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| मधुपजी | पंडित चन्द्रनाथ मिश्र | गोविन्द झा | कांचीनाथ झा ’किरण’ | डा. ब्रज किशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ |
मधुपक महत्त्व
रमण कुमार सिंह
मधुपजीक काव्य-दृष्टि आ काव्य-परिवेश अपन बहुत रास सीमाक अछैतो बहुत व्यापक छलनि । ओ मूलतः गीतकार छलाह आ जीवन-भरि पद्ये लिखलनि-खाहे आत्मपरक रचना हो अथवा कोनो मित्र केँ लिखल पत्हुनक गीतिकाव्य नहि मात्र विषय-वैविध्यक लेल बल्कि काव्य-सौष्ठवक लेल सेहो प्रसिद्ध भेलनि । ओ एहन-एहन मर्मग्राही गीतक रचना कयलनि जे समाजक सभ वर्गक कंठ मे बसि गेल आ लोकगीतक दर्जा पौलक । मैथिल कोकिल विद्यापतिक बाद मात्र मधुपजी एक टा एहन रचनाकार भेलाह जिनक गीत जनकंठ मे बसि गेल । तेँ हिनका ’अभिनव विद्यापति’ सेहो कहल गेल । मधुपजी केँ गीतक लेल अपार लोकप्रियता भेटलनि, मुदा वैह हुनका लेल । अनेक आलोचको तैयार कयलकनि । मधुपजीक रचना काल मे मिथिला मे हिन्दी सिनेमाक गीत खूब प्रचलन मे छल । तकरे प्रतिरोध मे मधुपजी हिन्दी सिनेमाक गीत पैरोडी रचलनि जे मिथिलाक सामान्यजन मे खूब प्रचलित भेल आ हुनका अपार लोकप्रियता भेटलनि । हिनक गीत मे श्रृंगारिकताक अतिरेकक कारणेँ किछु विद्वान केँ अश्लीलता बुझना गेलनि आ हुनक आलोचना कयल गेल । हिन्दी सिनेमाक गीतक भास पर लिखल गीत भनहि हिनका लोकप्रियता दिऔलकनि, मुदा हिनक रचना-दृष्टि मे प्रतिरोधक तेहन कोनो स्वर नहि गूँजि सकल जे हिनक समकालीन अनेक कविक कविता मे भेटैत अछि । मुदा जे हो, हुनक मातृभाषाक प्रति प्रतिबद्धता आ अनन्य प्रेम केँ नकारल नहि जा सकैछ ।
हालाँकि मधुपजीक गीत बहुधा भक्तिपरक आ श्रृंगारिक रचना थिक, मुदा ओ समाज मे पसरल बाल विवाह, वृद्ध विवाह, बहु विवाह, भार-दौर आ भोज-भात मे प्रदर्शक विरोधो मे गीत लिखलनि । ’टटका जिलेबी’ मे ओ लिखने छथि-
जे हजारक भार साँठथि बेचि बच्चा पुत्र केँ
ओ जनिक गहनाग्रहेँ भरना मे खेत पथार हो
भूषणेँ युवती रिझाबक हेतु ओ हत्यार हो
आइ इ टटका जिलेबी तैं जनक उपहार हो ।
एहिना फिल्मी गीतक पैरोडी लिखबाक उद्देश्य स्पष्ट करैत ओ स्वयं लिखैत छथि-
फिल्मीभास लहरि मे भासल हरि !
हरि"! मैथिल तरुण समाज
गीतोपम पावन विद्यापति गीतो तजि
रहला अछि आज
तेँ धुनि माथ, तहू धुनि मे निज
भाषा हेतु करी हम गान
देखि ’चौंकि चुप्पे’ न चौंकि चुप्पे
क्यो होथु सरस विद्वान ।"
डेढ़ हजार सँ बेसी विविध गीतक रचना कयनिहार मधुपजीक मुख्य स्वर परंपरागत भक्ति ओ श्रृंगारक छनि । हालाँकि सामाजिक वैषम्य केँ चित्रित करैत गीतक संख्या सेहो कम नहि अछि, मुदा ई गीत सभ समाज केँ कोनो परिवर्तनकामी चेतना दिस ल’ नहि जाइत अछि आ रुढ़ि परंपराक कोनो खाम्ह केँ तोड़ि नहि पबैत अछ।
हुनक भक्ति गीतक अध्ययन कयला पश्चात ई ज्ञात होइत अछि जे ओ विद्यापतिए जकाँ पंचदेवोपासक, विशुद्ध स्मार्त मैथिली छलाह । हुनक गीतिकाव्यक विशेषता यैह अछि जे ओ मात्र फिल्मी धुन पर गीत लिखि केँ अपना आ मैथिली केँ लोकप्रियता नहि दिऔलनि बल्कि मैथिली गीतक परंपरागत स्वतंत्र भास जेना-सोहर, समदाउनि, लगनी, उदासी आदि पर सेहो गीतक रचना कयलनि । हुनक गीतकार-व्यक्तित्वक विषय मे रमानाथ झाक कहब छनि-"मधुपजी केँ गीत रचना मे प्रकृष्टता प्राप्त छनि, किन्तु हिनक गीतक लोकप्रियता भाव-भाषाक सरलता आ स्वाभाविकता पर आधारित नहि अछि, लोकप्रियताक कारण थिक ओकर संगीतात्मक एवं चित्रात्मक होएब ।" मुदा एहि सँ विपरीत मत अछि मैथिलीक इतिहास लेखक दुर्गानाथ झा ’श्रीश’ क, हुनक मन्तव्य छनि, "शिल्पक क्षेत्र मे मधुपजी लोकगीत काव्यक सरल भाषा शैलीक अतिरिक्त चमत्कारपूर्ण आलांकारिक भाषा शैलीक सेहो प्रयोग कयल जाहि मे मुख्यतः चमत्कारपूर्ण अनुप्रास आ यमकक पांडित्यपूर्ण शब्द विन्यासक छटा दिस कविक विशेष ध्यान अछि । किन्तु मधुपक सर्वश्रेष्ठ रचना ओएह रचना थिक जे सरल सहज भाषा मे लिखल गेल अछि ।" मणिपद्मक मान्यता छनि जे मधुपजीक गीतक धुन जे अरबधि क’ माँगल-चाँगल होइ, किन्तु गीतक बिम्ब रचना मौलिक अछि । प्रेमशंकर सिंह कवि चूड़ामणि केँ नवगीतकारक आदि गुरु मानैत कहैत छथि जे आधुनिक तर्ज पर लिखल मधुपजीक गीत विद्यापतिक उपरांत सर्वाधिक लोकरंजन कयलक । कुलानन्द मिश्र हिनक गीतकार व्यक्तित्व केँ कवि व्यक्तित्व सँ श्रेष्ठ मानैत कहैत छथि जे जँ हुनक गीत रचना सब लोकप्रिय नहि भेल रहितनि तँ हुनक कवि व्यक्तित्वो एतेक आदरणीय किंवा व्यापक नहि भेल रहितनि । एतबा तँ निश्चये कहल जा सकैछ जे मधुपजी अपन गीतसभ मे समसामयिकताक मूल्यवत्ता केँ निरुपित करैत विभिन्न समस्याक ओहि मे अंकन कयलनि आ एहि तरहेँ गीतक भावभूमि केँ प्रशस्त कयलनि । मैथिली लोकगीत केँ हिनक ई मौलिक देन थिक । हँ, ई फराक तथ्य अछि जे हिनक गीत मनोरंजनप्रिय विलासी मैथिलजन आ निरीह लोकक भक्ति भावना केँ परिपुष्ट कयलक, मुदा कोनो नवीन चेतना अथवा यथास्थितिक विरुद्ध कोनो प्रतिकार लेल तैयार नहि क’ सकल ।
गीतकारक अलावा मधुपजीक सृजन कर्म मुक्तक, कथाकाव्य, प्रबन्ध काव्य, खंड काव्य आदि मे पसरल अछि । देशप्रेमक भाव हिनक अनेक मुक्तक मे उजागर भेल अछि । कथा काव्यक तँ ई महत्वपूर्ण हस्ताक्षर छलाह । तत्कालीन ज्वलंत समस्या केँ ल ’क’ जेहन करुण कथाक ताना-बाना ई बुनलनि से मर्म पर सोझे-सोझ चोट करैत अछि । एहि सभ सँ फराक हिनक जे एक टा आर महत्वपूर्ण विशेषता रहलनि से ई जे समाज द्वारा जै नितांत निकृष्ट आ हेय वस्तु सभ बूझल जाइत छल यथा-छुतहर, पानक पीक, सारा परक तुलसी इत्यादि सेहो सभ कविताक वर्ण्य विषय भ’ सकैछ से ताबत मैथिली मे केओ सोचियो नहि सकैत छल, मुदा मधुपजी ताहि सभ केँ कविताक विषय बना अपन सूक्ष्म काव्य-दृष्टिक परिचय दैत छथि ।
निकृष्ट वस्तु केँ देखबाक यैह दृष्टि आगाँ हिनका सँ ’घसल अठन्नी’ सन कथाकाव्य लिखबा लेलक । ’घसल अठन्नीक’ महत्त्व आ लोकप्रियता मैथिली साहित्य मे निर्विवाद अछि । सुरेन्द्र झा ’सुमन’ एहि प्रसंगेँ लिखने छथि जे "घसल अठन्नी मे एक बोनिहारिनक करुण कथा अत्यंत मर्मस्पर्शी अछि । जेठक दुरंत दुपहरिया जकाँ सम्पूर्ण कथानक ज्वालामय अछि । श्रम पर पूजीक जे अन्याय होइ तकर साक्षी घसल अठन्नि केँ बनाय कवि कथा-कुशलता एवं काव्य-निपुणताक विलक्षण प्रयोग कयने छथि ।"
मधुपजीक कथाकाव्य मादे भीमनाथ झा लिखैत छथि, "हिनक कथाकाव्यक विषय-वस्तु सामाजिक असंतुलन सँ सम्बद्ध रहैछ । पाठकक मन पर एकर प्रभाव बहुत व्यापक रुप मे पड़ैत छैक । एकर पात्र मिथिलाक ग्रामीण परिवेश सँ अबैत अछि । ओकर समस्या व्यक्तिगत होइतो सार्वजनीन अछि ।"
मधुपजीक समकालीन कवि लोकनि आ हिनक रचनाकालक परिवेशगत स्थितिक जखन अध्ययन कयल जाइछ, तँ ई अबस्से बुझना जाइछ जे मधुपक साहित्य स्पष्टतः सामाजिक विषमताक केँ रेखांकित तँ करैत अछि मुदा ओकरा प्रति कोनो आक्रोश आ प्रतिरोधक चेतना नहि जगबैत अछि । एक टा समीक्षकक मत अछि जे ’वास्तविकता तँ ई अछि जे समस्त मधुप साहित्य एहि विशिष्ट युगक प्रति कोनो सावधान प्रतिक्रिया नहि देखबैछ । मात्र सामंती समाजक संबंधगत विद्रूपता केँ अनेक कथा-आधारक संग करुणा सँ विगलित आ सहानुभूति सँ तीतल भाषा मे एहि रचना सभ मे राखल गेल अछि ।’ मुदा केदार कानन एहि सँ अलग मंतव्य दैत कहैत छथि, "दोसराक दुख सँ उत्पन्न करुणाक भावनाक अभिव्यक्ति हिनक काव्य मे बहुत भेल अछि । यैह करुणाक भावना सामाजिक क्षेत्र मे मानवतावादी विचार केँ जन्म दैत अछि ।" प्रमुख आलोचक मोहन भारद्वाज एकर कारण स्पष्ट करैत कहैत छथि, "असल मे मधुपजी अतिशय भावुक लोक छथि । काव्यसर्जन ओ आग्रहहीन भ’क’ करैत छथि । कोनो निश्चित सिद्धांत अथवा विचारक प्रति हुनका ततेक, अनुरक्ति नहि छनि जे आग्रही भ’ जाथि ।"
कोनो टा लेखक लेल सभ सँ महत्त्वपूर्ण होइत छै रचना दृष्टि, मुदा तेहन कोनो दूरगामी परिवर्तनशील रचनादृष्टि मधुपजीक साहित्यक अवगाहन कयला पश्चात नहि अभरैत अछि । हुनक कोनो स्पष्ट आ निश्चित विचारधारा नहि छलनि तेँ आम जनताक दुख-सुख केँ बुझितो ओ ओकरा प्रति अपन पक्षधरता केँ मजबूती सँ स्थापित नहि क’ सकलाह । मात्र पाठकक मोन मे करुणा उपजायब आ ओकर मनोरंजन करब आजुक साहित्यक अभीष्ट नहि अछि ने तत्कालीन समाज मे छल । पाठकक मोनक बात केँ रचनात्मक आयाम प्रदान करब आ ओकरा मे रुढ़िवादिता आ विद्रूपताक विरुद्ध संघर्षशील चेतनाक प्रसार करब जरुरी अछि । हिनक समकालीन भवनाथ झा कहलनि जे ’बाजि गेल रणडंक’ तेँ यात्रीजी आह्वान कयलनि-’उठह कवि तोँ दहक ललकारा’ । एहिना किरण जी सामाजिक रुढ़िग्रस्तता केँ अपन लेखनी सँ छिन्न-भिन्न करैत रहला, मुदा मधुपजी ओहि काल मे भक्ति आ श्रृंगारक चासनी मे पाठक केँ ’अपूर्व रसगुल्ला’ आ ’टटका जिलेबी’ खुअबैत रहलाह ।
मधुपजी संस्कृतक विद्वान रहितो सदिखन अपन रचनाकर्म मातृभाषा मैथिली मे कयलनि, ई कम महत्त्वपूर्ण बात नहि थिक । मैथिली केँ मिथिलाक जन-जन केर भाषा बनाब’ लेल ओ हल्लुक सँ हल्लुक रचना सेहो कयलनि, ई हुनक साहस केर परिचायक थिक । काव्य-सामर्थ्यक दृष्टिएँ ई अपन समकालीन कवि मे ककरो सँ न्यून नहि रहथि । ई फराक बात जे अपन भावुक व्यक्तित्व और प्रकृतिक कारणेँ अपना काव्य केँ ओ विचारात्मक, सृजनात्मक आ प्रतिरोधात्मक यात्रीजी आ किरणजी जकाँ नहि बना सकलाह मुदा ताहि सँ हिनक महत्त्व समाप्त नहि भ’ जाइत अछि । मैथिली कविता यात्रा मे ओ एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव तेँ अबस्से छथि ।