सहरसा जिलाक परसरमा गाम मे विक्रम संवत् १८५० (१७९३ ई०, सन् १२०० साल) मे भेल छलनि । हुनक पिताजीक नाम पं० बच्चा झा छलनि । बाबा कुजिलवार दीगौन मूल आ कात्यायन गोत्रक मैथिल ब्राह्मण छलाह । बाबा नेना मे किछु समय धरि भगवान कृष्ण जकाँ गौ माताक सेवा मे रहलथि । उपनयन संस्कारक बाद ओ महिनाथपुरक ज्योतिषी पं० श्री रत्ते झा लग ज्योतिष शास्त्रक अध्ययन करबाक लेल गेलथि । पं० श्री रत्ते झा नहि केवल तंत्र शास्त्रक पूर्ण ज्ञाता छलाह वरन सफल साधक सेहो छ्लाह । बाबाक अभिलाषा देखि पं० श्री रत्ते झा बाबा कें तंत्र शास्त्रक शिक्षा आ साधना पर अग्रसर हेबा मे बहुत मददि केलनि । गुरुक कृपा सँ किछुए समय मे ओ नीक योग्यता प्राप्त कऽ लेलनि । अध्ययन समाप्त कयलाक बाद ओ घर वापस अयलाह । माता-पिता कें हुनका चेहरा पर गंभीर उदासी देखेलनि आ ओ हुनक वियाह कहुआ गामक शोखादत्त ठाकुरक पुत्री सँ कऽ देलनि । ओना बाबा वियाह नहि करय चाहैत छलाह, कारण ओ एकरा अपन भावी साधना मे बाधा बुझैत छ्लाह, परन्तु माता-पिताक आज्ञाक पालन सेहो आवश्यक छल । परन्तु गृहस्थी मे हुनका मोन नहि लगलनि । नेने सँ हुनका योगाभ्यास करबाक प्रबल इच्छा छलनि, किन्तु योग्य गुरु नहि भेटबाक कारण ओ गुरुक खोज मे निकलि गेलाह । जंगल मे भटकैत संजोग सँ हुनका योगिराज लम्बानाथजी सँ भेंट भेलनि । बाबाक प्रबल इच्छा कें देखि योगिराज लम्बानाथ जी हुनका सँ बहुत प्रसन्न भेलाह । शुरू मे योगिराज युवक गोस्वामी लक्ष्मीनाथ कें साधनाक शुरुआती काज सभक जानकारी देलनि । फेर शरीर शुद्धि, अंगन्यास, मुद्रा, आसन आ प्राणायामक भेद आ ओकर साधनक नियम बतेलनि । फेर अष्टांग योगक शिक्षा दऽ कऽ ओकरा सिद्ध करबाक विध बतेलनि । एकर बाद समाधिपाद, साधनपाद, विभुतिपाद आ आदि चतुस्पदक ज्ञान करा कऽ हुनका साधनाक नियम बतेलाह ।
एहि प्रकारें योगिराज श्री लम्बानाथ जी छ्बे महिना मे योगक सभ आवश्यक विषयक ज्ञान करा देलनि आ हुनका साधना मे सफलता सेहो दिऔलनि । फेर गुरुजी बाबा के अपन घर वापस जेबाक आ भगवत भजनक आदेश देलनि । योग स्नातक बाबा लक्ष्मीनाथ पत्र, पुष्प, फल आ जल दक्षिणा मे दऽ कऽ योग विद्याक समावर्तन केलनि आ गुरुजीक आशीर्वाद लेलनि । नि:स्वार्थ, निर्लोभ, विरक्त आ दयालु गुरु दक्षिणा स्वीकार केलनि आ मोन सँ आशीर्वाद देलनि । एहि प्रकारें बाबा जहन ३५ वर्ष सँ कम्मे उम्र के रहथि तँ गुरु हुनका योग बल सँ अभीष्ट स्थान पठा देलनि आ ओ घर सँ अन्यत्र रहुआ गामक एकटा पीपरक गाछक नीचाँ अपन साधन स्थान चुनलनि । कतेको वर्ष धरि तपस्या कऽ कऽ ओ दक्षता प्राप्त केलनि आ परिब्राजकक रूप मे प्रसिद्ध-प्रसिद्ध स्थान पर घुमय लगलाह । राजा-महाराजक ओतय सँ हुनका बजाहटि होमय लागल, परन्तु ओ कतौ जायब पसन्द नहि केलनि । जिनकर विशेष आग्रह देखैत छ्लाह ओतय जाइतो छ्लाह । बनगाँव जिला- सहरसाक औजस्क्ल (पहलवानी) युग मे परिब्राजक बाबा लक्ष्मीनाथ ओतय पहुँचलाह । ओहि समय ओ सन्यास ग्रहण कऽ शिखा सूत्र कें तिलांजलि दऽ चुकल छलाह । हुनक गठित स्वास्थ्य देखि कऽ के युवक के बूढ़ सभ खुशी सँ हुनका बनगाँव मे स्वागत केलनि । हुनक स्वागत एहि लेल नहि भेलनि जे ओ एकटा महान साधू या योगी छलाह वरन लोक सभक विश्वास छ्ल जे यदि हिनका नीक जकाँ खुआयल-पिआयल जाय तँ ई एक दिन नीक पहलमान निकलताह । बाबा बहुत जल्दी गामक लोक सँ हिल-मिल गेलाह । ओ चिक्का, कब्बड्डी, खोरी आदि देहाती खेल मे नीक खिलाड़ी बूझय जा लगलाह । ओहि समय बनगाँव मे दूध-दहीक बहुतायत छल । एकटा धनिक सज्जन, श्री करी खाँ हुनका दूध पीबाक लेल एकटा नीक गाय देलकनि । बाबाक लेल गौआँ लोकनि ठाकुरवाड़ीक प्राँगण मे एकटा पर्ण कुटी बनवा देलनि । ओ बेसी काल बनगाँवे मे रहय लगलाह, कारण एतयक लोक बहुत सीधा-सादा छ्लाह आ महात्मा लोकनि के श्रद्धाक दृष्टि सँ देखैत छलाह । भरि दिन बाबा लोक सभक संग रहैत छलाह आ राति मे योगाभ्यास करैत छलाह । अनुमानत: १८१९ ई०क आसपास ओ ब्रजभाषा आ मैथिली मे कविता लिखब शुरू केलनि । ओ दोहा, चौपाई आ गीत लिखैत छ्लाह । ओ कतेको ठाम भगवानक मंदिरक संग-संग अपन कुटिया स्थापित केलनि, जाहि मे बनगाँव, परसरमी, फैटिकी, लखनौर, शक्रपूरा आदि स्थानक कुटिया बेस प्रसिद्ध भेल । पहिने एहि कुटियाक भरण-पोषण शक्रपूराक राजा करैत छलाह । बाबाक अद्भुत योग शक्तिक प्रभाव देखि कऽ लोक हुनका योगी विशेषक अवतार बूझय लगलाह । बाबाक कुटिया मे रोगी आ बन्ध्याक ताँता लागि गेल । हुनक अमोघ वाणी सँ लोक सभ लाभ उठबय लागल । बाबा सभक दुख दूर करैत छलाह ।
बाबाक वंश वृक्ष :
श्री बच्चा झा
(१) श्री विश्वनाथ झा (२) श्री लक्ष्मीनाथ झा (स्वामी जी)
नेना झा
श्री योगेश्वर झा
श्री सृष्टि नारायण झा (लाल बाबू)
श्रीमती मीनाक्षी दाय, कमलाक्षी दाय, अरुनाक्षी दाय
(केवल तीन पुत्री)