| जनसंख्या बिहार प्राचीनकाल से ही मानव-संसाधन में रहा है। मानसूनी जलवायु, समतल उपजाऊ मैदान तथा जीवन-निर्वाह की सुविधाओं के कारण यहाँ जनसंख्याँ अधिक रही है। बिहार की जनसंख्या की मुख्य विशेषताएँ हैं- जनसंख्या की अधिकता, इसकी तीव्र वृद्धि, असमान वितरण, अधिक घनत्व, निम्न और असन्तुलित लिंग अनुपात एवं साक्षरता तथा नगरीकरण का निम्न स्तर। २००१ ई. की जनगणना के अनुसार बिहार की कुल जनसंख्या ८,२९,९८,५०९ है, जो देश की कुल जनसंख्या का ८.०७ प्रतिशत है। किन्तु बिहार भारत के केवल २.८६ प्रतिशत क्षेत्र में विस्तृत है। जनसंख्या की दृष्टि से यह उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह देश का ११वाँ बड़ा राज्य है। १९९१-२००१ के दशक में बिहार की जनसंख्या की वृद्धि दर २८.६२ प्रतिशत रही है।, जबकि देश की जनसंख्या की वृद्धि की औसत दर केवल २१.३४ प्रतिशत है। इस प्रकार बिहार की जनसंख्या-वृद्धि की दर देश की औसत जनसंख्या-वृद्धि की दर से अधिक है। राज्य की जनसंख्या का घनत्व ८८१ व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है जो देश के औसत घनत्व ३२५ से काफी अधिक है। घनत्व के दृष्टिकोण से भारत में बिहार का स्थान प. बंगाल ९०३ के बाद दूसरा है। असन्तुलित लिंग-अनुपात बिहार की जनसंख्या की विशेषता है। इस राज्य में प्रति एक हजार पुरुष पर महिलाओं की संख्या मात्र ९१९ है, भारत का यह औसत ९३३ है। १९९१ ई. की जनगणना के समान २००१ ई. में भी बिहार भारत का सबसे कम साक्षर राज्य है, भारत की ६४.८ प्रतिशत साक्षरता में केवल ४७.० प्रतिशत जनंसख्या साक्षर है। पुरुष साक्षरता ५९.७ प्रतिशत है और महिला साक्षरता मात्र ३३.१ प्रतिशत है। कुल जनसंख्या का १९.५९ प्रतिशत ०-६ आयु-वर्ग के बालक हैं। कुल आबादी का १०.४७प्रतिशत नगरीय क्षेत्र में रहती है, जबकि भारत की नगरीय आबादी का औसत २७.७८ प्रतिशत है। आबादी का केवल ३.०४ प्रतिशत बिहार में है, राज्य में नगर-समूहों की संख्या ९ और कुल नगरों की संख्या १३० है। १२५ नगर वैधिक तथा ५ गैर-वैधिक या जनगणना नगर हैं। एक लाख से अधिक आबादी वाले नगरों की संख्या १९ है, जिसमें से एक अर्थात् पटना की जनसंख्या १० लाख से अधिक है और इसे महानगर कहा जाता है। बिहार में राजस्व गाँवो की कुल संख्या ४५.१०३ है। स्पष्टतः जनसंख्या का अध्ययन किसी भी क्षेत्र के भूगोल का आवश्यक अंग है। बिहार की जनसंख्या के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य जनसंख्या की वृद्धि-जनसंख्या की वृद्धि जन्म-दर, मृत्यु-दर तथा मानव स्थानान्तरण का प्रतिफल होती है। किसी क्षेत्र में जनसंख्या की वृद्धि मुख्य रुप से जैविक, जनांककीय, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों से प्रभावित होती है। बिहार में सर्वप्रथम जनगणना का कार्य १८७२ ई. में शुरु हुआ। १९०१-२००१ जनसंख्या में वृद्धि
इससे स्पष्ट है कि १९०१ ई. में बिहार की जनसंख्या २.१२ करोड़ थी जो बढ़कर १९११ ई.में २.१६ करोड़ हो गयी। किन्तु १९२१ ई. में दुर्भिक्ष एवं महामारी के कारण यह घटकर २.१४ करोड़ हो गयी। १९२१ ई. को भारतीय जनगणना का महान विभाजन कहा जाता है। १९०१ से २००१ के बीच के एक सौ वर्षों में बिहार की जनसंख्या २,१२,४३,६३२ से बढ़कर ८,२९,९८,५०९ हो गयी। १.अनियमित एवं धीमी वृद्धि की अवस्था-१९०१-१९२१ की अवधि में बिहार के विभिन्न भागों में प्लेग, हैजा तथा सूखा के कारण मृत्यु-दर में वृद्धि हो गयी किन्तु जन्म-दर स्थिर रही। परिणामस्वरुप इसकी जनसंख्या में मात्र १.१५ लाख अर्थात् ०.५४ प्रतिशत की वृद्धि हुई अर्थात् १.५२ प्रतिशत की मामूली धनात्मक वृद्धि हुई परन्तु १९११-२१ की अवधि में इससे २.६ लाख की कमी हो गयी और यह वृद्धि ऋणात्मक थी। २.मध्यम वृद्धि की अवस्था-१९२१-५१ की अवधि में बिहार की जनसंख्या में सामान्य वृद्धि हुई। इस अवधि में इस राज्य की जनसंख्या ७७.२६ लाख की वृद्धि हुई और यह वृद्धि ३६.१७ प्रतिशत थी। १९२१-३१ की अवधि में बिहार की जनसंख्या में २०.७९ लाख अर्थात् ९.७४ प्रतिशत की वृद्धि हुई तथा १९३द१-४१ की अवधि में २८.६४ लाख अर्थात् १२.२२ प्रतिशत की वृद्धि अंकित की गई। ३. तीव्र वृद्धि की अवस्था-१९५१ ई. के बाद स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् किये गये प्रयासों के फलस्वरुप बिहार की जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हुई। पिछले पचास वर्षों १९५१-२००१ के बीच इस राज्य की जनसंख्या २.९१ करोड़ से बढ़कर ८.२९ करोड़ हो गयी और यह वृद्धि लगभग तीन गुनी थी। १९५१-६१ की अवधि में इसमें ५७.५६ लाख (१९.७९ प्रतिशत), १९६१-७१ की अवधि में ७२.८५ लाख (२०.९१ प्रतिशत), १९७१-८१ के बीच १.०२ करोड़ (२४.१६ प्रतिशत) और १९८१-९१ की अवधि में १.२२ करोड़ (२३.३८ प्रतिशत) की वृद्धि हुई। पिछले दशक (१९९१-२००१) में इस राज्य की जनसंख्या में सर्वाधिक वृद्धि अंकित की गयी। बिहार के विभिन्न भागों में प्राकृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में विभिन्नता पायी जाती है। १९०१-११ के दशक में जनसंख्या की सर्वाधिक वृद्धि (७.४६ प्रतिशत) पूर्णिया प्रमण्डल में अंकित की गयी। पटना जिले (६.५९%) तथा मगध प्रमण्डल (४.८१ प्रतिशत), मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी और शिवहर जिले (३.२४ प्रतिशत), मुंगेर प्रमण्डल (३.१३ प्रतिशत), कोसी प्रमण्डल (३.०९ प्रतिशत), भागलपुर प्रमण्डल (१.७० प्रतिशत) तथा दरभंगा प्रमण्डल (०.५९ प्रतिशत) का स्थान आता है। १९११-२१ के दशक में बिहार की जनसंख्या में ०.९७ प्रतिशत की कमी आयी। बिहार के वर्तमान २८ जिलों में जनसंख्या में कमी हुई और शेष ९ जिलों में वृद्धि हुई। १९२१ ई. के बाद बिहार की जनसंख्या की वृद्धि के प्रादेशिक प्रतिरुप में काफी परिवर्तन हुआ। इसके बाद बिहार के किसी भी भाग में जनसंख्या का ह्रास नहीं हुआ तथा अधिकतम और न्यूनतम वृद्धि के क्षेत्रों में भी परिवर्तन हुआ। १९३१ ई. के बीच इस राज्य की जनसंख्या में ५.८१ प्रतिशत से १७.१० प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गयी जब राज्य की औसत वृद्धि ९.७४ प्रतिशत थी। इसी अवधि में सर्वाधिक वृद्धि पटना और नालन्दा जिले में हुई और सबसे कम वृद्धि सहरसा, मधेपुरा जिले में हुई शेष जिलों में प्रान्तीय औसत से कम वृद्धि हुई। १९३१-४१ के दशक में भी लगभग यही स्थिति बनी रही। इस अवधि में सर्वाधिक वृद्धि कैमूर, बक्सर, भोजपुर में हुई दूसरी सर्वाधिक वृद्धि (१६.२० प्रतिशत) मगध प्रमण्डल में और तीसरी सर्वाधिक वृद्धि (१६.१४ प्रतिशत) पटना और नालन्दा जिले में हुई। पिछले दशक की भाँति इस दशक में भी सबसे कम वृद्धि (०.७८ प्रतिशत) कोसी प्रमण्डल में अंकित की गई। १९७४ ई. के बाद बिहा में जनसंख्या की वृद्धि के प्रादेशिक प्रारुप में कुल परिवर्तन आया है। बिहार के उत्तरी-पूर्वी भागों में जनसंख्या की वृद्धि की गति तीव्र हो गयी है। और इसके मध्यवर्ती भागों में धीमी। १९५१-६१ में सर्वाधिक ५०.५३ प्रतिशत वृद्धि सुपौल जिले की जनसंख्या में हुई। अन्य जिलों की अपेक्षा अधिक तेजी से जनसंख्या बढ़ी। दूसरी ओर लखीसराय (११.४१ प्रतिशत), बेगूसराय (१२.६२ प्रतिशत), सीवान (१२.६ प्रतिशत) और शिववहर (१३.२६ प्रतिशत) जनसंख्या-वॄद्धि की दर निम्न रही। १९६१-७१ के दशक में बिहार के उत्तरी-पूर्वी जिलों में जनसंख्या-वॄद्धि की दर तीव्र रही। इस दशक में किशनगंज में सर्वाधिक वृद्धि-दर (३४.६० प्रतिशत) अंकित की गयी इसके बाद पूर्णिया (२६.९२ प्रतिशत), अररिया (२७.५८ प्रतिशत) में वृद्धि हुई। १९७१-८१ के बीच पटना जिले में ३४.१३ प्रतिशत की दर से जनसंख्या में वॄद्धि हुई, जो सर्वाधिक थी। किशनगंज में ३०.१५ प्रतिशत, पूर्णिया में २७.४२ प्रतिशत और सुपौल में २७.२८ प्रतिशत की दर से जनसंख्या में वृद्धि हुई। पुनः इस दशक में शिवहर में वृद्धि-दर न्यूनतम (१७.२९ प्रतिशत) रही। कैमूर (१९.२३ प्रतिशत), जहानाबाद (१९.७० प्रतिशत), खगड़िया (१९.८८ प्रतिशत) इत्यादि कम थी। १९८१-९१ के दशक में वैशाली जिला में सर्वाधिक दर से जनसंख्या में वृद्धि हुई। पिछले दशक (१९९१-२००१) में बिहार में जनसंख्या वृद्धि-दर १द८.७४ प्रतिशत से ३६.६० प्रतिशत तक रही। बिहार राज्य की औसत वृद्धि दर (२८.६२ प्रतिशत) भी शिवहर जिला के वृद्धि-दर (३६.६० प्रतिशत) और न्यूनतम वृद्धि-दर नालन्दा जिला में अंकित की गयी। बिहार के लगभग २२ जिलों में जनसंख्या वृद्धि-दर राज्य के औसत से अधिक है शेष जिलों में यह राज्य से औसत कम है। जनसंख्या की दृष्टि से बिहार को तीन प्रमुख वर्गों में रखा जा सकता है- (क) तीव्र वृद्धि-दर-बिहार के ऐसे जिले आते हैं, जिनकी जनसंख्या-वृद्धि की दर ३० प्रतिशत से अधिक है। इसके अन्तर्गत १५ जिले आते हैं, जिसमें शिवहर, पूर्णिमा, सहरसा, नवादा, जमुई इत्यादि हैं। (ख) मध्यम वृद्धि-दर-इसके अन्तर्गत राज्य के १५ जिले आते हैं, जिनकी जनसंख्या वृद्धि-दर २५ प्रतिशत से ३० प्रतिशत के बीच है। इसमें पूर्व चम्पारण, मधुबनी, सुपौल, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फर, समस्तीपुर, खगड़िया, भागलपुर इत्यादि जिले सम्मिलित हैं। (ग) निम्न वृद्धि-दर-इसके अन्तर्गत बिहार में सात ऐसे जिले हैं,जिनकी जनसंख्या-वृद्धि २५ प्रतिशत से काफी कम है। सीवान, भोजपुर, बांका, ,मुंगेर लखीसराय, नालन्दा, शेखपुरा इत्यादि हैं। जनसंख्या का वितरण-राज्य में जनसंख्या का भौगोलिक वितरण असमान है। इसका कारण राज्य के प्राकृतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्वरुप में विभिन्नता है। सामान्यतया राज्य के मध्यवर्ती भाग में समतल भूमि, उपजाऊ मिट्टी, सिंचाई तथा यातायात की सुविधा के कारण अधिक जनसंख्या पायी जाती है। धरातल, अनुपजाउ मिट्टी तथा यातायात के साधन के कम विकास के कारण कम जनसंख्या मिलती है। मैदानी भागों में जनसंख्या का संकेन्द्रण कम हुआ है। बिहार का क्षेत्रफल और जनसंख्या का स्वरुप, २००१
जनसंख्या का घनत्व २००१ की जनगणना के अनुसार बिहार में औसत रुप से एक वर्ग किमी. क्षेत्र में ८८१ व्यक्ति निवास करते हैं। अतः बिहार की जनसंख्या का औसत घनत्व ८८१ व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है, जो देश के औसत घनत्व ३२५ से काफी अधिक है। १९९१ ई. में वर्तमान बिहार के सीमा-क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व ६८५ व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. था और तत्कालीन सम्पूर्ण बिहार में यह केवल ४९७ व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. था। किन्तु बिहार बटने के बाद यह अधिक हो गया। बिहार के विभिन्न भागों में धरातल के स्वरुप, मिट्टी की उर्वरता, सिंचाई तथा आवागमन के साधन के विकास में पर्याप्त अन्तर है। इस कारण राज्य के विभिन्न भागों में जनसंख्या का घनत्व अत्यन्त असमान है। एक ओर जहाँ पटना जिले का घनत्व सर्वाधिक १,४७४ व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है, तो कैमूर जिले में सबसे कम ३८३ व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है। राज्य का पश्चिमी मध्य भाग घना आबाद है और पूर्वी एवं दक्षिण में विरल आबादी है। राज्य में सर्वाधिक घनत्व वाले क्षेत्र- जिनकी जनसंख्या घन्त्व १,२५० व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. से अधिक है। इसके अन्तर्गत पटना (१,४७४), दरभंगा (१,४४६) है। वैशाली, पटना, जिला में उपजाऊ भूमि के साथ-साथ यातायात साधनों के विकास, व्यापार एवं उद्योग के विकास तथा प्रान्तीय राजधानी पटना नगर के प्रशासनिक, शैक्षणिक और अन्य कार्यों के विकास के कारण राज्य का सर्वाधिक घनत्व पाया जाता है। अधिक घनत्व वाले क्षेत्र- राज्य जनसंख्या का घनत्व १,०५० से १,२५० व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है। इसके अन्तर्गत सारण, सीतामढ़ी, सीवान, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, शिवहर, गोपालगंज आदि जिले आते हैं। ये जिले उत्तर बिहार में स्थित हैं, बेगूसराय में बेगूसराय-बरौनी औद्योगिक क्षेत्र के आकर्षण के कारण भी जनसंख्या का अधिक घनत्व पाया जाता है। मध्यम घनत्व वाले क्षेत्र-उन जिलों को शामिल किया गया है।, जहाँ जनसंख्या का घनत्व ८५० से १,०५० व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। इसमें कई जिले हैं। मधुबनी, नालन्दा, पूर्वी चम्पारण, जहानाबाद, भागलपुर, भोजपुर इत्यादि आते हैं। क्षेत्रों में आर्थिक विकास की परिस्थितियाँ अपेक्षाकृत कम अनूकुल हैं। निम्न घनत्व वाले क्षेत्र- बिहार के जिन क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व ६५० से ८५० व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. पाया जाता है। कम घनत्व वाला क्षेत्र कहा जाता है। इनमें बाढ़ग्रस्त तथा पठारी भाग भी शामिल हैं। मुंगेर, पूर्णिमा, कटिहार, शेखपुरा, नवादा, सुपौल, गया, किशनगंज, लखीसराय आते हैं। ये सभी राज्य के दक्षिणी भाग में स्थित हैं, पूर्वी भाग में स्थित क्षेत्र बाढ़ग्रस्त हैं। अतिन्यून घनत्व वाले क्षेत्र-ऐसे जिले शामिल हैं, जिनकी जनसंख्या का घनत्व ६५० व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. से भी कम है, कैमूर, जमुई, बांका, पश्चिमी चम्पारण, औरंगाबाद और रोहतास जिले इसके अन्तर्गत आते हैं। लिंग-अनुपात-लिंग अनुपात को प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या के रुप में व्यक्त किया जाता है। जनसंख्या में स्त्रियों की संख्या की कमी या अधिकता की जानकारी मिलती है। १९९१ ई. में तत्कालीन बिहार का लिंग-अनुपात ९११ तथा वर्तमान बिहार के अन्तर्गत स्थित क्षेत्रों का लिंग-अनुपात ९०७ था किन्तु २००१ ई. में यह बढ़कर ९१९ हो गया। बिहार में लिंग-अनुपात (१९०१-२००१)
साक्षरता-१९८१ ई. की जनगणना के बाद ०-६ आयु-वर्ग के बालक की गणना साक्षरता के सन्दर्भ में नहीं की जाती है। २००१ ई. की जनगणना के अनुसार बिहार में साक्षर व्यक्तियों की संख्या ३,१६,७५,६०७ जिनमें २,०९,७८,९५५ पुरुष और १,०६,९६,६५२ स्त्रियाँ हैं। इस प्रकार प्रत्येक २ साक्षर पुरुष पर साक्षर महिला की संख्या एक है। पुरुष साक्षरता का कुल साक्षरता ४७ प्रतिशत है। जबकि १९९१ ई. में यह ३७.४९ प्रतिशत थी। इस प्रकार १९९१-२००१ की अवधि में बिहार की साक्षरता के स्तर में १० प्रतिशत की वृद्धि हुई है। फिर भी यह भारत की औसत साक्षरता (६४.८ प्रतिशत) से काफी कम है। १९९१ ई. की जनगणना के समान ही २००१ ई. में भी बिहार भारत का सबसे कम साक्षर राज्य है। बिहार में साक्षरता की प्रगति (१९५१-२००१)
बिहार में पुरुष एवं स्त्री साक्षरता में काफी अन्तर पाया जाता है। पुरुष साक्षरता हमेशा महिला साक्षरता से अधिक रही है १९५१ ई. में २२.६८ प्रतिशत पुरुश साक्षर थे, जबकि केवल ४.२२ प्रतिशत महिलाएँ ही साक्षर थीं। इस प्रकार एक साक्षर स्त्री के पीछे ५ साक्षर पुरुष थे १९६१ ई. में पुरुष और महिला साक्षरता बढ़कर क्रमशः ३५.८५ प्रतिशत और महिला साक्षरता ८.११ प्रतिशत थी। १९७१ ई. में पुरुष साक्षरता बढ़कर ३५.८६ प्रतिशत और महिला साक्षरता ९.८६ प्रतिशत हो गयी। बिहार के विभिन्न भागो में आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्तर, राजनैतिक चेतना इत्यादि में अन्तर पाया जाता है। इसके कारण विभिन्न जिलों में साक्षरता के प्रतिशत में भी अन्तर पाया जाता है। सबसे अधिक साक्षरता पटना जिला (६३.९२ प्रतिशत) में है। सबसे कम साक्षरता किशनगंज जिला (३१.०९ प्रतिशत) में है। पटना जिले में सर्वाधिक साक्षरता का कारण यह है कि इसमें प्रान्तीय राजधानी स्थित है। दूसरा सर्वाधिक साक्षर जिला रोहतास (६१.२९ प्रतिशत) और तीसरा मुंगेर (५९.४७ प्रतिशत) है। इन जिलों में औद्योगिक कार्य में लगे लोगों की संख्या अधिक है। कुल ११ जिलों में साक्षरता का प्रतिशत ५० से ६० के बीच है। व्यावसायिक संरचना-व्यावसायिक संरचना के अन्तर्गत कुल जनसंख्या में कार्यरत जनसंख्या के विभिन्न व्यवसायों अथवा कार्यों में संलग्नता का अध्ययन किया जाता है। भारत के जनगणना विभाग ने कुल जनसंख्या को दो वर्गों-कार्यशील एवं गैर-कार्यशील में विभाजित किया है। कार्यशील जनसंख्या को पुनः दो उपवर्गों-मुख्य कार्यकर्ता तथा सीमन्त कार्यकर्ता में विभाजित किया गया है। कार्यशील जनसंख्या की श्रेणी में जनसंख्या के उस भाग को रखा गया है जो आर्थिक रुप से उत्पादक कार्यों से सम्बन्धित है। गैर-कार्यशील जनसंख्या की श्रेणी में जनसंख्या का वह भाग आता है जो कृषि कार्यों में लगी होती है। बिहार तृतीय वर्ग के नगरों की जनसंख्या-२००१
नगरीकरण कुल जनसंख्या में नगरीय स्थानों में रहने वाली जनसंख्या के अनुपात एवं इसमें होने वाली वृद्धि को नगरीकरण कहा जाता है । बिहार के कुल जनसंख्या अनुपात या प्रतिशत को नगरीकरण का स्तर तथा इसमें होने वाली वृद्धि को नगरीकरण की दर कहा जाता है । आधुनिक सभ्यता में उत्पादन एवं वितरण में केन्द्रीयकरण के द्वारा अधिक संवर्द्धन प्राप्त किया जाता है । इसलिए नगरीकरण एवं नगरीय सुविधाएँ विकास एवं आर्थिक क्रिया के मापदण्ड का काम करती हैं । फलतः रोजगार और नगरीय सुविधाओं से आकर्षित होकर ग्रामीण क्षेत्रों की जनसंख्या उनकी ओर आती है । यह नगरीकरण का एक मुख्य कारण है । विश्व के विभिन्न देशों में शहरी क्षेत्र की परिभाषा में विषमता है । भारत में भी इसके सीमांकन में परिवर्तन हुआ है । २००१ ई., १९८१ ई. और १९९१ ई. में भारत में जनगणना निदेशालय द्वारा अपनाये गये आधार पर ही शहरों को पहचाना जाता है । इस आधार पर ऐसे सभी क्षेत्रों को शहर कहा जाता है । नगर निगम , नगरपालिका, फौजी छावनी बोर्ड अथवा अधिसूचित क्षेत्र समिति काम कर रही हों, जो कई शर्तों को पूरा करती हों- (क) कम-से-कम ५०००की आबादी हो । (ख) कम-से-कम ७५ प्रतिशत पुरुष कार्यकारी जनसंख्या गैर-कृषि कार्यों में लगी हो । (ग) उस क्षेत्र में जनसंख्या का घनत्व कम-से-कम ४०० व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. हो । २००१ ई. की जनगणना में बिहार में १३० शहरों की पहचान की गयी है । १९९१ ई. की जनगणना के अनुसार बिहार में शहर की संख्या २७१ थी । २००१ ई. में कुल १३० सहरों में से १११ स्वतन्त्र शहर हैं और १९ शहर ऐसे हैं, जिन्हें ९ नगर-समूहों के अन्तर्गत रखा गया है । नगर-समूह ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ एक बड़े शहर की सीमाएँ बढ़कर अन्य शहरी क्षेत्रों से जा मिलती हैं । इन समूहों में मोतिहारी, पूर्णिया, कटिहार, समस्तीपुर, बेगूसराय, भागलपुर प्रत्येक में दो, सीतामढ़ी, गया (प्रत्येक में तीन शहर और आउटग्रोथ) और पटना (१ शहर और आउटग्रोथ) है । २००१ की जनगणना के अनुसार बिहार की कुल जनसंख्या ८,२९,९८,५०९ है, जिनमें ७,४३,१६,७०९ ग्रामीण और ८,६८,१८,८०० नगरीय जनसंख्या है । जनसंख्या का ८९.५४ प्रतिशत ग्रामीण हैं । केवल १०.४६ प्रतिशत शहरी है । (१९०१-२००१ बिहार में नगरीकरण की प्रवृत्तियाँ)
१९९१-२००१ के दशक में बिहार की कुल जनसंख्या, ग्रामीण जनसंख्या और नगरीय जनसंख्या में क्रमशः २८.६२ प्रतिशत, २८.३३ प्रतिशत और २९.३५ प्रतिशत की वृद्धि हुई । १९८१-९१ की अवधि में इनमें क्रमशः २३.३८ प्रतिशत, २२.६१ प्रतिशत और ३०.४५ प्रतिशत की वृद्धि हुई थी । इससे स्पष्ट है कि पिछले दो दशक में बिहार की नगरीय जनसंख्या दशाकीय वृद्धि-दर में विशेष अन्तर नहीं हुआ है । |